अपने गिरेबान में…..!!
कलम चल रही है, लेखन जारी है….!!
सच कहूं …..!! मन लिखने से पहले, अपनी ही कसौटी पर तुलता पूछता है, क्या लिख रहे हो, क्यों लिख रहे हो…!! लिखने से किसी की वेदना पर फाहा रख पाओगे….!! लिखने से किसी को कुछ फायदा पहुंचा पाओगे….!!
केवल
शब्दों से खेल रहे हो तुम
नहीं जानते
शब्दों में प्राणों को भरना
किसी की पीड़ा के क्षणों में
नजदीक खड़े होकर
भीगी थी संवेदना….!!
अपनी शिराओं में महसूस की
किसी की सिहरन
महसूस की
अपनी आंतों में
किसी की भूख की ऐंठन….!!
अपने अहम की चुभन में
बांट पाए
कभी फूलों के स्पर्श….!!
लिखना केवल लिखना नहीं है और जिस बिंदु पर लिख रहे हो वह केवल विषय नहीं है…!! सामाजिक विसंगतियों से हमारे अंदर कंपन हुआ
संवेदना कुछ थरथराई …!!
किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मर रहे हैं… हमने लिखा…. मन को संतुष्टि हुई … नारी शोषण और नारी मुक्ति… हमें नया विषय मिलता है…. हम खूब कलम खींचकर लिखते हैं बगैर अपने घर की स्त्री को देखें….!! अलबत्ता यदि गहन लेखन के कारण खीज और क्रोध बढ़ जाता……, कारण अकारण त्योरियां चढ़ जाती तो , डर जाती….. सहम जाती… स्त्री…
हम बगैर उस डरी हुई स्त्री को देखें.. उसके विषय पर लिखते रहे…!!
स्त्री….!!
किताब चाहती है
अपना पढ़ा और समझा जाना
हर व्यक्ति ने पकड़ रखी है
हाथों में उल्टी किताब
पढ़ने और समझने के
दावे के साथ….!!
बाल श्रमिक….. एक और नया विषय अनेक पहलुओं से जोर-शोर से लिखा बाल श्रमिक पर,…. मगर हर पांच मिनट में रामू को नया काम बताते हुए…!! बिगड़े हुए काम पर धमकाते हुए..…!! लिखते रहे बाल श्रमिक की वेदना पर, उसके अधूरे छोटे बचपन पर।….!!
वह छोटा लड़का
मेरे बेटे का हम उम्र तो है
लेकिन दोस्त नहीं….!!
अक्सर सफाई करते वह
डालकर मेरे बेटे के जूते में पैर
नापता है एकदम बराबर…..!!
अक्सर वह लॉन पड़े
उल्टे कनस्तर पर बैठ
खाना खाते लेता है
डाइनिंग टेबल का स्वाद
वह आश्चर्य से देखा है….
बेटे के दूध पीने के इनकार को….!
जैसे कि वह पी सकता है
कई गिलास दूध….!!
उसके समझौते हैं
कचौटते हैं मुझे
उतरन देकर
नहीं करती उसे
और बौना….!!
उसके हाथों में
कुछ विचार देकर देती हूं
अनार का अ ,
आम का आ
सड़क का स और
मंजिल का म
शराबबंदी नशाखोरी…. एक और गहन विषय… जोरदार तर्कों से हम रखते हैं अनेक बिंदुओं पर वजन…. सरकार की नीतियां,अय्याशी, शराब खोरी… मुंह की दुर्गंध को रुमाल से हटाते हुए… क्या हम जा पाए शराबी पति से रोज पिटती हुई महरी के घर….!!
महंगी खर्चीली शादियों और व्यंजनों की अतिरंजीता पर आक्रोश हुआ..… हमने लिखा और फिर उंगलियां चटकाते घड़ी की ओर देखते हैं….. रिसेप्शनम में जाना है…!!
इतना ही नहीं हम मन के षड्यंत्र में उलझते करते हैं स्वाद और विविध व्यंजन की बारीकियां , खूबियां गिनाते हुए… वाह वाह वाह !!….
और फिर टूट पड़ते हैं कागज कलम लेकर नए ज्वलंत विषय पर, आक्रामक लिखने के लिए….!!
….!! खाना खाने के बाद बुद्धिजीवी, कलमकार करते हैं जोरदार चर्चा सुबह के शानदार आलेख पर….!!
सिगरेट गुटखा तंबाकू संवैधानिक चेतावनी पर प्रकाश डालते हुए … तर्को के चप्पुओं से नाव खे ते हए…।
लेखन का काम बहुत तनाव और जिम्मेदारी का विषय है……!!
कम से कम सिगरेट तो पीना ही पड़ती है।
कलम पराधीन है,….” स्याही और हाथों से चलती है” काश वह स्वयं चल पाती… तो निश्चय ही लिखती काले विचारों के नीचे छुपा हुआ धवल सत्य, श्वेत समाधान…..!!
ठहरो,
रोको….!!
शब्दकोश से
कविता की ओर दौड़ते शब्दों को
शर्त है
शब्दों को जिंदा करने के बाद ही
खड़ा किया जाए
कविता की पंक्ति में….!!
विद्या गुप्ता दुर्ग