एक गोंड गाँव में जीवन (संस्मरण)
पाठ – पंद्रह
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एक गोंड गाँव में जीवन ( संस्मरण )
लेखक – वेरियर एल्विन
वन्या प्रकाशन ( अंग्रेजी संस्करण )
राजकमल प्रकाशन ( २००७ – हिंदी में )
( २०११ में द्वितीय संस्करण )
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ब्रिटिश लेखक वेरियर एल्विन ने ‘ एक गोंड गाँव में जीवन ‘ नामक किताब एक यात्रा संस्मरण की तरह लिखा है जो नर्मदा नदी के उद्गम के बाद फैलाव में मंडला जिला के बैगा-गोंड इलाके में कुछ साल व्यतीत करने के दौरान जो देखा , महसूस किया | वे तो अंग्रेज शासन काल के १९२७ में एक पत्रकार की हैसियत से भारत पधारे थे और साबरमती आश्रम में महात्मा गाँधी के सानिध्य में समाज सेवी की तरह जीवन जीने के आदि होते चले गए थे | वे गाँधी की जीवन शैली , विचार , सिद्धांत और अनुशासन से बेहद प्रभावित थे और उन्हें बेहद करीब से महसूस कर अपने देश की सर्वशक्तिमान सत्ता के सामने सही तस्वीर पेश करना चाहते थे इसलिए गाँधी जी की प्रेरणा से घूम-घूमकर भारत में ही पत्रकारिता के जीवन को सार्थक करने में जुट गए |
उन्हें प्रसिद्ध समाज सेवी जमनालाल बजाज के सुझाव से छत्तीसगढ़ के घोर दरिद्रता वाले गांवों की तरफ भेजा गया और स्थानीय लोगों की तरह अति-अल्प सुविधा और संसाधन से ही समाज के बीच जीवन यापन कर उनकी यथाशक्ति सेवा करते हुए रिपोर्टिंग का दायित्व सौंपा गया | बिलासपुर या पेंड्रा तक रेल से सफर करने के बाद घाटियों , बीहड़ों और बिना पुख्ता सड़क वाले गांवों की यात्रा क्षेत्र में सर्वसुलभ बैलगाड़ी के सहारे ही करना होता था | लेकिन जिस पर गाँधी के अनुशासन और सिद्धांत का मुलम्मा चढ़ गया हो वह इन सब दुविधाओं-दुश्चिन्ताओं से पार पा ही जाता है या पार पा लेने की क्षमता विकसित कर लेता है | नर्मदा नदी का विस्तार मैकाले पर्वत श्रेणियों के बीच से होते हुए डिंडौरी और मंडला के आसपास गोंड – बैगा आदिवासियों की गहन आबादी है | उन जनजातियों की जीवन शैली और जानवरों के रहन सहन में खास फर्क नहीं था | गंभीर बीमारियों से पीड़ित होकर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में चट-पट मर जाना ही नियति थी एकमात्र | यौन बीमारियों , छूत की बीमारियों और कोढ़ जैसी घातक बीमारी घर घर में पसरी हुई थी | धुर दरिद्रता वाले अंचल में पशुओं की तरह का जीवन जीने वाले ग्रामीणों के बीच सामंजस्य बिठाने में ऐश्वर्य की जिंदगी जीने के आदी एक अंग्रेज ( लेखक ) को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी ये किताब में दर्ज सहज वर्णन से समझा जा सकता है जहाँ आदिम काल से भौतिक संसाधनों के मुकाबले सीमित प्राकृतिक-अन्धविश्वासी तरीकों से ही समस्याएं हल करने का रिवाज रहा है | वन्या प्रकाशन के अध्यक्ष आर.एन.बैरवा भूमिका में कहते हैं कि “ हर एक सभ्य समाज की यह सर्वोपरि आवश्यकता है कि वह अपनी जनजातीय संस्कृति , परम्परा , आख्यान , मिथक , विश्वास और जीवन से एक आत्मीय परिचय एवं रिश्ता कायम करे | “ शायद यही वह विचार था जिसे जूनून की तरह लेखक वेरियर एल्विन ने धुर जंगली गांवों में सालों रहकर गोंड जनजाति के जीवन को एकदम नजदीक से देखने , समझने और जानने का साहस कर सके और जिसे अपनी पत्रकारिता के माध्यम से विश्व के सभ्य समाज के सामने प्रक्षेपित कर सके |
मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस किताब के प्रकाशित होने के बीस साल बाद हिंदी में इसका प्रकाशन हुआ और हमारे देश में भी जन-जन तक प्रसारित करने का प्रयास फलीभूत हुआ | सन १९२७ में जब एल्विन घोर दरिद्रता वाले देश भारत आये तब लोग उससे इसका कारण पूछते थे | आक्सफोर्ड में मित्रों ने उन्हें महात्मा गाँधी के अहिंसक आदर्शवाद , रविन्द्रनाथ ठाकुर की अन्तर्रष्ट्रीय संस्कृति और भारतीय रहस्यवाद के प्रति बहुत उत्साहित किया था | हालाँकि एक समय वे वे आक्सफोर्ड में ही रहकर एक प्राध्यापक बनाना चाहते थे | फिर भी एक बात मन में घर कर गई कि मात्र शैक्षिक जीवन ही पर्याप्त नहीं है | उनके देश और उनकी जाति ने जो हानि भारत की की है उसकी इस सेवा के माध्यम से शायद कुछ भरपाई की जा सके और यथास्थिति से गोरों को अवगत कराया जा सके | तब तक भारत के घोर उपेक्षित इलाकों में मिशनरियों ने खासी पैठ बना ली थी और वे कुछ हद तक उन दरिद्रों की शिक्षा , स्वास्थ्य और अन्धविश्वास से मुक्ति की दिशा में उल्लेखनीय काम कर चुके थे लेकिन फिर भी दोनों विषम सभ्यता के बीच सामंजस्य और समझदारी की एक भयंकर गहरी खाई तो विद्यमान थी ही | अपने कर्मक्षेत्र के लिए एल्विन ने गोंड गाँव के करंजिया गाँव नामक एक ऐसे प्राकृतिक रमणीक जगह को चुना जो कल-कल बहती नर्मदा नदी के किनारे एक ऊँची पहाड़ी पर थी और वहां एक घास और मिट्टी के गरे से बना चर्च था | उसी जगह आश्रम बनाकर रहने का निश्चय किया जहाँ से दूर-दूर तक हरी-भरी घाटियाँ और छितरे हुए गाँव आसानी से हरदम निहारे जा सकते थे |
जहाँ से छोटी पगडंडियाँ देखने में अच्छी लगती हैं
जो अपने से बेहतर खामोश पगडंडियाँ की तलाश में चलती हैं |
और जहाँ –
कोमल पांव वाली परियाँ गोल दायरा बनाकर नाचती हैं
चाँद की पीली रौशनी में ,
कभी-कभी डुबोते हुए
अपने चुराए बच्चों की ताकि वे
बुढ़ापे और नीरस मृत्यु से आजाद हो सकें |
मिट्टी और फूस के गारे से बनी झोपड़ी से जो नजरिया बनता है वह जिंदगी से ज्यादा मांगने को मना करती है | सहज रूप से खुश रहना और मन से सरल रहना ही उनके सबसे कीमती साधन और सामान थे |
इस सचित्र किताब में डायरीनुमा वर्णन रोजनामचा की तरह ऐसे पिरोये गए हैं कि पाठक भी उन्हीं के साथ सुबहो-शाम की जहालत भरी परिश्रम और रात की झींगुरों की झुंझलाहट को आसानी से मह्सूस कर सके | आश्रम में धीरे धीरे लोगों की आवजाही शुरू होती है और एक सहृदय गोरे अंग्रेज के प्रति विश्वास पनपने लगता है | साथ में एक डाक्टर भी है जो ग्रामीणों की भाषा और तकलीफों को बेहतर समझ सकता है और अंग्रेज को उसकी भाषा में समझा कर इलाज कर सकता है | जब गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों का आना अधिक हो गया तब उसी जगह मिट्टी के गरे और घास-फूस और पेड़ की टहनियों से एक बड़ा अस्पताल भी बना दिया | आश्रम के पास रहते हुए इलाज करना इन्हें ठीक लगा | उनके सूर्यमुखी बच्चे अभागे की तरह जीवन जीने के लिए विवश हैं , तब लेखक ने कुछ स्थानीय मदद से उसी प्रांगण में एक स्कूल भी खोल दिया और आसपास ढेर सारे रंगीन फूलों की क्यारियां लगा दी | अब बच्चे नियमित भोजन के साथ खुशबूदार फूलों के सानिध्य में रहने को लालायित होने लगे | लोग अधिकतर सिफलिस , गनौरिया जैसे यौन रोग से पीड़ित थे और अपनी तरह से खुद इलाज करते हुए गल गल के मरने की नियति पा चुके थे | मलेरिया के अलावा कोढ़ नामक भयंकर बीमारी भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या थी और इन सबके उपर कुपोषण की मार अत्यंत पीड़ादायक थी | पेट भी जब सामान्य आहार से दो समय नहीं भरा जा सकता तब पौष्टिक आहार की बात करना तो बेमानी ही है |
लेखक ने अपने और ग्रामीणों के बीच के वार्तालाप और व्यवहार को एकदम सरल शब्दों में वर्णित किया है लेकिन पढ़ते हुए पाठक को उन शब्दों और वाक्यों के बीच की संवेदना भी समझ में आने लगती है | बीच बीच में लेखक कुछ दिनों के लिए बम्बई , पूना , वर्धा जैसे नगरों की भी यायावरी कर लेता है और कुछ आवश्यक जरूरतें जुटाते हुए वापस आश्रम में आकर उन लोगों में बाँट देता है | निश्चित रूप में पहले उनके लिखे या उन जैसे और भी लेखकों के नजरिये से दुनिया के लोगों ने भारत के बारे में यहीं समझ पैदा की होगी कि यह साँपों , जादू-टोना और अंधविश्वासों का ही देश है जहाँ घोर गरीबी में जीते हुए भी गुलामों की जिंदगी स्वीकारने में लोग सहज और सरल रहते हैं | वे ग्रामीण तो तब महत्मा गाँधी को भी नहीं जानते थे बल्कि उन्हें महात्मा नाम से ही चिढ़ थी | वे सिर्फ अपनी जरूरतों पर ही ध्यान केन्द्रित कर जैसे तैसे जीवन यापन करने भर की ही सहूलियत चाहते थे | पढ़े लिखे लोगों से वे दूरी बनाये रखते थे | वे कहते थे कि बच्चों को भी इनसे दूर रखना चाहिए क्योंकि वे पढ़ लिखकर बाद में लड़कियों को पत्र लिखेंगे , सम्बन्ध बनायेंगे और कम उम्र में खुरापाटी जीवन जीने लग जायेंगे |
अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद नरेंद्र वशिष्ठ ने किया है और बिना मूल भावना के छेड़-छाड़ यह दोष-रहित अनुवाद सराहनीय है | भूमिका , दूसरे संस्करण की प्रस्तावना , प्राक्कथन , १९३२, १९३३, १९३४, १९३५ नामक उपशीर्षकों में दर्ज बयोरों के बाद अंत में दी गई टिप्पणियों के माध्यम से कुछ जरुरी स्थानीय शब्दों के तर्कसंगत मायने भी बताये गए है | इन पांच सालों में ( १९३१ से १९३५ तक ) कुछ ऐसे रोचक किरदारों से लेखक की मुठभेड़ या मुलाकात होती है जिसका वर्णन पढ़ते हुए हास्य बोध के साथ ही साथ आश्चर्य का आभास होता है और आँखों के सामने हैरतअंगेज दृश्य सजीव होकर कुछ देर सोचने को मजबूर कर देते है |
० मलेरिया के लिए मुक्ति एक कारगर हथियार है जैसे भारत की आजादी के लिए एक गाँधी टोपी |
० ईसाई लोगों के छूत से मुक्ति के लिए घर आंगन की गोबर लिपाई |
० कबिले के अन्दर किसी औरत के साथ नाजायज सम्बन्ध रखना गौ-हत्या की तरह का पाप है यदि लोगों को इसका पता चल जाय | अगर पता नहीं चले तो यह कोई पाप नहीं है |
० क्या तुम सोचते हो कि बच्चों को पीटना जरुरी है ? हाँ , इससे वे अनुशासन में रहते हैं |
० तुम एक मुसलमान के हाथ से खाना क्यों नहीं खाना चाहते ? इस बात का गाँव वालों के पास कोई ठीक ठीक जवाब नहीं है |
० जंगलों में साज एक पेड़ है जिसकी टहनी को तोड़कर उसके नीचे खाई हुई कसम को तोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि उस पेड़ के नीचे बुढा देव का निवास होता है |
० एक अंग्रेज दोस्त मेरे पास एक कहावत भेजता है – एक उर्वर बगीचे को बनाने की उत्तेजना आदमी को अध्यात्मिक चीजों के लायक नहीं छोड़ती |
अंतिम पंक्ति को लिखने की जरुरत उस मित्र की इसलिए पड़ी होगी क्योंकि लेखक ने अपने हितैषियों से जरुरी चीजों में कई किस्म के फल-फूल के बीजों , उपयोगी खादों और जरुरी कीट-नाशकों की मांग की रही होगी , हालाँकि लेखक की माँ अपने बेटे के उद्यम और चाह का सम्मान करते हुए चाकलेट , ब्रेड , चाकू , किताबें, तौलिया , जेम जैसी चीजें भेजकर ही संतोष पा लेती थी और बेटे के स्वास्थ्य की चिंता करती थी | लेकिन लेखक अपनी प्यारी माँ और मित्रों को पत्र में लिखता है – “ गोंड लोग जो मेरे बगीचे में काम करते हैं उनका कहना है कि फूलों को देखकर उन्हें बहुत शांति मिलती है |