March 5, 2026

‘मतलब हिंदू’ जैसे उपन्यास के युवा लेखक अम्बर पांडे द्वारा ‘इंडिया टुडे’ में की गई समीक्षा

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समकालीन समाज की सोनोग्राफी

अलका सरावगी जितना सुगठित वाक्य लिखती हैं वैसा ही गठन उनके उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन : दिल और दरारें’ का है, और सुगठित हमेशा कसा हुआ नहीं होता; भारतीय स्थापत्य की मूर्तियों की तरह कई बार उसका विशाल उदर होता है —ठीक भारतीय उपमहाद्वीप जैसा, जिसकी कथा इस उपन्यास में है। आरामकुर्सी पर चैन से अपने उपन्यास पढ़ते पाठक को सरावगी धक्का मारकर कलकत्ता के मयूरभंज की गली में धकेल देती है, जहाँ चक्का जाम है, ग़लत दिशा से ठेले आ रहे है, चाय और गुटके की टपरी के आगे भीड़ जमा है, कहीं गाली-गुफ़्तार चल रही है तो कहीं आँखें मिल रही हैं, साइकिलों की घंटियाँ, हॉर्न बज रहे हैं, आरती हो रही है, अज़ान आ रही है, बंगाली में कोई गुनगुनाता जा रहा और इन सबके ऊपर हिंदी सिनेमा के गीत, जैसे पार्श्व में हमेशा बजते आए हैं, बजते जा रहे हैं। कुल मिलाकर उपन्यास उतना बहुध्वन्यात्मक और विविधरंगी और शोरशराबे से भरा है जितना ईएम फॉस्टर का कभी मानना था; हिंदुस्तान में इतना कोलाहल, इतनी धूप और गर्मी, इतने लोग हैं और इतनी विविधता है कि इसके उपन्यास अंग्रेजी उपन्यासों जैसे नहीं हो सकते। यह उपन्यास उपन्यास के हवाई जहाज़ के भारत में लैंड करने जैसा है, भारत की विषयवस्तु ढोते कई औपन्यासिक हवाई जहाज़ अब तक भारत के हवाईअड्डे पर उतरे ही नहीं थे।

कथानक एक हिंदू मध्यवित्त परिवार के लड़के बोस का मुसलमान निम्नवर्ग की लड़की दीबा से निकाह पढ़ने और उसके पहले और बाद बोस के जीवन के आसपास मंडराता है— बोस जिसका निकाह के लिए नाम रखा जाता है दानियाल और दीबा निकाह के बाद हो जाती है दीपा बोस। हिंदू पुरुष मुसलमान हो जाता है और मुसलमान पत्नी हिंदू। यह भारतीय उपमहाद्वीप में धर्मों के आपसी संबंधों का आख्यान है, जहाँ वे दोनों तो एक-दूसरे से बहुत प्रेम में हैं मगर उनके आसपास राजनीतिक-आर्थिक कारणों से ज़ेनोफोबिया और घृणा का परिवेश विकसित किया जा रहा है। हिंदुओं और इस्लाम का संबंधों का रूप यह उपन्यास सूक्ष्मता और बहुस्तरीय परतों में करता है। सरावगी हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी को, सांप्रदायिकता के उभार को महज़ राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय संकट के रूप में देखती हैं।

उपन्यास का समय 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले से कुछ पहले से बिल्कुल अभी की दुनिया तक है। जब पूरी दुनिया में मुसलमानों को संदेह की नज़र से देखा जाने लगा था, जब ‘आतंकवाद’ एक विशेष धर्म से जोड़ दिया गया था, जब वैश्विक राजनीति सभ्यताओं के संघर्ष की भाषा बोलने लगी थी। इस कालखंड में बोस और दीबा का जीवन और भी जटिल हो जाता है। समाज की दरारें गहरी होती जाती हैं, और वे दोनों उन्हीं दरारों में गिरते जाते हैं।

सरावगी का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे निम्नवर्गीय मुसलमान जीवन को बारीकी और सहानुभूति से चित्रित करती हैं। हिंदी साहित्य में मुसलमान पात्र अक्सर या तो रूढ़िबद्ध होते हैं या फिर एकदम काल्पनिक। सरावगी न तो उन्हें रोमांटिसाइज़ करती हैं, न ही दानवीकृत। वे उनके जीवन की कठिनाइयों को दिखाती हैं, उनके संघर्ष को, उनकी गरिमा को भी। बोस जब इस समुदाय का हिस्सा बनता है, तो वह केवल आर्थिक गरीबी में नहीं गिरता – वह उस सामाजिक हाशिए पर भी पहुँच जाता है जहाँ मुसलमान समुदाय आज भारत में खड़ा है।

यह उपन्यास परिवार की क्रूरता का भी दस्तावेज़ है। बोस का परिवार उसे इसलिए छोड़ देता है क्योंकि उसने एक मुसलमान लड़की से शादी की है। यह परित्याग इतना निर्मम है, इतना पूर्ण है कि बोस के लिए पूरी तरह से घर वापसी कभी नहीं हो पाती। भारतीय परिवार का यह चेहरा – जो बाहर से इतना आत्मीय दिखता है, जहाँ शिक्षा और साहित्य की भरपूर उपस्थिति है जैसे बोस के भद्रलोक में थी, तब भी यह असहिष्णु, क्षुद्रता और लोभवृत्ति से संचालित ही रहा आता है।

लेकिन यह उपन्यास केवल निराशा का गीत नहीं है, इसमें उस मानवीय जिजीविषा का उत्सव भी है जो तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन को थामे रहती है। जापानी कहावत ‘गिरो सात बार तो आठवीं बार उठो’ बस जापान में ही सच नहीं, हिंदुस्तान में भी है। इसे यह उपन्यास बार-बार सिद्ध करता है कि हमें हताश नहीं होना चाहिए और आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए जिस भारत का स्वप्न नेहरू और गांधी ने देखा था, वही स्वप्न इस देश की आत्मा बनकर यहाँ शहर-शहर में फड़फड़ाता है और भले अभी अंधकार हो, इस गगन में चाँद-तारे न हो, दीया जलाने का विकल्प अब भी है। भले दीया दुनिया रोशन न करता हो मगर हमें याद रखना चाहिए कि घर-घर अगर दीये जल जाए तो रोशनी होते देर नहीं लगती।

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