“मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है”
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हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई फिल्म ‘गाइड’ मेरे शहर उदयपुर की दिलकश वादियों में रचाई गई थी। अरावली की गोद में बसा एक शहर जिसकी बाहों में मैं पली बढ़ी। राजस्थान का कश्मीर। झीलों की नगरी, पानी, पत्थर पहाड़ों की पुरी, फाउंटेन व माउंटेन का शहर और ना जाने कितने नामों से नवाज़े गए मेरे इस शहर में बनी ये फिल्म गाइड। खैर उदयपुर की बात फिर कभी।
लेखक आर के नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ पर बनी फ़िल्म गाइड 1965 में विजय आनंद द्वारा निर्देशित, देव आनंद, वहीदा रहमान की नायाब अदाकारी और एस डी बर्मन के सुरमई संगीत की वजह से अप्सराओं की मानिंद हर दिन बस जवान और खूबसूरत ही हुई है।
इस फिल्म की कोई शुरुआत नहीं कोई अंत नहीं। ये सदा बीच से ही मालूम जान पड़ेगी। इसकी कहानी पर बात करना तो यूँ ही होगा, क्योंकि मेरी समझ में इस फिल्म को ना देखने वालें गिनती के ही होंगे। ख़ासकर वो तो बिल्कुल ही नहीं जो फ़िल्मों से और वो भी ऐसी फ़िल्मों से अनछुए रहते हों। लिहाज़ा आगे का पढ़ना गाइड फ़िल्म नहीं देखने वालों के किसी काम का नहीं। साथ में बहने के लिए आपको साथ ही उतरना होता है।
“वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर, जायेगा कहाँ?” किरदार निभाते वक़्त देव आनंद और वहीदा रहमान को ये एहसास हो गया होगा कि वो क्या निभाने जा रहे हैं जिसकी वजह से जिंदगी भर एक गर्वीली संतुष्टि उनका पीछा करेगी। हर दृश्य अविस्मरणीय है। इच्छा-अनिच्छा, देह का आकर्षण, विरक्ति-आसक्ति, मोह माया, अहंकार, प्रेम और ईश्वरीय शक्ति का एहसास, अंत में खुद की आत्मा से साक्षात्कार और इस बिना हैसियत के शरीर की झूठी शान और इसके दो कोड़ी के दंभ का अंत जीवन के एकमात्र दर्शन और सत्य मृत्यु पर ला पटकता है।
नायक राजू (देव आनंद) नायिका रोज़ी (वहीदा रहमान) के प्रति क्रमशः हमदर्दी, आकर्षण, प्रेम, लालच, बेईमानी, गुस्सा, पश्चाताप, पुनः प्रेम और अंत में विरक्ति को प्राप्त होते हुए सांकेतिक तौर पर ज़िंदगी की हकीकत से आपको मिलवाता है। सतह पर, सतह से ऊपर और फिर सतह से परे राजू की जीवन यात्रा चलती रहती है। रोज़ी के साथ रोज़ी के बिन और फिर रोज़ी के भीतर और अंततः पश्चाताप।
हर एक गीत सिर्फ गीत नहीं है कहानी की आत्मा है जिसके बिना कहानी अधूरी है। राजू के साथ आज़ादी की हवा में सांस लेती रोज़ी ये गाती है कि “आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है।” जीने की वो तमन्ना जो उसके भीतर आग की तरह धधकती आई है।
समाज के तंज़ तोहमतों को सहती रोज़ी की आँखों में आए आँसुओं को राजू अपने अन्दर लेते हुआ कहता है “लाख मना ले दुनिया साथ ना ये छूटेगा आके मेरे हाथों में हाथ ना ये छूटेगा” तब उन्हें कहाँ एहसास है कि हालात यूँ भी करेंगे कि एक ही झीने के उस और इस पार बैठकर ये कहना होगा “दिन ढल जाये हाय रात ना जाए, तू तो ना आए तेरी याद सताए, तुम मुझसे और मैं दिल से परेशां दोनों हैं मजबूर, ऐसे में किसको कौन मनाए।”
दीवानगी और रवानगी बेहद ही होती है इसमें नियम कहाँ बनाए कोई।
समाज के निर्मम यथार्थ को हर पल साथ में घसीटती ये फिल्म हमेशा की तरह दो प्रेमियों को मिलने से तो खैर रोकती ही है, अंदर से उठती हूक़ को आपके अन्दर हस्तांतरित कर देती है न चाहते हुए भी। उस हूक़ को आप अपने अंदर लिए जूझते रहते हैं। पश्चाताप, ग्लानि के पाश में बंधा राजू जब एक अकालग्रस्त गाँव में अपना आश्रय ढूँढता है तब परिस्थितिवश उसे महात्मा समझ लिया जाता है जो कुछ भी कर सकता है। जीने मरने की इच्छा अनिच्छा में झूलता राजू उन मासूम गाँव वालों को अनायास होने वाले चमत्कारों में खुदका हाथ होने का परोक्ष सबूत दे देता है जिससे वो खुद भी अंजान ही है। वहाँ परिस्थितयाँ इतनी बलवती हैं कि न तो गाँव वाले तर्क लगा सकते हैं और न राजू उस तिलिस्म को तोड़ना चाहता है।
गाँव वालों का ये विश्वास कि राजू बारिश लाने में सक्षम है और अकाल से मुक्ति दिला देगा, राजू को ऐसी मनोदशा में फेंक देता है जहाँ शुरू होता है उसका उपवास। जहाँ से शुरू होती है उसकी देह और आत्मा की लड़ाई। भीतर से प्रतिकार और इस दम्भमयी शरीर का हाहाकार उसके दिमाग में विस्फ़ोट करने लगता है।
ईश्वर के पत्थरमयी रूप को पूजते गाँव वालों को देखकर उसका शरीर उसकी आत्मा से कहता है “जहाँ सिर अपने आप झुक जाते हैं उसे भी भगवान का रूप मान लिया जाता है, क्या फर्क पड़ेगा अगर तुम छ्द्म रूप से ही सही इनके लिए भगवान् बने रहो? तुम्हें किस बात की चिंता सर झुका लो और शांत होकर बैठ जा। समझ लो कि करने वाला कोई और है तुम सिर्फ ज़रिया हो। काम उसका नाम तेरा।”
रोज़ी को वहाँ पाकर शांत हो चुके संशय भरे प्रेम का तंदूर एक बार फिर दहक उठता है और राजू एक बार फिर रोज़ी की बाहों में खुद को खो देता है। इस खो देने में जा पहुँचता है अपनी आत्मा के ठीक सामने।
शुरू होता है आत्मा और शरीर का संवाद…
देह- ‘रोज़ी आ गई और माँ भी।’
आत्मा- ‘पानी ना बरसा तो क्या होगा? हज़ारों ग़रीबों की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। मुझे क्या समझेंगे, ढोंगी?’
देह- ‘तुझे यकीं है कि पानी बरसेगा, तू भी इन जाहिलों की तरह अन्धविश्वासी होने लगा? तू ये तो नहीं सोचने लगा कि एक आदमी की भूख का बादलों से कोई रिश्ता हो सकता है?’
देह- ‘उलझनें बढती जा रही हैं। सवाल अब पानी के बरसने या नहीं बरसने का नहीं, सवाल ये नहीं कि मैं जियूँगा या मरूँगा। सवाल ये है कि इस दुनिया को बनाने वाला चलाने वाला कोई है या नहीं। अगर नहीं है तो परवाह नहीं ज़िंदगी रहे या मौत आए। एक अंधी दुनिया में अंधे की तरह जीने में कोई मज़ा नहीं, और अगर वो है तो देखना ये है कि वो सुनता है या नहीं।’
और उसकी ये कश्मकश की तंद्रा टूटती है रोज़ी के आगोश में। एक मनोविश्लेषण के साथ। पहुँचता है वो उस शक्ति और विश्वास के द्वार जहाँ कोई आवाज़ उसे पुकार रही है।
‘मेरे बच्चे, दुःख से घबरा मत, दुःख वो अमृत है जिससे पाप धुलते हैं। मैं तुझसे दूर नहीं, तेरे अन्दर बाहर मैं ही हूँ। सिर्फ मैं हूँ सिर्फ मैं हूँ सिर्फ मैं हूँ…
और राजू की आत्मा अब हर प्रभाव से मुक्त उसके रेंगते हुए शरीर के सामने खुली हवा में महक रही है।
‘आज मैं कितनी आज़ादी महसूस कर रहा हूँ। जिस्म मांगें करना भूल गया है, मन तड़पना भूल गया है। जीवन आज मुट्ठी में है मौत जैसे एक खेल है।’
उसी आत्मा के सामने घायल शरीर ज़मीं पर पड़ा रेंग रहा है जीने की भीख माँग रहा है।
आत्मा खिलखिला रही है ‘लगता है जैसे आज हर इच्छा पूरी होगी लेकिन मज़ा देखो कि आज कोई इच्छा ही नहीं रही।’
शरीर- ‘कम से कम जीने की इच्छा तो ला? राजू मुझे बचा ले?’
आत्मा- ‘तुम अहंकार हो, तुम्हें मरना ही होगा। मैं आत्मा हूँ अमर हूँ। मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है। ना सुख है ना दुःख है। ना दीन ना दुनिया। ना इंसान है ना भगवान है। सिर्फ मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ। दूर पहाड़ पर पानी बरस रहा है। शरीर भीग गया है।’
तभी बादल गरज़ते है तेज़ बिजली चमकती है और होती है तेज़ बारिश। रोज़ी आती है राजू को ये बताने कि तुम्हारा उपवास सफल हुआ देखो लोग नाच रहे हैं बारिश आई है।
राजू कहाँ है अब लेकिन? वो तो जा चुका। सब कुछ जान समझ लेने के बाद अब वो रुकता भी क्यों और कैसे।
पार्श्व में राजू की आत्मा के स्वर… “मौत एक ख्याल है जैसे ज़िंदगी एक ख्याल है। ना सुख है ना दुःख।”
“तुम मुझसे मैं दिल से परेशां दोनों है मजबूर, ऐसे में किसको कौन मनाए…”
सिनेमा शुरू होता है, “अच्छा मिस्टर राजू, रिहाई मुबारक” और खत्म भी तो रिहाई पर ही होता है। आत्मा की देह से रिहाई। हर बंधन से रिहाई।
भारती गौड़