March 5, 2026

व्यंग्य और व्यंग्यकारों के बीच: रमेश नैयर

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छत्तीसगढ़ में लगभग एक समय में चार बुद्धिजीवी अपने प्रभामंडल से प्रभाव डाल रहे थे – ये हैं ललित सुरजन, रमेश नैयर, कनक तिवारी और सतीश जायसवाल. इन चारों प्रबुद्धजनों ने स्वयं बड़े फलक पर अपनी पहचान बनाई, अपने आसपास लिखने पढने वालों को जोड़े रखा, रचनात्मक वैचारिक आयोजनों को अपना समर्थन दिया, साहित्य और पत्रकारिता के बीच सेतु बने रहे, हिंदी व्यंग्य और व्यंग्यकारों से अपना जुडाव बनाए रखा. ललित सुरजन के अंतरंग साथी थे प्रभाकर चौबे और त्रिभुवन पाण्डेय. रमेश नैयर ज्यादा दिखे लतीफ़ घोंघी, विनोद शंकर शुक्ल के साथ. कनक तिवारी लिखने बोलने दोनों में व्यंग्य चेतना से सदैव भरे रहे. सतीश जायसवाल की व्यापकता हर तरह से बनी रही. एक बार सतीश जी के कार्यकाल में नैयर जी मुझे बख्शी सृजनपीठ में मिल गए. मैं ऑफिस से लौट रहा था तो मेरे पास बी.एस.पी.कैंटीन के बालूशाही थे. उसे खाते हुए किंचित व्यंग्य से उन्होंने पूछा “ये आप लोगों को ‘सब्सडाइस्ड रेट’ में मिल जाता है न?”

रमेश नैयर जी से पहली मुलाकात व्यंग्य के सिलसिले में ही हुई थी. फिर उनसे होती मुलाकातों में विचार और व्यंग्य हमेशा हमारे साथ बने रहे थे. वर्ष २००३ में नैयर जी ने एक व्यंग्य-संकलन भी सम्पादित किया था ‘साधो जग बौराना’ नाम से. विद्या विहार प्रकाशन-नई दिल्ली से छपे इस संग्रह में उन्होंने छत्तीसगढ़ के हिंदी व्यंग्यकारों की रचनाओं को सम्मिलित किया था. इस संकलन की उन्होंने लम्बी भूमिका भी लिखी थी.

वे साल ११९३ के दिन थे जब मेरा पहला व्यंग्य-संग्रह ‘मेरा मध्यप्रदेशीय ह्रदय’ छपकर आया जिसका ब्लर्ब विख्यात व्यंग्यकार रवीन्द्रनाथ त्यागी ने लिखा था. नैयर जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि ‘रवीन्द्रनाथ त्यागी ने श्रेष्ठ व्यंग्य लिखे हैं.’ मेरे व्यंग्य तब के प्रमुख अख़बार देशबन्धु और नवभारत के अवकाश अंकों में ज्यादा छप रहे थे. मुझे लगा कि मेरे इस संग्रह के लिए सबसे उपयुक्त अतिथि ललित सुरजन ही हो सकते हैं पर वे उपलब्ध नहीं हो सके. नवभारत के विद्वान संपादक कुमार साहू आयोजनों में कहीं आते जाते नहीं थे. अब मेरे पास कोई सर्वथा योग्य संपादक नहीं था. तब किसी ने बताया कि रायपुर में रमेश नैयर आए हैं. वे यहीं रायपुर के हैं पर ज्यादातर बड़े अख़बारों से जुड़कर बाहर ही रहे थे. वे दिल्ली के ‘सन्डे आब्जर्वर’ अख़बार की पत्रकारिता छोड़कर अब अपने गृह-नगर रायपुर आ गए हैं और स्वरुप चंद जैन के नए अख़बार ‘समवेत शिखर’ के संपादक हो गए हैं. उनसे परिचय होने के बाद अख़बार में एक धारावाहिक छपा करता था ‘किस्सा शहरयार और उसकी बीवी का’ यह अरेबियन नाईट की कोई कथा थी जिसमें प्रस्तुतकर्ता का नाम छपा करता था ‘रमेश नैयर’. संभवतः यह कोई उनका अनुवाद कर्म रहा होगा.

मेरे सामने शुभ्रवस्त्र-धारी एक सुदर्शन व्यक्तित्व बैठे हुए थे. मुझ जैसे उभरते लेखक को जानने का तो सवाल ही नहीं उठता था. मैंने अपना परिचय देते हुए अपना संग्रह उन्हें भेंट किया और मुख्य अतिथि के रूप में उन्हें भिलाई होटल के आयोजन के लिए आमंत्रित कर लिया. उन्होंने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी थी. फिर इस्पात नगरी भिलाई में १२ जून’९३ शनिवार को उनके मुख्य-आतिथ्य में संपन्न हुए लोकार्पण कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक धाकड़ व्यक्तित्व उपस्थित हुए थे जिनमें थे – लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पाण्डेय, प्रभाकर चौबे, विनोद शंकर शुक्ल, उमेश शंकर शुक्ल, कनक तिवारी और डॉ.मनराखन लाल साहू.

इन सभी महामनाओं ने अपने वक्तव्यों से व्यंग्य को भरपूर ताप और सम्प्रेषण दिया था. तब रमेश नैयर जी ने अपने विद्वता पूर्ण और शालीन व्यक्तित्व व वक्तव्य से सबके अंतर्मन को छू लिया था. यह अविभाजित मध्यप्रदेश का समय था और मेरे संग्रह का नाम था ‘मेरा मध्यप्रदेशीय ह्रदय’ तब इनसे झंकृत होता हुआ उनका मुख्य वक्तव्य था : “आज समाज के हर क्षेत्र में चारों तरफ विकट विसंगतियां फैली हुई हैं. ऐसी परिस्थिति में व्यंग्यकार ही सामने आकर समाज को सही दिशा दे सकता है. मध्य्यप्रदेश का रचनाकार देश और समाज की सारी विसंगतियों पर अपनी पैनी नजर रखे हुए हैं. यही कारण है कि आज देश में सबसे ज्यादा व्यंग्यकार मध्यप्रदेश में हैं.’

रमेश नैयर जी खुद ज्यादा व्यंग्य नहीं लिखे पर व्यंग्य को लेकर उनकी समझ और दृष्टि पूरी तरह से सुलझी हुई और परिपक्व लगती थी. यह व्यंग्य के आयोजनों में चर्चाओं में यदाकदा उनकी टिप्पणियों से प्रमाणित भी होता था. वे अपनी मित्र मंडली में अक्सर व्यंग्यकारों के साथ दिख जाते थे. व्यंग्य के आयोजनों में वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे. एक बार नगपुरा-दुर्ग में ‘व्यंग्य-यात्रा’ पत्रिका के राष्ट्रीय आयोजन में वे व्यंग्य-पाठ सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे जब संचालक महोदय ने रचना पाठ के लिए मेरा नाम पुकारने में विलंब किया तब उन्हें पूछ दिया कि ‘और विनोद साव को कब बुलाओगे?’ उन्होंने अपने संकलन में मेरा व्यंग्य ‘जंगल की ओर’ को शामिल किया था. इस रचना को वे नवभास्कर में भी पहले छाप चुके थे. इस संकलन में नैयर जी की अपनी भी एक व्यंग्य रचना थी ‘चिड़िया के बैठने तक’ शीर्षक से.

व्यंग्य को लेकर उनके कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण हैं. वे लिखते है कि ‘व्यंग्यकार आलोचक होता है, इसलिए उसकी अभिव्यक्ति में कई बार निर्ममता का भी आभास होता है. व्यंग्यकार के मन में परिस्थितियों की विद्रूपता के प्रति गहन आक्रोश हो सकता है, पर मलिनता नहीं. अपने आक्रोश को अपनी रचना के माध्यम से व्यक्त करते हुए व्यंग्यकार की भावना कल्याण की होती है.’

अपनी पत्रकारिता की दृष्टि और व्यंग्य-चेतना के कारण उनके विश्लेषण परक वक्तव्य मौजू होते थे. चुनाव के समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान था. होने वाले चुनावों में टीवी के चैनलों में मतदान के रुझानों पर वे बेबाक चर्चा करते हुए देखे जाते थे. इन चुनाव विश्लेषणों में सुशील त्रिवेदी जी भी दिख जाया करते थे. जब मेरा व्यंग्य-उपन्यास ‘चुनाव’ पुरस्कृत हुआ तब नैयर जी ने कुछ और उपन्यासों के साथ उसकी भी समीक्षा नवभास्कर में की थी. जब यहअख़बार दैनिक भास्कर हुआ तब इसमें मुझे साप्ताहिक स्तम्भ लिखने का सुअवसर मिला था. इस स्तम्भ का नाम था ‘मैदान-ए-व्यंग्य.’

जब नैयर जी नव-भास्कर (दैनिक भास्कर का पूर्व नाम) के संपादक थे उस कार्यालय में आना जाना होता रहता था. उस समय उनके दिए हुए साहित्य के टिप्स सुनने वालों के लिए महत्वपूर्ण होते थे. उनके मजेदार टिप्स दुर्ग में साक्षरता भवन में भी सुनने को मिलते थे जब वे अपने समधी साहब साक्षरता भवन के तत्कालीन अधिकारी डी.एन.शर्मा के साथ होते थे. उम्र में अंतराल होने के बाद भी बातचीत में वे पूरी रूचि लेते थे. एक बार वे गिरीश पंकज को लेकर हमारे घर दुर्ग पधारे थे. तब उन्होंने बड़े प्रेम से आइसक्रीम खाई थी. एक बार मैं रायपुर के उनके निवास जा पहुंचा था. उनके सामने रखी टेबल में अख़बार पत्रिकाओं किताबों का ढेर था. वे भोजन कर सिगरेट पी रहे थे. उन्होंने मुझे चाय पिलाई और फिर खुद सिगरेट पीते हुए मेरी ओर भी अपना पैकेट बढाया था. मैं जब उनसे मिलकर बाहर निकला और अपनी स्कूटर पर बैठा तब श्रीमती नैयर स्कूल जाने के लिए बाहर निकल रही थीं. उन्होंने मुझे रास्ते में कहीं छोड़ देने के लिए कहा तब वैसा करते हुए मैं अपने शहर दुर्ग की ओर निकल पड़ा था.
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– विनोद साव
(रमेश नैयर केंद्रित ग्रंथ ‘साधक संपादक’ के लिए)

वर्ष १९९३ में भिलाई निवास में मेरे पहले व्यंग्य-संग्रह ‘मेरा मध्यप्रदेशीय ह्रदय’ का विमोचन करते हुए नैयर जी.

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