बगैर कुरसी का कमरा…
संजय शेखर
हमारे आसपास कितने महत्वपूर्ण लोग रहते हैं, हम निन्यानबे प्रतिशत लोग इससे बेख़बर होते हैं। दरअसल ज़िन्दगी की भागदौड़ और झूठी सफलता के पीछे भागने में हम इतने मशगूल हो जाते है कि हमें आसपास देखने-समझने का वक्त ही नही मिलता। और कई बार देख-समझकर भी हम बेख़बर रह जाते हैं क्योंकि हम चाहे-अनचाहे ऐसे ही बन गए हैं या बना दिए गए हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक ऐस बेहद ही महत्वपूर्ण शख्स हमें छोड़कर हमेशा के लिए चला गया। नाम है अशोक शारदा। बेहद ही जह़ीन लेखक, कवि और उससे भी ज्यादा एक दुर्लभ इंसान जिसने शून्य से अपनी यात्रा शुरू कर दुनियाबी सफलता के कीर्तिमान स्थापित किए और बाद में दुनिया की स्थिति देख सब कुछ से विरक्त होकर साहित्य साधना में रत हो गए। आधा दर्जन से ज्यादा हिन्दी अंग्रेजी की किताबें प्रकाशित हुई। लेकिन चर्चा और प्रशंसा से कोसो दूर रहते हुए कल अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे हमेशा के लिए चिर-निद्रा में लीन हो गए। उनकी कहानी संग्रह ” बगैर कुरसी का कमरा ” हमारे पास है। लेकिन अब उनकी स्टडी टेबल के सामने का कुर्सी हमेशा-हमेशा के लिए खाली हो गया। कमरा है, कुर्सी है लेकिन अशोक जी नहीं रहे।
अशोक जी से मेरा परिचय दो हजार पांच में हुआ था तब मैं छत्तीसगढ़ के नंबर एक समाचार चैनल ईटीवी का ब्यूरो प्रमुख था। स्वर्गीय रमेश नैयर जी ने अशोक जी से मेरा परिचय कराते हुए कहा था- “अशोक जी छत्तीसगढ़ के चुनिंदा उद्योगपतियों में से एक रहे हैं लेकिन अब उद्योग जगत और अर्थ कामना से इनका मोहभंग हो चुका है इसलिए ये पूरी तरह से साहित्य को समर्पित हो गए हैं और लेखन कार्य में रत है।” दरअसल हमारी मुलाकात के कुछ साल पहले तक अशोक शारदा रायपुर अलॉयज एंड स्टील लिमिटेड (Raipur Alloys & Steels Ltd.), जिसे अब सारडा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड के रूप में जाना जाता है के प्रमुख हिस्सेदारों में से एक थे।
अशोक जी से मेल-मुलाकात का सिलसिला चलता रहा और कालांतर में इतना प्रगाढ़ हो गया कि विगत एक दशक से शायद ही कोई सप्ताह ऐसा रहा हो जब हम न मिले हों। एक दो दिन में उनका फोन आना और अपनापन के साथ उलाहना देना आम था कि तुम आए नहीं। प्रायः हर दो दिन में हमारी बात हो जाती थी।
इन मुलाकातों के दौरान मुझे अशोक जी के व्यक्तित्व के कुछ पहलुओं को जानने समझने का मौका मिला। समझ आया कि शून्य से शिखर तक की यात्रा करने के बाद कैसे और क्यों एक व्यक्ति एक दिन सब कुछ छोड़ने का फैसला कर लेता है।
यद्यपि मेरे और अशोक जी के उम्र में करीब पच्चीस बरस का अंतर था लेकिन मैं उनके लिए मित्र था। वे अपने सभी पारिवारिक सदस्यों और मित्रों जिनकी संख्या बहुत ही कम थी, से मेरा परिचय मित्र के ही रूप में कराते थे। लेकिन मैं उन्हें हमेशा सर कहा करता था और अशोक जी मेरे लिए वे मेरे ” मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक” थे।
अशोक जी के पास ज्ञान का अथाह सागर था। वाट्सअप ज्ञान नहीं। प्रमाणिक और तथ्यपरक ज्ञान। मैं कई बार उनसे कहता कि आपको पढ़ाई में बिल्कुल रुचि नहीं थी फिर इतना ज्ञान कैसे अर्जित किया? वे कहते ” क्लास में पढ़ने में रूचि नहीं थी लेकिन पढ़ने में तो इतनी रुचि थी कि हैदराबाद की सेंट्रल लाइब्रेरी में मैं रात-रात भर पढ़ता था। इतिहास, साहित्य, कहानी, कविता, दर्शन आदि सबकुछ। उनसे जिस विषय पर भी बात की जाए मुझे लगता था कि वे उस विषय के पारंगत थे।
देश-दुनिया के किसी भी विषय पर उनसे बात करना और उनके महान चित्रकार स्वर्गीय मकबूल फिदा हुसैन, बद्री विशाल पित्ती और तेलुगू भाषा के विख्यात साहित्यकार और कवि श्री श्री समेत सैंकड़ों प्रख्यात लोगों के साथ उनके संबंधों का संस्मरण सुनना-और जानना मुझे हमेशा समृद्ध करता रहा था।मेटा फिजिकल यानी “आध्यात्मिक”, “तत्वमीमांसीय” या “पराभौतिक” विषय पर उनका काम अद्भुत है। जो स्पष्ट रूप से उनकी पुस्तकों में दिखता हैं।
अशोक जी के लिए ये दुनिया रहने लायक नहीं बची थी। ऐसा वे अक्सर कहा करते थे। इसलिए उनके संपर्कों की दुनिया भी बहुत छोटी थी। इन दिनों लिखने-पढ़ने, कालु और बिल्लु, जिसे वे अपना बच्चा कहा करते थे समेत सैकड़ों मुक प्राणियों से दोस्ती और उसका ख्याल रखना उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा था। पिछले दिनों हमने एक योजना बनाई थी कि उनकी सोंच और उनके रहने लायक दुनिया बनाने की दिशा में कुछ काम किया जाए। इसके लिए एक वे एक फाउंडेशन बनाकर काम करने के लिए सहमत हुए थे। लेकिन वो हो पाता इससे पहले ही वे हमें छोड़कर हमेशा-हमेशा के लिए अपनी दुनिया में चले गए।
आखिरी प्रणाम आपको।अलविदा मेरे मित्र।