एक और घर होने की आवाज़
दीवार उठाना दरअसल घर बनाना नहीं
एक पड़ोस को जन्म देना है।
ईंटें सिर्फ़ मेरा हिस्सा अलग नहीं करतीं
वे उस पार वाले के लिए भी एक सिरा बुनती हैं
जहाँ से वह अपनी पीठ टिका सके।
दीवार के इस तरफ मेरा अपना एकांत है
लेकिन उस तरफ़ एक पूरी दुनिया है –
जो मेरी ख़ामोशियों को वैसे ही सुनती है
जैसे ख़ाली बर्तन में गिरती हुई पानी की बूँद को।
एक अजनबी दीवार के उस पार
छौंक लगाता है और उसकी महक मेरे घर आती है
रात को उसके खाँसने की आवाज़
मुझे बताती है कि मैं अकेला नहीं हूँ
और इस उजाड़ समय में
मेरे डर की गवाही देने वाला
दीवार के ठीक आगे – एक पड़ोस भी है।
••• जयप्रकाश मानस