यूँ तो कहने को जीवन में सुख…
यूँ तो कहने को जीवन में सुख का कोई अभाव नहीं है।
पर जाने कैसी उलझन है, मन में क्यूँ ठहराव नहीं है!
कितने लोगों ने आकर इस जीवन बगिया को महकाया।
पर जो पीछे छूटे उनकी यादों ने रह-रह तड़पाया।
साथ समय के भर जाए जो, ऐसा कोई घाव नहीं है!
अब तक मन की सारी बातें हमने कविताओं में ढाली।
ख़ामोशी को दोस्त बनाया और कलम से प्रीत लगा ली।
अब दिल के कोरे काग़ज़ पर लिखने को कुछ भाव नहीं है!
शायद मन ये धीरे-धीरे दुःख की आदत डाल रहा है।
सूख रहा आँखों का दरिया, अंतिम बूँद सँभाल रहा है।
कह कर जी कुछ हल्का कर ले, अब इसका भी चाव नहीं है!
क्या जाने कैसी उलझन है, मन में क्यूँ ठहराव नहीं है!
-स्वीटी सिंघल सखी