आज एक पुरानी कविता
संपूर्ण का अंश
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एक टुकड़ा धूप का ही तो हूँ मैं
और तुम बेकार ही मुझे
सूरज समझते रहे
समझने वालों ने
कुछ गलत भी नहीं समझा
परंतु मैंने क्या समझा
यह भी तो महत्वपूर्ण है
अगर यह विश्वास पुख्ता है कि
मैं धूप का एक टुकड़ा भी हूँ
तो क्या यह कम है
संपूर्ण का अंश होना भी तो
महत्वपूर्ण है
सृष्टि में कुछ शब्द
यूँ ही उछाल दिए जाते हैं
जैसे— संपूर्ण,
संपूर्ण सत्य,
संपूर्ण ज्ञान,
संपूर्ण निष्ठा,
संपूर्ण संबंध,
संपूर्ण प्रयास और
संपूर्ण विश्वास
इनमें से कुछ भी संपूर्ण नहीं होता
जीवन-पर्यंत प्रयास करते रहो
परंतु पूर्ण नहीं होता
मैं तो धूप का टुकड़ा ही ठीक हूँ
उतनी ही गर्मी रखता हूँ
जो तुम्हें जला न दे और
उतनी ही शीतलता रखता हूँ
जो वातावरण के तापमान को
मनुष्यता के अनुकूल बनाए रखे
मैं धूप का टुकड़ा जो ठहरा
इस टुकड़े की परिधि में
सभी संबंधों को तुम जी सकते हो
बिना आडंबर के भी रह सकते हो
चूँकि व्यास छोटा होगा
तुम्हारी धूप का
सो ज़ख़्मों को अपने तुम सी सकते हो
अब मैं क्यों
सूर्य होने का खतरा कैसे उठा लूँ
जीवन की आग को कैसे संभालूँ
दो क़दम आगे चलूँ या
कुछ क़दम पीछे लौटा लूँ
मेरे संग को तुम समझ गए न
मेरे संबंधों को तुम समझ गए न
मेरी सृष्टि को तुम समझ गए न
और मेरी दृष्टि को भी तुम समझ गए न
मेरा सूरज से इतना ही संबंध है
जितना नमक का समुद्र से
सुख-दुःख में आँखों का पानी पिघलता रहे
और मेरा जीवन सूरज की तरह जलता रहे
आज फिर एक
असफल प्रयास कर रहा हूँ
ख़ुद को
धूप का एक टुकड़ा कह रहा हूँ
कोई शंका हो तो
मेरी परिधि को परिभाषित कर देना
जो तुम्हें ठीक लगता हो, वह कह देना
फ़िलहाल, मुझे धूप का टुकड़ा
बने रहने दो
जितना हँस पाता हूँ
मुझे हँस लेने दो
मुझे धूप का टुकड़ा बने रहने दो
— आशीष कंधवे
27 दिसंबर 2021