March 5, 2026

महानता और सरलता दोनों सहेलियां एक साथ…

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देश के एक सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण साहित्यकार, विनोद कुमार शुक्ल बीती शाम गुजर गए, तो अस्पताल के उनके आखिरी कुछ हफ्तों की अलग-अलग तस्वीरों और खबरों से पता लगा कि वे कागज-पेन लेकर किस तरह कुछ न कुछ लिखते रहते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री और दूसरे लोगों द्वारा की गई सेहत की पूछताछ के दौरान यह भी कहा था कि लिखना उनके लिए सांस लेने की तरह है।
88 बरस की उम्र में एक व्यक्ति सबकुछ पा लेने के बाद भी लिखने की अपनी हसरत को इस हद तक जारी रखता है, यह देखकर थोड़ी सी हैरानी होती है। आज जब अच्छे-खासे जवान लोग सड़क किनारे किसी चाय-ठेले पर, या किसी पेड़ के चबूतरे पर बैठे हुए सुबह से रात कर देते हैं, और कोई काम नहीं करते हैं, तब विनोद कुमार शुक्ल काम की एक ऐसी मिसाल पेश करते हैं जिसकी बराबरी कर पाना शायद उनके ही करीबी लोगों के लिए भी आसान नहीं होगा।
विनोद कुमारजी को मैंने एक बार उनके घर पर उनके पसंदीदा पेड़ के साए में इंटरव्यू किया था। टीवी चैनल के कैमरे पर रिकॉर्ड उस इंटरव्यू की बातें मुझे अभी पूरी तरह याद नहीं हैं क्योंकि समाचार चैनलों के काम की संस्कृति में याद रखने की जरूरत कम रहती है, पूछने, और उसी पल सुनने से काम चल जाता है। फिर भी मुझे उनकी सादगी, सरलता, विनम्रता, और उनका स्नेह अच्छी तरह याद है क्योंकि इन्हें कैमरे पर रिकॉर्ड नहीं करना पड़ा था, यह दिल में दर्ज हो गया था कि इतने सम्मानित, पुरस्कृत, और विख्यात लेखक का व्यवहार किस तरह किसी भी अहंकार से मुक्त है। विनोद कुमारजी के मुकाबले जो लोग साहित्य में कहीं नहीं हैं, जो लोग राह चलती संस्थाओं से सम्मान पाकर बादलों पर पांव धरकर चलने लगते हैं, उन लोगों का बर्ताव देखें तो लगता है कि विनोदजी फलों से लदे हुए पेड़ की तरह विनम्रता से झुके रहते थे।

उनके साहित्य को पूरी तरह समझना मेरी तरह की सामान्य समझ-बूझ के लोगों के लिए आसान नहीं था, लेकिन बातचीत में वे कमसमझ लोगों के लिए भी उतने ही विनम्र रहते थे जितने विनम्र वे शायद अपने साहित्य के सबसे अधिक जानकार लोगों के लिए रहते होंगे।

कैमरे पर दर्ज बातचीत के अलावा वे अपने घर के अहाते में लगे पेड़ को लेकर भी बात करने लगते थे, और फूलों की खुशबू को लेकर भी। जो साहित्य के बड़े-बड़े मंचों से भी बचते थे, वे मेरे सरीखी टीवी रिपोर्टर से भी बात करते हुए सरल बने रहते थे।

मेरा उनसे रूबरू वास्ता बहुत कम रहा, लेकिन उनके अच्छे-खासे जानकार लोगों से मैंने उनके बारे में जो सुना, वह उनके साहित्य की असाधारण उत्कृष्टता बताता है, उनके बहुत ही मौलिक किस्म के लेखन, और बहुत ही गहरी समझ भी बताता है। कैसे कोई महान होते हुए भी एक अविश्वसनीय सी सादगी से भरे रह सकते हैं, इसकी एक जीवंत मिसाल विनोद कुमारजी रहे।

उनके जाने के बाद भी उनकी बहुत सी किताबें, बहुत सा प्रकाशित और अप्रकाशित लेखन रह गया है, लेकिन मैंने लोगों से उनके जो संस्मरण सुने हैं, ऐसा लगता है कि वे भी उनके लेखन जितने ही होंगे, उससे हो सकता है कि कई गुना अधिक होंगे। आने वाले महीनों में हमें उनसे मिलने, और जानने वाले लोगों से उनके बारे में बहुत कुछ और पढ़ने-सुनने मिलेगा, जो कि एक बार फिर हमें यह समझने का मौका देगा कि महान और सरल, दोनों ही एक साथ कैसे हुआ जा सकता है।

हो सकता है कि उनके चाहने वाले लोगों में से कोई सोशल मीडिया पर, स्मृति-विनोद कुमार शुक्ल जैसा कोई पेज बनाए जिस पर उनके बारे में अभी लिखे जाने वाले सभी संस्मरणों को रखा जा सके।

आज मैं यह नहीं पूछूंगी कि क्या सोचते हैं आप।

– तृप्ति सोनी

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