खुद को जब भी सँवारा…
खुद को जब भी सँवारा,
वह बिखरती गई।
घर की देहरी पर जलाया था दीपक,
और मन का उजास टाँग दिया था
वहीं किसी कोने में…
कि फिर कभी फ़ुरसत मिले खुद के लिए।
आँगन को बुहारती, लीपती
और बार-बार जलाती तुलसी के चौरे पर एक दीया,
कि लक्ष्मी आएगी, बरकत बनी रहेगी।
ज़िम्मेदारी है उसकी
कि समृद्धि को सहेजती रहे।
बालों की सफेदी और चेहरे की लकीरों के साथ-साथ
उसने खड़ी कर ली एक चमकती, मज़बूत भीत।
आँगन की तुलसी फैलती रही,
और उसकी छाँव से दूर होती रहीं काली परछाइयाँ।
देहरी का दीपक रौशन करता रहा घर को,
ओसारा बटोरता रहा समृद्धि,
पूजा की घंटियों और धूप की सुगंध से
गमकता रहा घर का कोना-कोना।
जब कभी किसी साँझ वह बैठी,
उसे अक्सर याद आई वह खूँटी,
जहाँ टाँग रखा था उसने अपने मन का उजास।
वह अधूरी किताब,
चादर पर काढ़ी हुई फूलों की बेल
जिसकी पत्तियों में भरना था हरा रंग,
वह गीत की धुन…
हाँ, यही तो सहेजी थी वह तुकबंदी,
जो जुड़ते-जुड़ते टूट गई।
अगर जुड़ी होती,
तो शायद कोई कविता ही बनती!
जो जिम्मेदारियों की चमकीली भीत में जाने कब चुन दी गई l
और फिर उसे याद आया—
देहरी का दीपक, तुलसी का चौरा,
और उसके आँचल में सिमटा आँगन का उजास।
खुद को दर्पण में निहार,
माथे की धुँधला गई बिंदी को
उसने दर्पण के कोने पर चिपका दिया।
एक नई बिंदी माथे पर सजाकर
वह आज फिर भूल गई ढूँढना मन का उजास…
क्योंकि, रसोई में पकाना है मीठा भात l
—नीरजा बसंती