‘सुरता के संसार’ में बसने चले गए सुशील भोले
सुशील भोले जिन्हें मैं समाचार पत्रों के साहित्य अंक में पढ़ता रहा हूॅं। उनसे मिलने की इच्छा रही। अपने संकोची स्वभाव और पलारी से रायपुर जाकर मिलने में आर्थिक तंगी दोनों आड़े आती रही। जिसके चलते बरसों उनसे मुलाकात नहीं हो सकी थी। मुलाकात हुई तो मन खुशी के बजाय विषाद से भर गया। लेकिन बैसाखी के सहारे खड़े होने वाले आदमी की जीवटता और साहित्य के प्रति समर्पण खासकर छत्तीसगढ़ की अस्मिता और छत्तीसगढ़ के संस्कृति के संदर्भ में उनके विचार ने मुझे खासा प्रभावित किया। जीवन के प्रति उनकी सकारात्मकता ही थी, जो उसे पक्षाघात से पीड़ित होने के बावजूद साहित्य से दूर होने नहीं दिया।
कोरोना काल के समय साहित्यिक व्हाट्सएप्प समूहों में उन्हें पढ़ना हुआ। ‘मयारु माटी’ उनका एक समूह जिसके वे स्वयं एडमिन रहे। 1987 में ‘मयारु माटी’ नाम से उन्होंने छत्तीसगढ़ी के मासिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया। तेरह अंकों का सफल संपादन आर्थिक तंगी की भेंट चढ़ गई और पत्रिका के प्रकाशन का सिलसिला थम गया। ‘मयारु माटी’ में छत्तीसगढ़ के माटी की खुशबू से सुवासित रही। जिसमें लोक चिंतक सुशील भोले ने छत्तीसगढ़ की अस्मिता स्वाभिमान और गौरव को शब्दों के मोती से सजाते रहे। यहीं से छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की मांग को नया स्वर मिला। नई आवाज़ उठाई गई।
‘छत्तीसगढ़ी लोकाक्षर’ नाम का एक और समूह जिसमें उन दिनों(कोरोना काल) मैं अधिकतर उपस्थित रहता। सबका स्नेह और आशीर्वाद से मैं उत्साहित होकर खूब पढ़ने और लिखने की दिशा में अग्रसर हुआ। वहाॅं वे मुझे पढ़कर काफी प्रभावित हुए और उत्साहवर्धन करते रहे। जब कभी उनसे बातें होतीं, डाॅ. बलदेव का नाम लेते और कहते कि मुझे तुम्हारा लेखन उनका स्मरण करा देता है। तब मैं डाॅ बलदेव जी के नाम से भी परिचित नहीं था। छंद विज्ञ और साहित्यकार अरुण कुमार निगम जी जो लोकाक्षर के एडमिन हैं, वे भी एक मुझे लिखते रहने प्रोत्साहित करते रहे और आज भी यही कहते हैं। वे एक ही बात दोहराते हैं कि तुम्हारा काम लिखना है। प्रतिक्रिया कितनी आई, यह नहीं देखना। पढ़ते सब हैं। लिखना या प्रतिक्रिया देना हमेशा संभव नहीं होता। सबके पास अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाॅं भी हैं। डाॅ. बलदेव जैसा लिख पाना मेरे लिए कठिन है। हाॅं! मेरे लेखन से लोगों को उनकी याद आ जाती है, तो मुझे लगा कि निश्चित ही मुझे ऐसा लिखते रहना चाहिए जैसा आजकल लिख रहा हूॅं। ये भी तो हो सकता है कि इस ओर लोगों का ध्यान जाए और डॉ. बलदेव जी के अधूरे कार्य / विरासत को कोई आगे बढ़ाए। जिससे छत्तीसगढ़ी साहित्य समृद्ध हो सके। ऐसे इस विरासत को उनके सुपुत्र बसंत राघव आगे बढ़ा रहे हैं। वे हिंदी में बहुत ही अच्छी कहानियाॅं लिख रहे हैं। साथ ही संस्मरण के रूप में बहुत ही सुनहरे पलों को सहेज रहे हैं।
सुशील भोले के लिए रचनाकार बिरादरी के सभी रचनाकार बराबर थे। नवोदित और स्थापित में वे भेद करते नजर नहीं आए। सबसे समभाव से मिलते। लेखन के लिए प्रेरित करते। जब भी उनसे बात और मुलाकात होती, मुझे बहुत दुलार दिखाते। स्नेह लुटाते। उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन ही है कि कुछ लिखने लगा हूॅं। चार साल उनके घर जाना हुआ था। तब उन्होंने अपनी कुछ किताबें मुझे दी थीं। उनका कहानी संग्रह ढेंकी छत्तीसगढ़ी कहानियों का सशक्त संग्रह है। जिसमें छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति, अस्मिता और स्वाभिमान को उन्होंने प्रभावी ढंग से उकेरे हैं। उनका यह संग्रह उन्हें लोक में बिखरे पड़े लोक कथा-कंथली को लिखित रूप देने के बाद छत्तीसगढ़ी के नई कहानी लिखने के दौर की कहानीकारों में प्रथम पंक्ति में खड़ा करता है। उनकी रचनाओं में जनपक्षधरता की झलक दिखाई देती है। चाहे वे ‘ढेंकी’ के कहानियों की बात हो, चाहे उनके गीतों की बात हो। माखन लाल चतुर्वेदी ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ में जहां उस दौर की आवश्यकता राष्ट्रीयता को बल दिए थे। वैसे ही सुशील भोले की रचनाओं में जनपक्षधरता और सम्वेदना का समावेश हुआ है। उनके एक गीत की पंक्ति इसका दृष्टांत है।
जा मोर गीत तैं खदर बन जाबे।
बिन घर के मनखे बर घर बन जाबे।।
अस्वस्थता के बावजूद वे साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होते रहे। जहाॅं उनसे मुलाकात होती रही। पिछली मुलाकात उनसे भाटापारा में हुई थी। अचानक वे चले जाएंगे ऐसा नहीं लगा, लेकिन वे अनंत यात्रा में चले गए हैं, यही सत्य है। जीवन के इस कटु सत्य को स्वीकारना कठिन तो है, पर इसके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। मयारु माटी के ये लाल अपने मातृऋण से उऋण होने जीवन पर्यन्त ‘सुरता के संसार’ को समृद्ध करते रहे और २६ फरवरी को वे ‘सुरता के संसार’ में बसने चले गए।
उन्हें सादर नमन
‘छितका कुरिया’ सुन्ना परगे
‘जिनगी के रंग’ उधड़गे
‘ढेंकी’ कोनटा मं सुसकत हे….
‘दरस के साध’ कतको के साध रहिगे
‘सुरता के संसार’ मं धार बहिगे
‘मयारु माटी’ ह सुसकत हे….
‘आखर अंजोर’ अंधियार होगे
काला दागे ‘भोले के गोले’
‘कोंदा-भैरा के गोठ’ सुसकत हे….
०००
पोखन लाल जायसवाल