कुछ लिखके सो कुछ पढ़कर सो…
कुछ लिखके सो कुछ पढ़कर सो,
तू जिस जगह जागा सबेरे,
उस जगह से बढ़कर सो।
जैसा उठा वैसा गिरा जाकर बिछौने पर,
तिफ्ल जैसा प्यार यह जीवन खिलौने पर,
बिना समझे बिना बुझे खेलते जाना,
एक जिद को जकड़ कर ठेलते जाना,
गलत है बेसुद है कुछ रचके सो,
तू जिस जगह जागा सबेरे,
उस जगह से बढ़कर सो।
दिन – भर इबारत पेड़ – पत्ती और पानी की
बन्द घर की खुले – फैले खेत धानी की
हवा की बरसात की हर खुश्क की तर की
गुजरती दिनभर रही को आप की पर की
उस इबारत के सुनहरे वर्क से मन मढ़के सो
तू जिस जगह जागा सबेरे,
उस जगह से बढ़के सो।
लिखा सूरज ने किरण कि कलम लेकर जो
नाम लेकर जिसे पंछी ने पुकारा सो
हवा जो कुछ गा गई बरसात जो बरसी
जो इबारत लहर बनकर नदी में दरसी
उस इबारत कि अगरचे सीढ़ियाँ हैं चढ़कर सो
तू जिस जगह जागा सबेरे,
उस जगह से बढ़कर सो।
~ भवानी प्रसाद मिश्र