जिम्बाब्वे के शीर्ष कवि चेन्जेराई होव की कुछ और कविताएं : गणतंत्र की शक्ति
गणतंत्र की शक्ति
बख़्तरबंद गाड़ियों से नहीं मापी जाती
न ही बन्दूकों, विषों, या ग़ायब कर दिये जाने से।
गणतंत्र की शक्ति मापी जाती है
भिखारियों की भिक्षाओं में,
उन शस्त्रास्त्रों में
जो इस्तेमाल किये जाते हैं ग़रीबों पर।
अमीरों की फ़िज़ूलख़र्ची में।
गणतंत्र की शक्ति
मापी जाती है चींटियों में
हाथियों में नहीं पार्क के।
दमित आशा
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मेरी आत्मा रिसती रहती है,
मैं परहेज़ ही करता हूं आशा रखने से।
यह नहीं फलती मुझको,
पूरी तरह से रिस जायेगी
और बच्चे चुन लेंगे
जो कुछ भी मिलेगा बचा-खुचा इसमें।
चाहे जितनी भी हों शीर्ण ज़िन्दादिल आवाजें
वे उपहास उड़ायेंगी ही मेरा
क्योंकि हार चुका हूं मैं
और डोलता फिरता हूं उस चमड़ीदार भूत की तरह
आशाएं दब गयी हैं,
चुक गयी हैं जिसकी एक-एक करके।
भूमि
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मैं रोऊंगा तुम्हारे लिये
तुम्हारे लिये विलाप करूंगा मैं
मैं शोक मनाऊंगा तुम्हारे लिये मृत्युपर्यन्त।
मैंने खोद निकाला उन आलुओं को
जिन्हें रोपा था अपने हाथों मैंने-
ये लाल हो चुके हैं खून से।
मैं एक कुआं खोदता हूं
बच्चों की प्यास के लिये-
मैं मिलता हूं एक आसमान से
जिसे छलनी कर दिया है गोलियों ने।
मेरी मांओं की भूमि
मेरे पिताओं की भूमि
मैं रोता हूं तुम्हारे लिये
जब मैं देखता हूं राज्य के बूढ़े लोगों को
खून-सने हाथों से काम करते हुए,
जब मैं देखता हूं राज्य की बूढ़ी औरतों को
खोपड़ी से बने पत्थरों पर सान चढ़ाते हुए।
मेरी भूमि, मैं रोता हूं तुम्हारे लिये
कि तुमने खो दी है आवाज़ अपनी
आसमान की अनुगूंज के लिये,
तुम्हारी सुन्दरता डूब रही है,
तुम्हारी सांस ढलती जा रही है धुन्ध में,
तुम्हारी दृष्टि धुंधली हो गयी है धुंध में।
मैं नहीं बोलूंगा
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वे कहते हैं कि मुंह गुफाएं हैं
जिनमें छिपा दिये जाने चाहिये दूषित शब्द।
वे कहते हैं कि मेरे शब्द फटे-पुराने चिथड़े हैं,
इसलिए उन्होंने पुलिस भेजी
मेरे शब्दों की हत्या करने के लिये।
आज अभी से
मैं नहीं बोलूंगा
नहीं बोलूंगा मैं
जब मैं देखता हूं चीजों को
तो दर्द होता है मेरी आंखों में।
जब मैं सुनता हूं कड़वे शब्द
मैं नहीं बोलूंगा
नहीं बोलूंगा मैं
जब राष्ट्रपति के अभिभाषण से बहता है खून
उन सड़कों पर
जिन पर चलता हूं मैं।
जब औरतें विलाप करती हैं खून देख कर-
उनके अपने बच्चों का खून,
मैं नहीं बोलूंगा।
मंत्री के बोल घोषित करते हैं एक चुसनी को बेघर
मंत्री के बोल घोषित करते हैं एक रबड़ को मृत
शासक के बोल अपाहिज बनाते हैं गणतंत्र को
पुलिस वाले की हथकड़ी को
तलब लगती है जेल की।
कृतज्ञताएं
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अनायास भर आते आंसू,
जीवन की परछाईं
मेरी रूह की हड्डियों में।
मैं इंतज़ार कर रहा हूं बारिश में
इस शुष्क मौसम में भी :
भूख के एक मकान का।
कोई भी देश जगेगा नहीं अब
किसी भी शहर में होगी नहीं रोशनी :
यह एक नास्तिक की यात्रा है
जिसमें बोते हैं वे केवल कांटे
और धैर्यहीन परिस्थितियां।
(अंग्रेज़ी से अनुवाद- राजेश चन्द्र, 11 फरवरी, 2019)