नवा रायपुर
आलोक पुतुल
नया रायपुर में
एक सड़क है
जो मंत्रालय की तरफ मुड़ते ही
अपनी आवाज़ बदल लेती है
राम देवांगन अक्सर रात गए
उसी मोड़ पर आते हैं
धीरे-धीरे
जैसे कोई अपने ही घर लौटता है
बिना दरवाज़ा खटखटाए
साइकिल को फुटपाथ के एक तरफ
बहुत ध्यान से खड़ी करते हैं
जैसे घर के बाहर खड़ी कर रहे हों
जिसकी दीवार एक दिन गिर गई थी
दुनिया से बेपरवाह
वे वहीं फुटपाथ पर लेट जाते हैं
जैसे कोई अपने ही घर में लेटता है
अपनी जगह पहचानकर
जहां देह को पता होता है
कि उसे कितनी जगह चाहिए
आकाश की तरफ देखते राम देवांगन के सामने
घर खड़ा होने लगता है
यहां एक दीवार थी
जब वे उससे पीठ लगाकर बैठते थे
तो दीवार थोड़ी गर्म हो जाती थी
एक खिड़की थी
जिससे हवा आती थी
पर हवा कभी घर को छोड़कर नहीं जाती थी
रात को बंद करते थे
तो घर के भीतर की सांस
घर में ही रहती थी
और नींद
चारपाई पर आकर बैठ जाती थी
एक छत थी
बारिश में वह पहले भीगती थी
फिर शोर करते हुए घर को बताती थी
रात भर आंगन में बरसता रहता था पानी
फिर एक दिन नई राजधानी बसाने के काग़ज़ आए
काग़ज़ बहुत हल्के थे
पर उन्होंने घर को उठा लिया
घर को ज़मीन से अलग कर दिया
जैसे किसी सोए हुए को
उसकी नींद से अलग कर दिया गया हो
जगह को अलग नहीं किया जा सका
जगह वहीं रही
पास में मंत्रालय है
रात को भी उसकी बत्तियां जलती रहती हैं
उसे नींद नहीं आती
शायद इसलिए
कि उसने बहुत से घरों की नींद ले ली है
राम देवांगन लेटे हुए
आकाश में तारों को देखते हैं
उन्हें हर तारा एक कील जैसा लगता है
जिससे कभी छत टंगी होगी
थोड़ी देर यहां रात होती है
सिर्फ उनके लिए
जैसे सरकार की रोशनी से बची हुई एक बचत
नए गांव से बेटे का फोन आता है
जिसे पता है कि पिता कहां होंगे
राम देवांगन लेटे-लेटे
कीपैड वाले फोन पर धीरे से कहते हैं-आवत हौं बेटा
वे सबसे कहना चाहते हैं कि
मुझे नींद यहां आती है
इसी फुटपाथ पर
जहां दीवार थी
जहां खिड़की थी
जहां छत थी
जहां घर था
वे आंख बंद करते हैं
तो घर फिर खड़ा हो जाता है
फुटपाथ थोड़ा-सा नरम हो जाता है
तारों की रोशनी खिड़की बन जाती है
आसमान छत हो जाता है
और मंत्रालय की ओर जाती सड़क
धीरे से मुड़कर
उनकी तरफ देखने लगती है
जैसे उसे भी कुछ याद आ गया हो