March 6, 2026
images

(आज की लघुकथा)

मसला थोड़ा टेढ़ा था। फूँक-फूँककर बढ़ना था। ख्याति नाम सम्मान भी उसमें जुड़ना था। धन, साधन, और मान भी उसमें मिलना था।

कवि ने निश्चय किया ये पक्का-आत्मकथा लिख डालो भाई, आत्मकथा लिख डालो।

नदी में जैसे हल चलता है, खेत में चलती है नौका। उसी तरह से लय में आकर आत्मकथा लिख डालो भाई, आत्मकथा लिख डालो।

आत्मकथा लिख डाली कवि ने ज़ल्दी-ज़ल्दी। प्रकाशक ने छापा उसको ज़ल्दी-ज़ल्दी। ताकि बिके वो ज़ल्दी-ज़ल्दी। पैसे से दस पैसा आवे ज़ल्दी-ज़ल्दी। ज़ल्दी में सौ गुन है भाई, ज़ल्दी है सौ गुन की माई!

आत्मकथा ने सिद्ध किया कि कवि का कद है ग्यारह फुट का। बाक़ी जो हमदम हैं उनके, सब हैं ग्यारह-ग्यारह इंची।

कवि ने अपने जीवन में चौसठ-पैसठ कन्याओं से प्रेम किया है। कई जगह बम फेंके हैं। खुद कार्ल मार्क्स ने मार्क्सवाद का अर्थ उन्हीं से समझा था।

आत्मकथा घोड़ा बनकर धाम-धाम हो आई। गधा बनी, दोलती झाड़ी। कहीं बनी तलवार गिरी दुश्मन के सिर पर कहीं बनी वह फूल बिछी नेता के पथ पर। कहीं बनी वह सांड मथा मैदान घास का…

कवि ने अपनी आत्मकथा से जो इच्छा थी वह सब पाया।
* * *

———————–
– असगर वजाहत
———————–

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *