होली है

गोलू, भोलू, मोनू संग में
बबली, झबली, भोली है
जोर-शोर सब बोल रहे हैं
होली है भई होली है
पिचकारी से दाग रहे वे
रंग-बिरंगी धार
औ” गुलाल के उड़ा रहे हैं
रंग-रंग के गुबार
कितने बदरंग-बदरंग हो गए
उनके पहने कपड़े
रंगों में पहचान खो गई
हो गए ऐसे मुखड़े
कार्टून जैसे लगते उनके
सचमुच हुलिया-स्वांग
तिस पर मस्ती और उमंग में
गाने लगे हैं फाग
भीड़-भड़ाका, धूम-धड़ाका
गूंज रहे नगाड़े
गूंज रहे हर गली-चौराहे
उल्लासों के नारे
रंगों की बारिश में धुल गए
मन के सभी मलाल
और घरों-घर निकल रहा है
पकवानों का थाल
ऊंच-नीच और जात-पात के
नहीं कहीं हैं भाव
एक प्रेम के घर के जैसा
हुआ शहर, हर गांव
कमलेश चंद्राकर
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
चित्रांकन – डॉ. सुनीता वर्मा।