राजयोग – मन का प्रबन्धन
जैसे शरीर में कब्जियत होती है, वैसे मन में भी होती है। शरीर में कब्जियत हो तो बड़ा खराब लगता है न? शरीर का यह धर्म है कि जो भी तुम ग्रहण करते हो उसे वह पचाता है और फिर निकालता है। यही मन का भी धर्म है। जो कुछ मन ग्रहण करता है, उसे वह पचाता है और फिर निकालता है। लेकिन आप उसको निकालने नहीं देते। आप उसको वहीं पर रोक लेते हो। यह मानसिक कब्जियत अंत में मानसिक दस्त का रूप ले लेती है। हमारा मन इन्हीं दो अवस्थाओं के बीच झूलता रहता है, कभी मन में कब्जियत रहती है तो कभी दस्त।
मन की इन विकृत अवस्थाओं को व्यवस्थित करने के लिए राजयोग का अभ्यास किया जाता है। लोग कहते हैं कि राजयोग ध्यान सिखाता है, पर राजयोग ध्यान का नहीं, मनोनियंत्रण का तरीका है। ध्यान तो इसके सातवें चरण में आता है। राजयोग के पहले छः चरण मनुष्य को अपने मन एवं आचरण के प्रति सजग बनाते हैं और उन्हें व्यवस्थित करने के लिए प्रेरित करते हैं।
राजयोग को भले ही लोग अष्टांग योग कहते हैं, लेकिन वास्तव में देखा जाए तो यह षडंग योग है। यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि, ये मन के लिए अभ्यास हैं। इनमें जो आसन और प्राणायाम शामिल किये गये हैं, वे आपको ध्यान की स्थिति में और गहराई में ले जाने के लिए आते हैं। राजयोग के आसन गत्यात्मक नहीं हैं। ‘स्थिरसुखमासनम्’ – महर्षि पतंजलि के अनुसार आसन उसे कहते हैं, जिसमें एक लम्बे समय तक स्थिरपूर्वक बैठ सकते हैं। ऐसे आसनों का प्रयोजन क्या है? शरीर स्थिर हो जाए, शरीर में किसी प्रकार का कड़ापन, झंझट, परेशानी न हो, ताकि आप अपने मन को अन्तर्मुखी बना सको। वैसे ही प्राणायाम के साथ है, पतंजलि ने केवल चार प्रकार के प्राणायामों का उल्लेख किया है, श्वास लेना एक प्राणायाम, श्वास छोड़ना दूसरा, श्वास को अन्दर रोकना तीसरा और, बाहर रोकना चौथा। अब श्वास लेना, रोकना, छोड़ना, रोकना, अगर इसे हम प्राणायाम कहें, तो फिर बाकी क्या है?
महर्षि पतंजलि ने स्पष्ट किया कि अपनी मानसिक अवस्थाओं की पहचान तुम श्वास के आधार पर कर सकते हो। जब तुम चंचल हो तब तुम्हारी श्वास तीव्र गति से चलेगी। जब तुम अशांत हो तब तुम्हारी श्वास की गति दूसरी होगी। जब तुम स्थिर और शांत बैठे हो तब तुम्हारी श्वास लम्बी, धीमी, गहरी होगी। महर्षि पतंजलि के लिए श्वास को लम्बा, धीमा, गहरा करना प्राणायाम है। अभी आप औसतन एक मिनट में ग्यारह-बारह श्वास लेते हो। अगर एक मिनट में एक श्वास लोगे, तीस सेकेण्ड श्वास लेने में, तीस सेकेण्ड श्वास छोड़ने में लगाओगे तो यह महर्षि पतंजलि का प्राणायाम है। उसमें नाक पकड़ने की आवश्यकता भी नहीं।
हठयोग में जो प्राणायाम हैं, वे गत्यात्मक हैं, लेकिन राज योग में पतंजलि ने जिस प्राणायाम की चर्चा की है, वह मन की शांति और अन्तर्मुखता को बढ़ाने के लिए है। इसलिए उन्होंने अष्टांग योग में आसन और प्राणायाम की चर्चा ध्यान के सन्दर्भ में की है, एक शारीरिक अभ्यास के रूप में नहीं। उन्होंने कहा है कि मानसिक चंचलता को शांत करने के लिए इस विधि का पालन करो और स्पष्ट किया है कि राजयोग का प्रयोजन ‘चित्तवृत्ति निरोध’ अर्थात् मन की चंचल अवस्थाओं को शांत करना और एकाग्रता को प्राप्त करना है ध्यान को तुम जितनी गहराई में ले जा सकते हो, ले जाओ। अन्त तक ले जा सकते हो तो समाधि होगी। समाधि कोई अलग चीज नहीं है। देखा जाए तो रोज रात को जब हम सोते हैं, वह स्थिति समाधि की भाँति है। शरीर, स्थान, समय का ख्याल नहीं रहता। आदमी जब आठ घण्टे सोता है तो कहाँ जाता है? निद्रा की अवस्था में चेतना की, मन की क्या स्थिति होती है? मन कहाँ विलीन हो जाता है? मन की अनुभूतियों का लय कहाँ होता है? ध्यान की अन्तिम अवस्था में मन की समस्त अनुभूतियों का लय होता है। सब चित्तवृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, कोई भी चंचलता शेष नहीं रहती। तब वह स्थिति समाधि कहलाती है। जब तुम्हारे भीतर चंचलता का कारण बनने लायक कोई बीज नहीं रहता, तब वह स्थिति समाधि कहलाती है। जब तक बीज रहता है, जिसके कारण तुम बाहर-अंदर होते रहते हो, तब तक वह स्थिति ध्यान कहलाती है।
यौगिक जीवन
स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती