April 24, 2026

छत्तीसगढ़ी कहानी के शतकवीर चंद्रहास साहू

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जब साहित्य की चर्चा होती है, शिष्ट साहित्य या लिखित साहित्य की ही अधिक होती है। लोक साहित्य जो लोक को वाचिक परंपरा के रूप में दीर्घ काल तक समृद्ध करता रहा है, हासिये में है। लोक साहित्य ही है, जिसके आलोक में लोक अपना प्रतिबिंब निहारता रहा। खुद को गढ़ता रहा। समय की तेज प्रवाह में स्वयं को मज्जित कर लोक सभ्य होने का दंभ भरता है। कितना सभ्य हुआ है, यह एक अलग विषय है। सभ्यता के विकास के साथ लोक संस्कृति, लोक परम्परा, लोक साहित्य और लोक मान्यताओं में कुछ परिवर्तन आए हैं। यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है। लोक सभ्य समाज का लिबास ओढ़कर शिष्ट या लिखित साहित्य के सापेक्ष लोक साहित्य को हेय दृष्टि से देखने की भूल करता है। इसकी उपेक्षा करता है। निश्चित ही यह कष्टकारी है। लोक का एक बड़ा वर्ग है, जो स्वयं को बौद्धिक समझता है। चेतना युक्त मानता है। किंतु यही वर्ग साहित्य को शिष्ट साहित्य के रूप में लोक साहित्य से पृथक खड़ा भी करता है। जबकि इसके नींव में लोक साहित्य ही है। शिष्ट साहित्य लोक साहित्य की उपादेयता है, कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
लोक में कहानी दादी-नानी की परियों वाली कहानियों से शुरू होती है। जंगल और जंगल के जीवों की कहानी गढ़कर पंचतंत्र की कहानियाॅं लिखी गईं। हितोपदेश की कहानियाॅं भी लोक से प्रेरित हैं। लोक की प्रेरणा के बिना साहित्य का सृजन संभव ही नहीं है।
जीवन में तब आज जैसा संघर्ष नहीं था। सबके जीवन में संतोष था। शांति थी। चेतना जागृत होने पर संचय की प्रवृत्ति ने लोक की आदत बिगाड़ दी। लोक स्वार्थ की परिधि में सिमटने लगा। समाज में विकृति और विसंगति दोनों सुरसा की मुख तरह बढ़ने लगीं। ग्राम्य जीवन की तुलना में शहरी या नगरीय जीवन में यह विसंगति कुछ तेजी से बढ़ी।
लोक से जुड़े लोक-मान्यता, लोक-परम्परा, लोक-संस्कृति और लोक साहित्य आज भी दूर अंचल में संरक्षित है। वहाॅं का समाज संगठित है। समाज संरक्षण की मुद्रा में खड़ा नजर आता है। बस जरूरत है कि परम्पराएं, मान्यताएं, संस्कृति और साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव गहराए नहीं। ये सभी लोक को नवजीवन देती हैं। उसे नवीन ऊर्जा से भर देती हैं।
छत्तीसगढ़ साहित्य में कहानी लेखन की सुदीर्घ परंपरा है। जिनमें कितने ही नाम सुनहरे पंक्ति में शामिल किए जा सकते हैं। चाहे यह परंपरा लोककथाओं को सहेजने के रूप में हों या फिर स्वतंत्र रूप से कहानी लिखने की हो। छत्तीसगढ़ी कहानी को समृद्ध करने में डॉ. पालेश्वर शर्मा, पं श्याम लाल चतुर्वेदी, डॉ. परदेशी राम वर्मा, केयूर भूषण, डॉ. बल्देव, बिहारी लाल साहू, सुशील भोले, मंगत रविन्द्र, परमानंद वर्मा, मेहतर राम साहू, डॉ. पीसी लाल यादव, कुबेर साहू, शिवशंकर शुक्ल, डॉ. जे आर सोनी, सरला शर्मा, शकुंतला तरार, सुधा वर्मा, रामनाथ साहू जैसे कहानीकारों के नाम प्रथम पंक्ति में आते हैं।
छत्तीसगढ़ी कहानी अपने आप को मांजती हुई हिंदी कहानियों के अनुरूप ढाल रही है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ी कहानी लेखन के महायज्ञ में पद्मा साहू, टीकेश्वर सिन्हा, डॉ चुन्नी लाल साहू, गया प्रसाद साहू, अनिल भतपहरी, चंद्रहास साहू, जीतेन्द्र वर्मा, जयाभारती चंद्राकर, धर्मेंद्र निर्मल, डोरेलाल कैवर्त्य, चोवाराम वर्मा ‘बादल’ पोखन लाल जायसवाल, गीता शिशिर चंद्राकर, भोला राम सिन्हा सहित कई, नई पीढ़ी के रचनाकार अपनी समिधा डालने का कार्य कर रहे हैं।
कहानीकारों की मेहनत और लगन को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आज छत्तीसगढ़ी कहानी के कथानकों में समय के अनुरूप विविधताएं हैं। आज छत्तीसगढ़ी कहानी शोषण, भ्रष्टाचार, किसानों की पीड़ा, नारी विमर्श, जीवन संघर्ष, पर्यावरणीय चिंता जैसे विषयों पर लिखी जा रही है।
कहानीकार चंद्रहास साहू मेरी जानकारी अनुसार छत्तीसगढ़ी कहानियों के पहले शतकवीर हैं। सौ से अधिक कहानी लिख चुके चंद्रहास साहू, जिनका पांच संग्रह आ चुका है। ये संग्रह उन्हें वर्तमान दौर के रचनाकारों में प्रथम पंक्ति में खड़े करते हैं।
“एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।” इस पंक्ति को अपने जीवन में अमल करते हुए चंद्रहास साहू छत्तीसगढ़ी कहानी लेखन में बरसों से रत हैं। उनके कहानियों में पौराणिक पात्र और घटनाओं का समावेश प्रसंगनुकुल पाठक को आकर्षित करता है। उनके कहानियों में छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं सामाजिक चित्रण मिलता है। लोक संस्कृति, मान्यताओं और पर्वों से जुड़ीं कहानियाॅं यहॉं के लोकजीवन की यात्रा कराती हैं।
क्रमशः —

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