July 23, 2026

महाकवि कालिदास का रोचक विवाह प्रसंग

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-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर

देश, समाज, में विद्वान् का पुरातन काल से सम्मान होता आया है। कहा भी है ‘स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्रपूज्यते’, राजा तो केवल अपने देश में पूजा जाता है किन्तु विद्वान् की सभी सम्मान पूजा को प्राप्त होता है। किन्तु लालची और धूर्त विद्वान्ों के भी किस्से कम नहीं हैं। विद्वान् और वह भी धूर्त हों तो समझलो वे अपनी चालाकी से किसी को भी ठग सकते हैं। उनमें भी यदि वे सहोदर भाई हों तब तो धूर्तता की पराकाष्ठा ही लांघ जाते हैं।
महाकवि कालिदास के विषय में कथाओं और किम्बदंतियों से ये पता चलता है की वह शक्लो-सूरत से सुंदर थे और विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में एक थे। कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ और निरामूर्ख थे। उनके विवाह का प्रसंग बहुत रोचक और प्रसिद्ध है-
विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी बहुत विदुषी थी, वह चाहती थी कि उसे उससे भी अधिक विद्वान् पति मिले, वह रूप-लावण्ययुक्त भी थी। विद्योत्तमा ने अपने पिता से कहकर घोषणा करवायी कि जो विद्वान् उसे शास्त्रार्थ में परास्त कर देगा उससे विद्योत्तमा का विवाह होगा। कई विद्वान् शास्त्रार्थ को आये लेकिन विद्योत्तमा के सामने शास्त्रार्थ में टिक न सके। परास्त, अपमानित विद्वानों ने योजना बनाई- ‘‘विद्योत्तमा का विवाह निरा मूर्ख से करवाया जाएं।’’ वे मूर्ख की खोज में निकले। ग्रामान्तर जा रहे थे, जंगल में एक लकड़हारा दिखा जो एक पेड़ की डाल काट रहा था, किन्तु वह जिस डाल को काट रहा था उसी पर बैठा था। इन विद्वानों ने कहा इससे अधिक मूर्ख कोई नहीं होगा, जिसे इतनी भी बुद्धि नहीं है कि डाल कटने पर वह भी डाल के साथ नीचे गिर जायेगा।
उन धूर्त विद्वानों ने उसे अच्छा विवाह, अच्छे कपड़ों का लालच दिया और कहा- एक लड़की जो कहेगी उसका उत्तर केवल संकेतों में देना है, बोलना नहीं है। सभा में एक तरफ विद्योत्तमा और दूसरी ओर बड़े विद्वान् के रूप में मूर्ख कालिदास को बैठाया गया। निश्चित हुआ कि कालिदास मौन में हैं अतः प्रश्नोत्तर संकेतों में होंगे।
शास्त्रार्थ के दौरान विद्योत्तमा ने कालिदास को एक उंगली दिखाई जिसका अर्थ था कि ब्रह्मा एक है, परंतु कालिदास ने समझा कि वह कह रही है कि उनकी एक आँख फोड़ देगी। इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने अपनी दो उंगली खड़ी कर दी। कालिदास का अर्थ था कि यदि तू उनकी एक आँख फोड़ेगी तो वह उसकी दोनों आंखें फोड़ देंगे।
धूर्त विद्वानों ने उसका अर्थ किया कि दो उंगलियों का अर्थ है- ‘‘सृष्टि में ब्रह्म और जीव दोनों हैं।’’ विद्योत्तमा उत्तर से संतुष्ट हो गई। फिर उसने अपनी पांच उंगलियां खड़ी कीं, जिसका अर्थ था कि हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है।
कालिदास समझे कि वह उन्हें थप्पड़ मारना चाहती है तो उन्होंने अपनी पांचों उंगलियों को जोड़कर एक मुट्ठी बना दी और संकेत में कहा कि यदि तुम मुझे थप्पड़ मारोगी तो मैं तुम्हें घूसा मारूंगा। द्वेषी विद्वानों ने उसका अर्थ किया कि पांचों तत्व तो अलग अलग हैं परंतु मन तो एक ही है और मन सभी तत्वों को संचालित करता है।
इस तरह विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते और धूर्त विद्वान् उसकी व्याख्या करते। कालिदास विजयी हुए, उनका विवाह विद्योत्तमा से हो गया। विद्योत्तमा अपने कक्ष में बैठी थी। बाहर से तीब्र स्वर को सुनकर उसने कहा- ‘किम् वदति?’ (कौन बोल रहा है)। कालिदास ने कहा ‘उट्र वदति’, उसने ‘उष्ट्र’ (ऊँट) की जगह ‘उट्र’ बोला। विद्योत्तमा को आभास हुआ कि छलपूर्वक एक मूर्ख के साथ उसका विवाह कराया गया है। उसने कालिदास को घर से बाहर निकाल दिया और कहा पूर्ण विद्वान् बन जाओ तो लौटना।
पत्नी के द्वारा अपमान उनसे सहा न गया। उन्होंने अनेक स्थानों का भ्रमण किया और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करके प्रकाण्ड विद्वत्ता प्राप्त की। कालिदास जब घर आये तो उन्होंने आवाज दी- ‘सुंदरि! अनावृत्त कपाटं द्वारं देहि! कपाटं उद्घाटय’ (हे रूपसी! दरवाजा खोलिए)। यह सुनकर विद्योत्तमा ने कहा- ‘अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान् लगता है)।’ कालिदास को सामने पाकर वह आश्चर्य चकित रह गई। कादिदास ने विद्योत्तमा के तीन शब्दों को लेकर तीन संस्क्ृत-महाकाव्य रचे और उनका प्रारंभ इन्हीं शब्दों से किया। उन्होंने अन्य ग्रन्थ भी लिखे।
इस घटना से कई संदेश प्रवहित होते हैं। कालिदास ने तो अपनी पत्नी की लताड़ खाकर स्वयं का उद्धार कर लिया, किन्तु हमें ऐसे धूर्त विद्वानों से सावधान रहना चाहिए जो आज भी विद्वत्ता का चोला ओढ़कर समाज में कभी भी अपना स्थान बना लेते हैं और कुछ लोगों की सहायता से संस्था आदि पर कब्जा जमां लेते हैं। फिर संस्था के धन को तो किसी न किसी प्रकार से हड़प ही लेते हैं, संस्था की विश्वसनीयता का लाभ उठाकर समाज को अनवरत ठगते रहते हैं। ऐसे ढोंगी, धूर्त विद्वानों के नाम को कलंकित करने वालों से हमेशा सावधान रहना चाहिए।

-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
22/2, रामगंज, जिन्सी, इन्दौर 9826091247
mkjainmanuj@yahoo.com

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