नारी, कबीर, ब्रह्मा और पागल
पृथ्वी घूम रही है अपनी धुरी पर पिछले कई हज़ार वर्षों से। समुद्र हैं, इतने ही खारे लेकिन समुद्र में मछलियाँ नहीं हैं। कोई जीवन नहीं है। वे ठहरे हैं किसी पोखर की तरह, उनमें ज़रा भी स्पंदन नहीं है!
पहाड़ हैं, इतने ही कठोर और ऊँचे। बहुत ठंडी हैं उनकी चोटियाँ पर उन पर बर्फ नहीं है! पहाड़ नहीं जानते कैसी होती हैं वनस्पतियाँ। उनका परिचय भी नहीं है पंछियों की आवाज़ों से। पहाड़ अनभिज्ञ हैं भालूओं, शेरों, हाथियों और अन्य जीवों के स्पर्श से!
धरती है। पथरीली, बलूई और ऊबड़-खाबड़ भी। बड़े-बड़े गड्ढे भी हैं और विस्तृत पठार भी हैं। नहीं हैं पेड़, झाड़ियाँ, फल-फूल और पौधे। चीटियाँ, मेंढक और मकड़ियाँ भी नहीं हैं। घरों और बाज़ारों की किसी को ज़रूरत नहीं है! इनकी कल्पना करने के लिए भी कोई नहीं है।
हवा है, ठहरी सी, जिसे कहीं आने-जाने की जल्दी नहीं है। कोई गंध भी नहीं है हवा में। बे आवाज़ है हवा, चले भी तो पृथ्वी पर हिलने-झूलने के लिए कुछ भी नहीं है! पवनपुत्र और उनकी कथा भी नहीं है।
नदियाँ, झीलें और तालाब भी नहीं हैं। धरती के नीचे कितना जल है, कोई गणना नहीं है। अमीबा और पैरामीशियम नहीं हैं तो मछलियों और बंदरों की चिंता करने का तो कोई अर्थ ही नहीं है।
किसी बीमारी या महामारी का खतरा नहीं है क्योंकि धरती पर कोई बैक्टीरिया या जीवाणु ही नहीं है। धरती पर मनुष्य ही नहीं है।
सबसे मज़ेदार बात यह कि फिलहाल सौरमंडल में हमारा तेजस्वी सूर्य ही नहीं है! क्यों नहीं है?
एक पराक्रमी संत ने तपस्या की सहस्रों वर्षों तक और वर माँगा ब्रह्मा से – कि सूर्य के ताप से झुलस जाता है धरती का जन-जीवन। सूख जाते हैं जल स्रोत। धरती का जल भटकता है आसमान में बादलों की शक्ल में! हवा भागती है, इधर-उधर। सूर्य का प्रकाश करता है सब की आँखों को त्रस्त। अत: यह सूर्य ही सभी पातकों की जड़ है सृष्टि में। आप इसे ताप विहीन कर दीजिए!
ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए कहा – तथास्तु। और सूर्य ठंडा हो गया।
गहन अंधकार में अपने अपने वलयों में परिक्रमा करने लगे सभी ग्रह और उपग्रह! आकाश गंगा के सभी तारे भी बुझा कर अपना प्रकाश हो गए शिथिल। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा।
एक मूर्ख भी था इस पृथ्वी पर जिसे डर लगता था अंधेरे से। उसने संत से भी अधिक तपस्या की, लम्बे समय तक। पसीज गए ब्रह्मा और फिर पहले जैसी ही हो गई समूची सृष्टि!
सूर्य ही जननी है समस्त जीवन की।
मैं अपनी स्टडी में, कबीर को पढ़ रहा हूँ। बहुत सारे विषयों को समेटे हैं कबीर की साखियाँ। उनके लिए जीवन की दृष्टि का अर्थ है, एक ऐसा सोच जो हर पाखंड से दूर रह कर बस अपने राम (ईश्वर) की ही भक्ति करे।
अचानक क्या हुआ कबीर को? कनक-कामिनी का संग विश्लेषित कर रहे हैं कबीर। कबीर मनुष्य के पतन के सभी कारण खोज रहे हैं स्त्री में। स्त्री ने ही जन्म दिया होगा कबीर को, चाहे वह विधवा ब्राह्मणी हो या कोई अन्य स्त्री। मानो, स्त्री विहीन सृष्टि में ही मनुष्य को मिलेगी प्रभु की भक्ति, जीवन के आवागमन से मुक्ति और आत्म-ज्ञान।
मैं भी उस पागल की तरह आसमान की ओर देख कर प्रार्थना करता हूँ — हे प्रभु, मेरी प्रार्थना है तुम जो चाहे ले लो इस धरती पर से……. बस नारी को छोड़ देना। पुरुष नहीं जी पाएंगे, माँ की ममता, बेटियों और बहनों के स्नेह और प्रेयसी के प्रेम के बिना। विश्वास करना, इस क्षेत्र में मेरा अनुभव अधिक है, कबीर से। उन्होंने तो बस ऐसे ही कह दिया होगा –
नारि नसावै तीन गुण, जो नर पासे होय।
भक्ति, मुक्ति निज ध्यान में, पैठि न सकही कोय॥ [ संत कबीर ]*
ब्रह्मा ने स्वीकार कर ली है मेरी प्रार्थना।
उनका भी स्वार्थ है इसमें!
प्रलय की तिथि अभी कई हज़ार साल दूर है!
——– राजेश्वर वशिष्ठ
( कबीर दास कहते हैं – नारी का साथ पुरुष के तीन गुणों का नाश करता है। उसके रहते हुए कोई पुरुष भक्ति, माया जाल से मुक्ति और आत्म केंद्रित ध्यान में स्थिर हो ही नहीं सकता।)
विशेष : नारी को लेकर तुलसी की दृष्टि का विवेचन ही अधिक हुआ है और उन्होंने ब्राह्मण होने के कारण सबसे अधिक आलोचना झेली है। कबीर की साखियों में नारी विरोध कम नहीं है। चूँकि कबीर का चयनित साहित्य ही अभी तक सबके सामने आया है, अतः अधिक लोग इस तथ्य से भिज्ञ नहीं हैं। मेरे लिए नारी का पृथ्वी पर होना वैसा ही है, जैसा सौर मंडल में सूर्य का होना है। यही रूपक है इस गद्य-काव्य में।
—– राजेश्वर वशिष्ठ