March 6, 2026

हिंदी में आज तक नोबेल न मिलने के कुछ ठोस कारण

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शंभूनाथ
ऐसा नहीं है कि यूरोपीय लेखक या लैटिन अमेरिका– अफ्रीका के लेखक नोबेल की लालसा में रहते हैं या वे प्रबंधन का सहारा लेते हैं। कुछ ठोस कारण हैं जिनसे दुनिया के दो–चार करोड़ लोगों की भाषाओं के साहित्यकारों को नोबेल पुरस्कार मिल गया, पर 55–60 करोड़ लोगों की भाषा हिंदी के किसी लेखक को आज तक नहीं मिला।

हिंदी में पुरस्कार छोड़ दीजिए, कभी इसपर भी वैचारिक मंथन नहीं हुआ कि हिंदी में श्रेष्ठ लेखन कैसे हो, व्यक्ति स्तर पर भी शायद सोचने की बहुत कम कोशिश हुई। यहां तक सोचा गया कि रवीन्द्रनाथ ने इट्स से मित्रता का फायदा उठाया या पश्चिम के दो लेखकों के बीच टाई हो गया इसलिए रवीन्द्रनाथ की झोली में पुरस्कार गिरा। ऐसी घड़ियों में 17 वर्ष की उम्र से रवीन्द्रनाथ की यूरोपीय यात्राओं में हुए उनके बौद्धिक एक्पोजर और उनके लेखन के बड़े फलक को लोग भूल जाते हैं।

मुझे हिन्दी के मामले में नोबेल न मिलने के कुछ ये कारण फिलहाल समझ में आ रहे हैं जो जोखिम लेकर कह रहा हूं :

1) हिंदी के प्रेमचंद, निराला जैसे कई महान लेखक अपने देश तक सीमित थे। वे अपने समाज के कई कट्टरवादी दबाओं के बीच लिख रहे थे। उन्हें आर्थिक अभावों की वजह से अपने को ज्यादा विकसित करने और बहुआयामी बनाने के अवसर नहीं मिले। हमारे महान लेखक औपनिवेशिक दबाओं के कारण एक हद तक विश्व साहित्य की प्रवृत्तियों के आगे नहीं पीछे चल रहे थे और सामान्यतः बाहर के प्रभावों के घेरे में थे।

3) हिंदी लेखकों को बांग्ला, मलयालम आदि भाषाओं के लेखकों की तरह तेज बौद्धिक शक्ति वाले पाठक वर्ग नहीं मिल सके। हमारे लेखक वैसी अनोखी सामाजिक हलचलें न पा सके। हिंदी लेखक गीली लकड़ियों को सुलगाने में लगे रहे। एक उद्बुद्ध और खुलेपन से भरा समाज ही बेहतर लेखक पैदा करता है। हम जानते हैं कि कट्टर व्यक्ति बड़ा लेखक तो क्या, अंततः सामान्य लेखक भी नहीं बन सकता। कट्टरता और रचनात्मकता एकसाथ संभव नहीं है।

3) हिंदी के ज्यादातर लेखक यूरोप में बने सिद्धांतों के अनुकरणकर्ता थे। इनसे अधिक दबाए गए, अधिक औपनिवेशिक शोषण से गुजरे और अभावग्रस्त समाज के लैटिन अमरीकी या अफ्रीकी लेखकों ने विदेशी प्रभावों से अपेक्षाकृत मुक्त होकर अपनी सोच और स्वतंत्र कल्पना से लिखा और वंचनाओं को व्यक्त किया।

प्रभाव और अनुकरण में फर्क है। हिंदी लेखकों ने अकसर अपना मॉडल बाहर से चुना, वे बाहर के उद्धरणों में फंसे रहे। इसलिए कमतर और कम अनोखा लिखा।अंग्रेजी में अनुवाद हो भी जाए तो आखिर हिंदी में चर्वितचर्वण नोबेल के निर्णायकों को क्यों पसंद आएगा! एक बड़ा भारतीय विजन चाहिए, केवल घटनाएं बदल देने से बड़ा साहित्य नहीं बनता।

एक उदाहरण है, हिंदी की जिन कृतियों पर लैटिन अमरीकी जादुई यथार्थवाद का असर है, वह मार्खेज जैसे लेखकों के काम से स्वाभाविक रूप से कमतर होंगी। हिंदी वालों को यह जितना अवाक करने वाला लगे, नोबेल के निर्णायकों को कितना प्रभावित करेगा!

4) हिंदी की विमर्शों की दुनिया से जो लेखन आ रहा है, वह हिंदी संसार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पर इसमें शॉर्टकट इतना अधिक है और यह इतना होमोजीनियस होता गया है कि साहित्यिक प्रयोग की उत्कृष्टता की दृष्टि से, यदि अंग्रेजी अनुवाद हो भी जाए तो क्या नोबेल पुरस्कार देने वालों को यह जरा भी आकर्षित कर सकता है?

5) हिंदी के ज्यादातर रचनाकार अपने लेखन को वैश्विक ऊंचाई देने की जगह मुख्यतः आलोचक खोजते रहते हैं और आलोचना को कोसते रहते है। क्या अब तक के किसी नोबेल विजेता लेखकों में यह प्रवृत्ति थी और क्या उन्हें आलोचना ने नोबेल की मंजिल तक पहुंचाया था?
सामान्यतः हिन्दी लेखकों की इच्छाएं बहुत सीमित रही हैं– थोड़ी चर्चा, पाठ्यक्रम में लग जाने, साहित्य अकादमी पुरस्कार या ज्ञानपीठ तक! बाकी, कलह और हिन्दी तो पर्यायवाची शब्द महत्वपूर्ण हैं, इसपर क्या चर्चा करना!

6) हिंदी में हर मामले में संख्या का महत्व गुण से ज्यादा रहा है। हिंदी के 60 करोड़ बोलने वाले हैं, हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसी बुलडोजर के नीचे हिंदी पिस गई! किसी का दिमाग 56 इंच से कम नहीं है। इसलिए खुद कुछ नया सीखना और अपने को भी ब्रेक करने के लिए तैयार करना बड़ा कठिन मामला है। कोई अपनी गुमटी में बैठकर फतवा जारी करता रहेगा, तो विश्व परिदृश्य में कैसे आएगा!

7) नोबेल पुरस्कार न मिला हो, क्या हिंदी का एक भी लेखक पश्चिम या लैटिन अमरीका में एकांश भी उस तरह चर्चा में है और क्या वह उस तरह जरा भी उद्धृत किया जाता है, जिस तरह हम ब्रेख्त, नेरुदा और अचेबे की चर्चा करते और ऐसे लेखकों को उद्धृत करते हैं! हिंदी को इस विडंबना तक पहुंचाने में हमारी सौहार्द विहीन साहित्यिक संस्कृति मुख्य रूप से जिम्मेदार है जिसे जिस बदलने की जरूरत है ।

जाहिर है, हमारा अंधकार ही नोबेल तक पहुंचने के मार्ग में मुख्य बाधक है। मैं खुद इस अंधकार से मुक्त नहीं हूं!

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