आज सत्यदेव दुबे की याद आ रही है
बिलासपुर में 13 जुलाई 1936 को जन्मे छोटी कद-काठी के घुँघराले बालों वाले सत्यदेव दुबे को गोंडपारा से गोलबाजार की सड़कों पर खाकी हाफ़पेंट में खुसी हुई सफ़ेद कमीज पहने पैदल घूमते देखकर कोई अंदाज़ नहीं लगा सकता था कि इस इंसान की खोपड़ी में क्या भरा हुआ है ! इतनी बड़ी बस्ती में केवल दो लोग उनसे बात करते थे, पालेश्वर शर्मा और अशोक राव, शेष लोग न उनसे बात कर पाते, न वे किसी से बात करते। सत्यदेव दुबे अद्भुत पढ़ाका थे, वे पुस्तकों के शब्दों के पीछे की भाषा समझने वाले अपूर्व पाठक थे।
बिलासपुर की गलियों में घूमते-फिरते वे बंबई चले गए, बस्ती के लोगों ने समझा- ‘सत्तू एक्टर बनने बंबई गया है।’ सत्यदेव दुबे ने बंबई में न केवल स्वयं को स्थापित किया वरन बिलासपुर का नाम भी फिल्म और नाटक की दुनिया में प्रकाशित कर दिया।
प्रसिद्ध अभिनेता (स्व॰) अमरीशपुरी अपनी आत्मकथा ‘जीवन का रंगमंच’ में सत्यदेव दुबे को इस तरह याद करते हैं : ‘(सत्यदेव) दुबे साहब ने मुझे शिल्प सिखाया। वे अद्भुत शिल्पी हैं। रंगमंच पर उनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नवीनता एवं गहराई इतनी विविधता लिए हुए होती है कि मैं शब्दों में इसे व्यक्त नहीं कर सकता। समय बीतने के साथ-साथ उनका विकास होता रहा, किसी भी बिन्दु पर ह्रास की स्थिति नहीं आई। वे अभी भी नाटक लिख रहे हैं जो मेरे मतानुसार श्रेष्ठ नाटकों में से है और जब रंगमंच पर अभिनय की बात आती है तो जिस प्रकार की रचना और पुनर्रचना वे करते हैं और जिस प्रकार के अर्थ वे नाटकों को प्रदान करते हैं, वह उल्लेखनीय है और मैं अपने कलाकार होने का समस्त श्रेय भी उन्हीं को देता हूँ। केवल वही मुझसे मंच पर उत्तम कार्य करवा पाए।’
अमरीशपुरी ने लिखा है- ‘दुबे साहब की आश्चर्यजनक प्रतिभा ही केवल उनकी सर्वोत्तम विशेषता नहीं है अपितु उनमें दूसरों में भी इस प्रतिभा का संचार कर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त करने की अनुपम योग्यता भी है। वे चिंगारी को सुलगाना जानते हैं और उन्होंने अपने विचारों से अनेक लेखकों को बेहतर लेखक, निर्देशकों को बेहतर निर्देशक और अनेक कलाकारों को बेहतर कलाकार बनाया है। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि दूसरे की ग्रहण प्रतिभा कितनी है। मुझे लगता है कि यदि दुबे साहब ने मुझे न देखा और न धमकाया होता तो मैं अपनी उत्तम प्रस्तुतियाँ दिए बिना ही जीवन व्यतीत कर इस संसार से चला गया होता। अप्रशिक्षित प्रतिभा जंगल के उन सुंदर और शानदार फूलों के समान होती है जो किसी के द्वारा बिना देखे, सूंघे और प्रशंसा के सूख जाते हैं। हमारे चारों ओर कितनी प्रतिभा बिखरी हुई है और हम उसके अस्तित्व को जानते तक नहीं। दुबे साहब शायद एकमात्र ऐसे अध्यापक हैं जिन्होंने सर्वाधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है। पूरी तरह से अनगढ़, नई प्रतिभाओं को लिया एवं थियेटर गतिविधियों पर अनगिनत कक्षाओं, कार्यशालाओं, शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन किया।’
पद्मविभूषण से सम्मानित सत्यदेव दुबे ने धर्मवीर भारती के नाटक ‘अंधा युग’, गिरीश कर्नाड के नाटक ‘ययाति’ और ‘हयवदन’, बादल सरकार के ‘एवं इंद्रजीत’ और ‘पगला घोड़ा’, मोहन राकेश के ‘आधे अधूरे’ एवं विजय तेंदुलकर के ‘खामोश अदालत जारी है’ और ‘सखाराम बाइंडर’ जैसे नाटकों ने सत्यदेव दुबे को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया। उन्होंने हिन्दी और मराठी में एक फिल्म- ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ और एक लघु फिल्म बनाई- ‘अपरिचय का विंध्याचल’। सत्यदेव दुबे ने श्याम बेनेगल की टीवी सीरियल ‘भारत एक खोज’ में चाणक्य और फिल्म ‘निशांत’ में पुजारी की भूमिका निभाई। उनका निधन 25 दिसम्बर 2011 को मुंबई में हुआ।
वे बिलासपुर के भाल पर चन्दन का टीका थे। द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, बिलासपुर