क्यों उड़ चले सहसा दिगन्त?
विकुशु!
मेरे अंचल के प्रिय कवीन्द्र!
आकाश भर अपने परों में –
क्यों उड़ चले सहसा दिगन्त?
पौष के इस शुक्ल पक्ष में
अभी दिवस तीन ही बीते थे
और विकुशु! इस हिन्दी-वन में
तुम मावस का घना अंधकार बिखेरकर
चले गये!
कार्पोरेट दानवों के पंजों से
कहाँ बच सके वनांचल
वन-हत्यारों ने
काट दिये रायगढ़ के जंगल,
छिन ली हसदेव का हरित-अंचल
और बस्तर की पुरातन मादकता
जंगल-के-जंगल उजाड़ फेंके
इन तथाकथित अडानीसुरों ने
धन-गंध ही चीन्हा
नहीं चीन्ह पाये धान-गंध!
जाओ, विकुशु!
ब्रह्माण्ड के किसी शुक्ल छोर तक
‘एक पूर्व में बहुत से पूर्व’ लिये
अपनी कविता के वितान संग
जाओ
रचना-
एक नवल संसार
जहाँ एक हरा-भरा बस्तर हो
और अनेक उछलती-कूदतीं महानदियाँ!
© निमाई प्रधान ‘क्षितिज’ निमाई प्रधान ‘क्षितिज’
23 दिसम्बर, 2025
(प्रिय कवि विनोद कुमार शुक्ल के देहावसान पर)