मिट्टी के आकाश ढोते लोग
(दंतेवाड़ा : स्मृति नोट्स )
एक
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सड़क पर चलते हुए वे लोग नहीं दिख रहे थे, बल्कि मिट्टी के बने हुए कुछ छोटे-छोटे ब्रह्मांड चल रहे थे। वे अपने कंधों पर और सिर पर घड़े नहीं, अपनी प्यास का भूगोल ढो रहे थे। विनोद जी होते तो शायद कह उठते : “वह आदमी जो घड़ा ढो रहा था, दरअसल वह अपने भीतर की ख़ाली जगह को बाहर के पकने के बाद घर ले जा रहा था।”
दो
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धूप बहुत चमकदार थी, इतनी कि वह घड़ों के पकने की गंध को दूर तक फैला रही थी। वे घड़े जो अभी थोड़े पहले आग में तपकर निकले थे, अब आदमी की सार्थकता का ‘शील’ बन गए थे। घड़ों के भीतर जो ख़ालीपन है, वही उनकी सार्थकता है। अगर वे भर दिए जाते, तो वे इतने हल्के़ नहीं होते कि उन्हें बहँगी पर टाँगकर मीलों चला जा सके।
तीन
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एक कंधे पर टिका हुआ बाँस का डंडा केवल लकड़ी नहीं है, वह संतुलन की एक लंबी कविता है। बाँस के एक छोर पर दुःख लटका है, दूसरे पर सुख । और आदमी बीच में अपनी रीढ़ को सीधा रखकर इस तरह चल रहा है जैसे वह समय के माथे पर एक पक्की लक़ीर खींच रहा हो।
चार
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वे स्त्रियाँ जो सिर पर घड़े रखे हैं, वे गर्दन नहीं हिलातीं। उन्हें पता है कि संतुलन अगर ज़रा भी हिला, तो मिट्टी फिर से मिट्टी हो जाएगी। वे आडम्बरहीन हैं। उनके पास ‘शब्दाडम्बर’ नहीं है, बस पैरों की धूल है और गंतव्य की एक धुंधली-सी याद।
पाँच
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आगे-पीछे जो पहाड़ हैं, वे बहुत पुराने और थके हुए लग रहे हैं। शायद इसलिए कि वे स्थिर हैं। और ये लोग जो चल रहे हैं, वे पहाड़ से भी बड़े लग रहे हैं क्योंकि वे ‘तपस्या’ में हैं। चलने की तपस्या। घड़ा बनाने का तप। और प्यास को बर्तन देने का तप।
छह
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यह दृश्य बताता है कि सार्थकता शोर मचाने में नहीं, बल्कि अपने हिस्से के बोझ को इस खूबसूरती से ढोने में है कि वह बोझ न लगे, बल्कि शरीर का ही एक अंग बन जाए।
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