गीत
समय व्यर्थ करने के हो यदि अभ्यस्त,
स्पष्ट है होगा अनागत संकटग्रस्त !
स्वास्थ्य की उपेक्षा से वह छूट जाय !
टूट कर विश्वास कभी ना लौट पाय !
वर्तमान में सूझबूझ से बचाया
धन ही भविष्य में बनेगा वरदहस्त !
दो सम्मान तो सम्मान हो सुनिश्चित !
श्रेष्ठ बने जो शिक्षा से हो विभूषित !
सौजन्य की अपेक्षा दुर्जन भी रखे ;
अहंकारी अशिष्ट से रहें सब त्रस्त !
अनुशासन भावी को करता पुरस्कृत !
सच्चरित्रता से हो जीवन अलंकृत !
उच्छृंखलता व दुर्भावनाएं रहें
सदा नकारात्मक गतिविधियों में व्यस्त !
प्रेम यदि लुटाओ तो वह बढ़ता जाय !
विद्यार्जन ही वास्तविक समृद्धि कहाय !
बनेगा जीवन निष्कंटक निश्चित ही ;
हो जायेंगी सकल विसंगतियां ध्वस्त !
निशीथ कुमार पाण्डे
सान्निध्य, C ५/१२
ढेबर सिटी, भाठागाॅंव
रायपुर ४९२०१३