October 21, 2026

राजी सेठ आज इस संसार से विदा हो गयीं…

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राजी सेठ आज इस संसार से विदा हो गयीं… चुपचाप… बहुत मिलना चाहा…मिलना संभव नहीं हुआ… पहले वो जब भी मिलीं बहुत सारा स्नेह दिया…उन पर कुछ नहीं लिखा…उषा प्रियंवदा से एक बातचीत का मैंने लिप्यंतरण भर किया… एक अंश उसी बातचीत से…
उनकी स्मृति को प्रणाम

8 दिसंबर 2003, दिनः मंगलवार
राजी सेठ और उषा प्रियंवदा की बातचीत

राजी सेठः जब भी आप आती हैं तो यह बहुत ही उत्तेजक मौक़ा होता है मिलने का. ऐसा लगता है कि जिन लोगों को हमने इतने शौक़ से, प्यार से पढ़ा था, मतलब उनको सामने देखते हैं तो… तुम यह मानोगी न कि हमेशा यह बहुत ही उत्तेजक मौक़ा होता है…. जिनको हम पढ़ते हैं और उनको सामने देखते हैं तो विश्वास ही नहीं होता कि क्या यह सच में हो रहा है? क्या ये वे ही लोग हैं? और फिर यह होता है कि उनसे जुड़ें….
उषा प्रियंवदाः बिल्कुल ठीक…

राजी सेठः उनके बारे में पढ़ा है , उनको हम जोंड़े. फिर एक-एक कर देखें. तुम यह मानती हो कि हमारी इस प्रकार की जो इच्छा है उसका वास्तविक आधार… हम यह क्यों चाहते हैं कि जो वह लिखता है हमें दिखाई देता है जबकि लिखने की सारी प्रक्रिया आंतरिक होती है. हम लेखक के साथ जुड़े रहते हैं—उनकी कुछ कहानियों से, उनके कुछ वाक्यांशों से, उनकी भाषा से तो ऐसा कभी सोचा है…, हालाँकि पश्चिम में यह बात बहुत देखी-पढ़ी जाती है. ख़ासकर उसके व्यक्तित्व और लेखन को लेकर…
उषा प्रियंवदाः हाँ, मेरे ख़याल से मेरा पाठक पढ़ता है. जब भी कोई पाठक या पाठिका कोई भी रचना पढ़ता है तो जो लेखक ने या लेखिका ने लिखा है, उसके साथ जो पाठका की अपनी संवेदना है, अपने जीवन का अनुभव हैं… वो उसमें रंग भरते रहते हैं. लेखक से मिलने के लिए इसलिए ललक होती है, यह देखने के लिए कि हमने जो मापदंड या मानसिक आकार बनाया है–वह वैसा ही है– है. जैसे एक दक्षिण की पाठिका थी, उनको यह नहीं मालूम था कि (केरल में कथा-साहित्य पर रिसर्च कर रही थीं) मैं कौन हूँ, कहाँ रहती हूँ… उनकी इमैजिनेशन कि मैं बोहेमियन टाइप की, दिल्ली की काफी हाउस में बैठी रहती हूँ और जब उनको यह पता चला कि ऐसा बिल्कुल नहीं है तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ. मेरे विचार में यह बात है, मगर कभी-कभी लेखक से मिलकर निराशा भी होती है. इसके दोनों पक्ष हैं. मुझे उम्मीद है कि राजी तुमको बहुत निराशा नहीं होगी.

राजी सेठः नहीं! बल्कि मुझे तो हमेशा यह सवाल जो है, वो मेरे दिमाग़ में रहता है कि कितने सालों से तुम अमेरिका में हो…
उषा प्रियंवदाः अब तो गिनती भी भूल गयी हूँ.

राजी सेठः अच्छा! इतने लंबे सालों से हो, मुझे तुम्हारी रचनाओं में पूरी भारतीयता, पूरा भारतीय संस्कार… वैसे ख़ास बात यह है कि पात्रों की मानसिकता और उसके अंतर्द्वंद्व… इस प्रकार के हैं कि संबंधों के प्रति जिस प्रकार की भावात्मक प्रतिक्रिया… और उसको परिवार और उसका जो नॉस्टेल्जिया, ये सारी चीज़ें मुझे इतनी ज़्यादा दिखाई देती है कि कभी-कभी मुझे यह पूछने का मन होता है कि तुम सारे लोग… यह कहती हो कि परिवेश जो है वो एक बड़े तरीक़े से हमारी रचनाओं में आता है, तो तुम अपने परिवेश को कैसे हैंडल करती हो? क्योंकि सारा परिवेश तो तुम्हारा दूसरा है… तुम्हारा लेखन जो है वह बहुत ही उससे… तुम्हारी जड़ों से जुड़ा हुआ है. मुझे ऐसा लगता है. पिछली बार भी तुम्हारे एक उपन्यास का एक हिस्सा संवाद में सुना था, तब भी मुझे यही फीलिंग हुई थी तो सबसे ज़्यादा तो यह सवाल परेशान करता है तुमको लेकर…
उषा प्रियंवदा ः अच्छा, इसके तो दो कारण हैं, शायद यह हो सकता है कि जो मेरा व्यक्तित्व था, या है, वो दो अलग-अलग कंपार्टमेंट्स में विभक्त हो गया है. मैं विदेश में रहती हूँ और वहाँ हर काम अंग्रेज़ी में होता है, अंग्रेज़ी में पढ़ाती हूँ, अंग्रेज़ी में पढ़ती हूँ, अख़बार अंग्रेज़ी में पढ़ती हूँ, टीवी अंग्रेज़ी में देखती हूँ. उसके नीचे एक परत है जो कि कहो कि जो स्वाभाविक प्राकृतिक उषा है, जिसे अभी भी भारतीय हिंदी पढ़ना अच्छा लगता है, हिंदी बोलना अच्छा लगता है…. हिंदी में बतरस बहुत अच्छा लगता है… वो मज़ा अंग्रेज़ी में नहीं आता. जब मैं लिखने बैठती हूँ तो जो मेरा परिवेश है… अमेरिकी परिवेश है उससे मैं एक बहुत ही गहरे स्तर पर… जहाँ से जन का उत्स होता है उस समय मैं उससे कट जाती हूँ… और मैं बिल्कुल अपने ऑरीजिनल फॉर्म में आ जाती हूँ. इसीलिए मुझे हिंदी लिखने मेंं इतना आनंद आता है, इतना रस आता है… हालाँकि बाहर रहने से मेरी शब्दावली, मेरा शब्दकोश जो है, यह सब मुझे लगता है कि सीमित हो गया है…. अकसर शब्दों को ढूँढ़ना पड़ता है कि इसकी हिंदी क्या है? वो उतने नेचुरली नहीं आते हैं क्योंकि फेस टू फेस संवाद नहीं होता है…और जो मेरा बचपन है, जो बचपन रहा है जिसने मुझे बनाया है, जिसमें बहुत सारे इंफ्लुएसेंसेस वर्क कर रहे थे जिसको मैं बहुत ज़माने तक सोचती थी कि मैं बहुत फॉचुनेट नहीं हूँ. मगर एक मोड़ या एक पल ऐसा आया कि मुझे लगा है कि वाक़ई मेरा जो बचपन था, बहुत ही ज़्यादा समृद्ध था, मेरे बचपन में और उस समय के परिवेश ने मुझे इतना कुछ दिया है कि वो अब तक फलीभूत हो रहा है. मैं तुमको एक़्ज़ांपुल दूँ कि मैंने देशप्रेम की कहानियाँ नहीं लिखी हैं. मगर ये भारत के प्रति मेरा गहरा लगाव कोई ओढ़ा हुआ नहीं है. वो मेरी विरासत है… वो इसलिए कि मेरे परिवार में विशेष तौर से मेरे बड़े भाई पक्के गांधीवादी थे और स्वतंत्रता सेनानी भी. तो पहला मौक़ा मुझे याद है निर्मल वर्मा ने बहुत ही सुंदरता से एक जगह लिखा है कि देशप्रेम के बारे में…उनके लिए वो है जबकि वे छोटे से थे, उनकी माँ उनको जगाकर बोलीं कि नदी के ऊपर से पुल या किसी पुल के ऊपर से नदी…के ऊपर से पुल गुज़र रहा है सिर्फ़ पैसा फेंक दो… तो वह स्मृति उनके मन में टँगी रह गयी कि यह है, यह है मेरा देश, यह स्मृति…
उस तरह से मेरी स्मृति यह है कि मैं छह साल की थी मेरे पास एक फ्राक थी, पीले मखमल की फ्राक थी, उसमें बहुत खूबसूरत बटन सामने से लगे हुए थे. तो घर में बहुत अजीब-सा माहौल था.. लोग आ रहे थे, झाड़ू लगा रहे थे, सफ़ाई हो रही थी,सजाया जा रहा था और उसी गहमागहमी में वो मेरी मखमल की फ्राक उतारकर मुझे खद्दर की छींट की फ्राक पहना दी गई. राजी… वह इस कारण कि उस दिन जवाहरलाल नेहरू हमारे घर आ रहे थे. मेरे भाई शिवम लाल सक्सेना ने कहा था कि चूँकि मैं सबसे छोटी हूँ इसलिए मैं उनको माला पहनाऊँ. तो मुझे लगता है कि वो मखमल उतारकर जो खादी का स्पर्श मेरी त्वचा में था वो जैसे बस गया है और वही मेरे लिए बड़े-बड़े फतवे देना या हमारा भारत महान है वो नहीं बल्कि आंतरिक लगाव जो है भारत से, भारत की जगहों से वो उसी क्षण से जन्मा है… तो जो कुछ मेरा परिवेश बना, मेरे प्रेरणास्रोत बने… चूँकि मेरे भाई उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे जिनमें एक आदर्श था, एक उदारता थी और उन्हें बहुत गर्व था कि हमने अपना सारा जीवन होम कर दिया… आजकल के नेता नहीं थे और उनके साथ मैं जितने भी राजनीतिज्ञों से मिली उन सब के पास एक आदर्श था, जैसे कि लालबहादुर शास्त्री उनके बहुत निकट के मित्र थे तो वो किसी तरह से…वो भी मेरे मन में है और चूँकि मैं उस समय बड़ी हो रही थी, भारत को आज़ादी मिली थी, तो उस समय के जितने भी विचार थे, जो मेरे भाई के विचार थे और चूँकि जेनरल विचार थे कि लड़कियों को पढ़ाना चाहिए, लड़कियों को विवाह के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए उस सबका फल मुझे मिला. जब मैंने दादा से कहा कि मुझे फुलब्राइट स्कालरशिप मिल गयी है आगे जाकर अमेरिका में पढाई के लिए तो वे बहुत ही खुश हुए और उन्होंने कहा मुझसे देखो… तुम एक बात याद रखना कभी ऐसा काम मत करना जिससे भारत को लज्जा आये. और मैं सोचती हूँ कि सायास ढंग से नहीं, मगर हर तरह से मैंने यही प्रयास किया है कि जो मुझसे मिले या मेरे संपर्क में आए उसकी एक छवि बने कि भारत ये है और मैं स्वतंत्र भारत की एक प्रोडक्ट हूँ. मनोज मोहन

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