March 7, 2026

इन्द्रे लिथुआनिया की एक प्रमुख समकालीन कवि…

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इन्द्रे लिथुआनिया की एक प्रमुख समकालीन कवि हैं। उन्होंने सांस्कृतिक प्रवन्धन की पढ़ाई की है और कुछ समय तक सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में भी काम किया है। उनकी कविता अपनी सादगी और गहराई के लिए जानी जाती है। वे कम शब्दों में भाव और अर्थ रचती हैं। छोटी पंक्तियाँ, हलकी ध्वनि और अर्थ से भरे चित्र उनकी कविता की पहचान हैं। २०२० में प्रकाशित ‘ Apsisiautusios saule’ (Clothes in the Sun) में धार्मिक प्रतीक और आध्यात्मिक भाव प्रमुख हैं। इस संग्रह में स्त्री और पुरुष के बीच के रिश्ते को एक पवित्र सम्बन्ध के रूप में देखा गया है। २०२५ में उनका पाँचवाँ कविता-संग्रह-‘I Was Born With a Double Heart’ प्रकाशित हुआ।

इन्द्रे वालान्तिनाइते की कविताएँ २२ से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। वे २०१२ से लिथुआनियाई लेखक संघ की सदस्य हैं। २०२२ से वे इसी संस्था में अन्तरराष्ट्रीय परियोजनाओं का काम सँभाल रही हैं और २०२६ से अन्तरराष्ट्रीय कविता उत्सव ‘पोएट्री स्प्रिंग’ की निदेशक हैं।

रज़ा फाउंडेशन के अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह में लिथुआनिया की कवि इंद्रे ने दिल जीत लिया।युवा कवि पूनम अरोड़ा ने उनकी कविताओं का अनुवाद किया है।
पेश हैं तीन कविताएँ
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परिचय

इन्द्रे लिथुआनिया की एक प्रमुख समकालीन कवि हैं। उन्होंने सांस्कृतिक प्रवन्धन की पढ़ाई की है और कुछ समय तक सांस्कृतिक पत्रकार के रूप में भी काम किया है। उनकी कविता अपनी सादगी और गहराई के लिए जानी जाती है। वे कम शब्दों में भाव और अर्थ रचती हैं। छोटी पंक्तियाँ, हलकी ध्वनि और अर्थ से भरे चित्र उनकी कविता की पहचान हैं। २०२० में प्रकाशित ‘ Apsisiautusios saule’ (Clothes in the Sun) में धार्मिक प्रतीक और आध्यात्मिक भाव प्रमुख हैं। इस संग्रह में स्त्री और पुरुष के बीच के रिश्ते को एक पवित्र सम्बन्ध के रूप में देखा गया है। २०२५ में उनका पाँचवाँ कविता-संग्रह-‘I Was Born With a Double Heart’ प्रकाशित हुआ।

इन्द्रे वालान्तिनाइते की कविताएँ २२ से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। वे २०१२ से लिथुआनियाई लेखक संघ की सदस्य हैं। २०२२ से वे इसी संस्था में अन्तरराष्ट्रीय परियोजनाओं का काम सँभाल रही हैं और २०२६ से अन्तरराष्ट्रीय कविता उत्सव ‘पोएट्री स्प्रिंग’ की निदेशक हैं।

तीन कविताएँ

(सुरंग)
किसी पुराने समय में
हमने तय किया था कि हमें देखा जाए
कि हम सिर्फ़ हवा में घुली
एक बयार बनकर न रह जाएँ

इसलिए हमने अपने शरीर पहन लिए
कोई गोली, कोई दाग, कोई घाव
अदृश्य अस्तित्व से भारी नहीं पड़ सकता

हम आए
अपनी त्वचा पर बारिश महसूस करने
गिरजाघरों की ठंडक
और एक-दूसरे के होंठों की शीतलता जानने
इच्छा की खुशबू या पतझर के बाग़ में
सड़ते सेबों की गंध सूँघने

एक बर्फ़ीले स्रोत में डूब जाने के लिए
रस भरे कणों को चखने के लिए
शराब के हल्के सुरुर में खो जाने के लिए
मच्छर को रक्त से तृप्त होने देने के लिए
और दंश की लाल आंच जीभ से चाटने के लिए

किसी अंधे को नदी पार कराने के लिए
किसी लँगड़े का बोझ उठाने के लिए
‘देखो, मेरे हाथ कितने मज़बूत हैं
मैं एक सुरंग खोद सकती हूं
हमारे छिपने के लिए

‘सुनो, मेरा दिल कैसे धड़कता है!
मैं हमारे लिए एक सुरंग खोद सकती हूँ
ताकि हमा जीवित रह सकें’

एक सुरंग ज़मीन के बहुत नीचे
जो आकाश से जुड़ी हो
और फिर
फिर विस्मय की चमक में मैं पुकारूंगी – ‘देखो, मेरे प्यार,
दुनिया वहीं से शुरू होती है
जहाँ हमने सोचा था कि ख़त्म हो गई है’

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. नोटबुक

इतिहास इस बात का गवाह है
कि लोगों ने भूर्ज-पत्रों पर लिखा
रेत
जेल की दीवारों
और यहाँ तक कि अपनी ही त्वचा पर भी लिखा
उन्होंने शब्दों को उकेरा
चाकू से
काँच या पत्थर के टुकड़ों से
कोयले से
ख़ून से
यहाँ तक कि मल से भी
मेरे खुले-से कमरे में
एक प्राचीन पेन-स्टैंड के भीतर
टिका है तुम्हारा दिया हुआ कलम
एक मक्खी आधे खाए सेब की
हिमालयी-सी ऊँचाइयों पर आलस से चढ़ती है
खुली खिड़कियों से परदे का कोमल स्पर्श उतरता है
मेज पर पड़ी
मोटी नोटबुक को हल्के से छूता है
उसके भीतर
कितने ही कोरे पन्ने
स्वप्नमग्न हैं
***

बारिश के बाद

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मैं खो गयी थी भीगते वन की निस्तब्धता में पत्तियों की थरथराती देह से गिरती बूंदों के आशीष में सराबोर
-रंग बिरंगे परिन्दों ने बुन दिये
मेरे कानों में सुरम्य गीत

घने वन के नन्हे जीवों ने
मुझे रहना सिखाया नम्रता के तल पर
लेकिन फिर भी
अनजान और बेफ़िक्री के क्षणों में
एक अहसास ने मुझे घेर लिया
कि मेरे पाँवों ने रौंदा है किसी को
घर लौटी

तो मेरे बालों में अटके थे सुगन्धित टीलिया फूलों के गुच्छे
और धीरे-धीरे खुलकर झरने लगीं
टहनियों की स्मृतियाँ
जूते की मिट्टी धोते हुए

मैंने सुनी मिट्टी की उस काली धारा की धीमी कसक
मानो वह भी सफ़ेद पोर्सलीन सिंक से पतली धार बनकर
लौटना चाहती हो अपने वन की ओर
पल भर को लगा
मैंने वाक़ई कुछ नहीं लिया
किसी को छुआ भी नहीं
न किसी को आहत किया
मैं खाली हाथ गयी
और खाली हाथ ही लौट आयी
पर देखो न
वन की एक अनाम अनुभूति
फिर भी मेरी अनुभूति में रह गयी
केवल इसलिए कि मैं दे सकूँ
इस कहांनी को ये शब्द.

सुगं धा सुधा

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