April 3, 2025
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गोलू, भोलू, मोनू संग में
बबली, झबली, भोली है
जोर-शोर सब बोल रहे हैं
होली है भई होली है

पिचकारी से दाग रहे वे
रंग-बिरंगी धार
औ” गुलाल के उड़ा रहे हैं
रंग-रंग के गुबार

कितने बदरंग-बदरंग हो गए
उनके पहने कपड़े
रंगों में पहचान खो गई
हो गए ऐसे मुखड़े

कार्टून जैसे लगते उनके
सचमुच हुलिया-स्वांग
तिस पर मस्ती और उमंग में
गाने लगे हैं फाग

भीड़-भड़ाका, धूम-धड़ाका
गूंज रहे नगाड़े
गूंज रहे हर गली-चौराहे
उल्लासों के नारे

रंगों की बारिश में धुल गए
मन के सभी मलाल
और घरों-घर निकल रहा है
पकवानों का थाल

ऊंच-नीच और जात-पात के
नहीं कहीं हैं भाव
एक प्रेम के घर के जैसा
हुआ शहर, हर गांव

कमलेश चंद्राकर
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
चित्रांकन – डॉ. सुनीता वर्मा।

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