पसंद का मोहल्ला
सच दरअसल वह नहीं है जिसे हमने अपनी पसंद के लिफ़ाफ़े में बंद कर रखा है। पसंद तो एक पुरानी कमीज़ जैसी है, जिसे हम पहन लेते हैं क्योंकि वह हमें आराम देती है। पर सच तो वह नग्न शरीर भी है जो कमीज़ उतार देने के बाद भी वहीं रहता है।
•••
हमें जो पसंद है, वह हमारे घर की दीवार जैसा है। हमे सुरक्षित लगता है। पर जो हमें पसंद नहीं, वह दीवार के उस पार वाला पड़ोस है।
वह हमारे पसंद न करने से गायब नहीं हो जाता, वह बस वहाँ ही होता है।
•••
झूठ वह है जिसे हम ज़ोर-ज़ोर से बोलकर सच बनाना चाहते हैं। पर सच तो उस चिड़िया जैसा है जो मेरी खिड़की पर लगे आम के पत्तों के बीच चुपचाप बैठी है। उसे इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मुझे उसका बैठना पसंद है या नहीं। वह बैठी है, यही उसका सबसे बड़ा सच है।
•••
ईश्वर का धर्म-संकट भी यही है। उसे वह सच भी सुनना पड़ता है जो उसे शायद पसंद न हो। सच हमारी इच्छा का गुलाम नहीं है। वह तो उस ‘धूल’ जैसा है जो रायपुर की सड़कों पर उड़ रही है। आप उसे नापसंद कर सकते हैं, पर वह आपकी आँखों में गिरकर ही अपनी मौजूदगी की गवाही देगी।
•••
सच्चाई अक्सर उस अप्रिय मेहमान जैसी होती है, जिसके लिए हमारे पास बिछाने को दरी नहीं होती, पर वह हमारे ही घर के सबसे उजले कोने में आकर बैठ जाता है।
•••
[ डायरी से ] जयप्रकाश मानस