फूल, फ़िराक और जीवन
फ़िराक़ साहब को फूलों के पौधे बहुत पसंद थे। चाहे वे किसी किस्म के हों, बस उनका ख़ुश रंग होना काफ़ी था। एक बार मुझे लॉन में ले जाकर एक-एक पौधे के बारे में विस्तार से बताते रहे कि “किसको कहाँ से, किस तरह से और कितनी क़ीमत में हासिल किया है। कौन कितनी ज़िंदगी का वाहक है, कौन अब ख़त्म होने वाला है।” जब हम ख़त्म होने वाले पौधे के क़रीब पहुँचे तो मेरे मुँह से निकल गया कि हुज़ूर… “इनमें से एक पौधा मुझे इनायत कर दें…” मेरे मुँह से अभी यह वाक्य पूरा भी न होने पाया था कि बिगड़ गए। “ख़बरदार! ये पौधे मेरी जान हैं। इन्हें जोश और मजनूँ भी माँगें तो नहीं दे सकता।”
अंग्रेज़ी साहित्य के कुछ विचारकों का ख़याल है कि जिस फ़नकार की शुरुआती ज़िंदगी नाकाम और उदास रहती है, उसके यहाँ एक विशेष क़िस्म की अना (Ego) और ज़िद पैदा हो जाती है, और वह अपने पढ़ने-लिखने की शुरुआत ज़्यादातर अपने ख़्यालात से संबंधित लिखकर करता है। अंग्रेज़ी साहित्य में आत्मकथा के पीछे कुछ इस क़िस्म के कारण पेश किए जाते हैं। फ़िराक़ साहब के सिलसिले में यह बात मानी जा सकती है कि वह ज़बरदस्त अहम्मन्य (Egoist) थे। गुरूर भी था। जोश ने उन्हें मजमूअए अज़्दाद (विरोधाभासों का संग्रह) कहा। शायरी में भी यदि आप अध्ययन करें तो उनके ज़्यादातर तख़ल्लुस वाले शे’रों में फ़िराक़ आसमान को छूते नज़र आएँगे, लेकिन यह सब उनके लेखों और रचनाओं में मिलता था। बातचीत में मैंने इस तरह की बातें बहुत कम ही पाईं।
यह बात ग़लत भी हो सकती है, क्योंकि फ़िराक़ साहब के क़रीब मैं उसी वक़्त आया जब वह बुढ़ापे की ओर थे। जिस्म की आँच निकल रही थी। साँसों में थकान के आसार नुमायाँ हो चले थे। लेकिन ज़ेहन हमेशा ताज़ा और जागता रहता। आँखों में चमक और ज़िंदगी मरते दम तक ख़त्म न होने पाई। दिमाग़ी तौर पर मैंने हमेशा उन्हें चौकन्ना पाया, और ऐसी गुफ़्तगू में रचना हो रही होती। जब कभी उनकी उँगलियों में जुंबिश शुरू होती, पुतलियों के रक्स (नाच) से आँखें डूबने लगतीं। दिमाग़ फ़िक्र की साँस लेने लगता तो हम समझ लेते कि रचनात्मक गुफ़्तगू का वक़्त आ गया है और हम ध्यान से सुनने लगते।
बातचीत के दौरान मीर आते। मोमिन और अमीर मीनाई का भी ज़िक्र आता। दाग़ और नूह के चर्चे होते। बातचीत का उतार-चढ़ाव बड़े-बड़े दीदों की ऊँच-नीच फ़ैसला करता था कि वह किस शायर को क्या स्थान दे रहे हैं। दाग़, सीमाब और ख़ास तौर पर नूह का ज़िक्र करते वक़्त उनके हलक़ से बारीक हँसी की आवाज़ निकलती। लेकिन जल्द ही वह गंभीर होकर कहते कि उर्दू शायरी को मुखलिसाना (सच्ची) और उस्तादाना आहंग से मालामाल करने में जो काम इन उस्तादों ने किया, वह फ़िराक़ भी न कर सका। इसी तरह वह अज़ीज़, आरज़ू वग़ैरह का ज़िक्र भी क़द्र से किया करते। फिर बातचीत के दौरान अगर फ़िराक़ आ जाते तो आ जाते, वरना उन्हें फ़ुरसत कब थी कालिदास, तुलसीदास, कीट्स, वर्ड्सवर्थ, टेनीसन, मीर, अनीस, मोमिन वग़ैरह से नीचे उतरने की।
~ प्रो. अली अहमद फ़ातमी