साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कृति – दीवार में एक खिड़की रहती थी
विनोद कुमार शुक्ल
दीवार में एक खिड़की रहती थी। खिड़की जिस दीवार में रहती थी वह एक कमरे की दीवार थी। कमरा आम कमरों की तरह नहीं था। इसलिए नहीं कि उसमें एक खिड़की रहती थी। इसलिए कि उसमें जो खिड़की रहती थी वह खिड़की आम खिड़कियों की तरह नहीं थी। वह खिड़की आम खिड़कियों की तरह इसलिए नहीं थी क्योंकि उस खिड़की से होकर आया-जाया जा सकता था। खिड़की से होकर जिस दुनिया में आया-जाया जा सकता था वह दुनिया आम लोगों की दुनिया नहीं थी। वह दुनिया सोनसी और रघुवर प्रसाद की दुनिया थी। सोनसी और रघुवर प्रसाद की दुनिया आम दुनिया नहीं थी। सोनसी और रघुवर प्रसाद की दुनिया सोनसी और रघुवर प्रसाद की दुनिया थी। खिड़की के बाहर की दुनिया केवल सोनसी और रघुवर प्रसाद की दुनिया थी। इस दुनिया में केवल सोनसी और रघुवर प्रसाद ही घूम-फिर सकते थे। खिड़की से केवल सोनसी और रघुवर प्रसाद ही आ जा सकते थे। खिड़की के बाहर की दुनिया देखने की लालच में एक दिन रघुवर प्रसाद का विभागाध्यक्ष अपने बच्चों और बीवी को लेकर आया था। परंतु रघुवर प्रसाद का घर उस दिन उसे बंद मिला था।
खिड़की से होकर सात साल की एक गुड़िया भी झांक सकती थी। गुढ़िया का झांकना रघुवर प्रसाद को अच्छा लगता था। वह उसे ’ब में छोटे उ की मात्रा बुढ़िया’ कहकर चिढ़ाने का प्रयास करता था। गुड़िया चिढ़ती नहीं थी, कहती थी, ’नहीं, ग में छोटे उ की मात्रा गुड़िया।’
खिड़की से होकर झांकने वाले दो बच्चे और थे। सिर खिड़की तक पहुँच जाय इसके लिए उन लोगों ने खिड़की के नीचे ईंटें जमा रखी थी। ईंट बेतरतीब जमें हुए थे। बच्चों की सुविधा के लिए रघुवर प्रसाद ने उन्हें तरतीब से जमा दिया था।
खिड़की के बाहर की शेष दुनिया में गोबर से लीपी हुई पगडंडी थी। पगडंडी पत्थरों के बीच से होकर गुजरती थी। पगडंडी के दोनों ओर आम और नीम के वृक्षों का विस्तार था। पीपल और गूलर के भी वृक्ष थे। शिवलिंग के आकार का भी एक पेड़ था। यहाँ से अक्सर हवन की खुशबू आया करती थी। बेर, मकोय और दूसरे वृक्ष भी थे। आम और नीम में बौर आ चुके थे। आम में अंबियाँ भी आ चुकी थी। पेड़ों पर बंदरों का झुंड भी था। तोते, गौरैया और दूसरी पक्षियाँ भी होते थे। नीलकंठ भी होता था। नीलकंठ केवल सोनसी और रघुवर प्रसाद को दिखाई देते थे।
पगडंडी से लगी हुई बूढ़ी अम्मा की झोपड़ी थी। बूढ़ी अम्मा बूढ़ी थी। वह चाय बनाती थी। जब वह चाय नहीं बना रही होती तो अपने झोपड़ी के आसपास के जंगल को बुहार रही होती थी।
पगडंडी के दूसरे छोर पर तालाब था। तालाब में मछलियाँ होती थी। तालाब में रहने वाले पक्षियाँ होते थे। तालाब का जल साफ होता था। उसमें कमल के फूल तैर रहे होते थे। सफेद कमल का तालाब अलग था। लाल कमल का तालाब अलग था। तालाब के आगे नदिया बहती थी। और आगे जाने पर तहसील कार्यालय पड़ता था।
तालाब और नदिया सोनसी और रघुवर प्रसाद के नहाने के लिए थे। सोनसी और रघुवर प्रसाद जब नहाने जाते थे तब बूढ़ी अम्मा उन्हें चाय पिलाया करती थी।
नदिया के रेत में सोने के कण पाये जाते थे। बूढ़ी अम्मा नदिया से सोने के कण झारती थी। उसके पास सोने के कड़े थे। सोने के कड़े उन्होंने सोनसी के लिए बचाकर रखे थे। एक दिन उन्होंने सोने के कड़े सोनसी को पहना दिया था।
एक कमरा, एक पूरा-पूरा घर था। घर था तो उसमें एक दरवाजा भी था। घर दाऊ के बाड़े का हिस्सा था। दरवाजे के बाहर की दुनिया खिड़की के बाहर की दुनिया से अलग दुनिया थी। घर के बाहर की दुनिया में पड़ोसी थे। घर से राष्ट्रीय राजमार्ग नौ तक जाने के लिए कच्चा मार्ग था। वहाँ से आठ किलोमीटर की दूरी पर जोरागाँव में एक निजी महाविद्यालय था। रघुवर प्रसाद इसी महाविद्यालय में व्याख्याता थे। महाविद्यालय में प्रचार्य है और रघुवर प्रसाद का विभागाध्यक्ष भी है।
रघुवर प्रसाद सांवले रंग का बाईस-तेईस साल का युवक है। वह दोनों हाथ से लिख सकता है। शाम के समय वह पड़ोस के बच्चों को भी पढ़ाया करता है। सोनसी उनकी पत्नी है। रघुवर प्रसाद का कमरा गृहस्थी के लायक व्यवस्थित नहीं था। उसकी बहन और जीजा भी इसी शहर में रहते हैं। उसकी बहन ने रघुवर प्रसाद के कमरे को गृहस्थी के लायक व्यवस्थित कर दिया है। एक दिन गाँव से रघुवर प्रसाद के पिता जी आते हैं। उन्हें कमरा व्यवस्थित दिखता है और कुछ दिन बाद वह सोनसी को रघुवर प्रसाद के पास छोड़ जाता है।
महाविद्यालय जाने-आने के लिए रघुवर प्रसाद के पास सायकिल नहीं है। गाँव में पिता जी की पुरानी सायकिल पड़ी हुई है। सायकिल चलने लायक नहीं है। सायकिल को ठीक करवाकर उसे ले आने की रघुवर प्रसाद की योजना है। अभी वह टेंपो से जाना-आना करता है। महाविद्यालय जाने के समय एक हाथी भी आता है। हाथी एक साधु का है। साधु बनारस का रहने वाला है। परिचय हो जाने के बाद रघुवर प्रसाद हाथी में बैठकर महाविद्यालय जाना-आना करने लगता है।
राजमार्ग पर जिस जगह वह टेंपो और हाथी के आने की प्रतीक्षा करता है वहाँ पर एक पान ठेला है। चाय की एक गुमटी भी है। कुछ दूरी पर एक कतार में ताड़ के चार पेड़ हैं। नीम का भी एक पेड़ है। पेड़ में बारह साल का एक बालक छिपकर बैठा रहता है। वह बीड़ी पीने के लिए वहाँ छिपकर बैठा रहाता है। बीड़ी पीने की आदत के कारण उसका बाप उसे डंडे से मारता है इसलिए वह पेड़ में छिपकर बैठा रहता है। एक दिन बालक का छिपा रहना रघुवर प्रसाद से छिपा नहीं रह पाता। तब वह पेड़ बदलकर गूलर के पेड़ पर चला जाता है। गूलर का पेड़ रघुवर प्रसाद के कमरे से जादा दूर नहीं है।
रधुबर प्रसाद के कमरे में सोनसी की टीने की एक पेटी है। एक चारपाई है। चारपाई केवल सोने के लिए नहीं है। जब भी पिता जी, माँ और छोटा भाई छोटू या केवल माँ और छोटू गाँव से कुछ दिन रहने के लिए यहाँ आते है तब सोनसी के कपड़े बदलने के लिए चारपाई आड़ का काम भी करता है। कमरे में सभी लोग रह लेते थे। कमरा पूरा-पूरा एक घर था।
रघुवर प्रसाद और सोनसी साथ होते हैं तो बहुत सारी बातें कर रहे होते हैं। हमेशा। चुप रहते हैं तब भी। कल्पना में। सपनों की तरह। जब सचमुच में बात कर रहे होते हैं तो वे सपने में बात कर रहे होते हैं की तरह बात कर रहे होते हैं। रघुवर प्रसाद और सोनसी की यथार्थ की दुनिया सपनों की दुनिया की तरह की दुनिया होती है। रघुवर प्रसाद और सोनसी की दुनिया दरवाजे के बाहर की दुनिया की तरह की दुनिया नहीं होती है। रघुवर प्रसाद और सोनसी की दुनिया खिड़की के बाहर की दुनिया की तरह की दुनिया होती है। खिड़की के बाहर की दुनिया में भारतीय मध्यवर्ग के संघर्ष और यथार्थ की दुनिया उसके सपनों की दुनिया की तरह घुलमिल जाती है।
कुछ दिन गाँव रहकर सोनसी जब लौटती है तो वह पिता जी की सायकिल को लेकर लौटती है। ठीक करवाकर। कुछ दिन गाँव में रहकर सोनसी अपने सपनों की दुनिया से वंचित हो रही होती थी। गाँव से लौटना सोनसी के लिए सपनों की दुनिया में लौटने की तरह थी। सोनसी का गाँव से लौटना उस कमरे में लौटना था जिसके दीवार पर एक खिड़की रहती थी। उस कमरे में लौटना था जिसके भीतर खिड़की से बाहर की दुनिया में विचरण के लिए ले जाने वाला उसका रघुवर प्रसाद होता था।
विनोद कुमार शुक्ल की भाषा दुनिया में केवल विनोद कुमार शुक्ल के पास ही हो सकती है। विनोद कुमार शुक्ल की शैली दुनिया में केवल विनोद कुमार शुक्ल के पास ही हो सकती है। जैसे मुक्तिबोध की भाषा और शैली केवल मुक्तिबोध के पास ही हो सकती है। जैसे पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी की भाषा और शैली केवल पदुम लाल पुन्ना लाल बख्शी के पास ही हो सकती है। विनोद कुमार शुक्ल की भाषा में छत्तीसगढ़ियापन की मिठास भी घुलीमिली है। राजनांदगाँव का नंदगइहापन भी घुला मिला है। विनोद कुमार शुक्ल रायपुर में रहते हुए भी राजनांदगाँव में रहते हैं जैसे कनक तिवारी दुर्ग में रहते हुए भी राजनांदगाँव में रहते हैं।
कुबेर
25 अक्टूबर 2025