March 10, 2026
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(रचनाकार:निवेदिता बांदिल)
तिथि: 08/03/2026

राम ने मार दिया था रावण को,
फिर रावण क्यों नहीं मरता है?
हर युग में राम न आ पाते हैं,
पर रावण संग-संग चलता है।

सोने की लंका ध्वस्त हुई,
जब चढ़ी राम की प्रत्यंचा,
दशानन तो राख हुआ था,
नहीं राख हुई विष वांछा।

वही वांछा धरातल पर छाई,
वही आकाश को घेर रही,
बन निबिड़ घटा गरल बदरी,
तुझ पर, मुझ पर बरस रही।

विष प्याले, वो बादल काले,
और रावण की लंका से आले,
बूंद-बूंद बरस कालकूट भिगोए,
जी भर के कटुता के बीज बोए।

हर मन के खलियानों को रौंदकर,
हर पौध को कटुता से जला दिया,
जहाँ प्रेम पले वहाँ संशय जन्मा,
सत्य वृक्ष पर छल फल उगा दिया।

पंचाली हो या माँ सीता हो,
लाज हरन नहीं रुक पाता है,
हर अपराध, हर स्वार्थ व छल,
वही पुराना भय जगाता है।

लोभ और क्रोध के ज्वालामुखी,
आशाओं की धरती को चीरते हैं,
प्रेम और विश्वास की नदियाँ को
धधकती ज्वालाओं में घेरते हैं।

निजहित की लड़ाई छिड़ती है,
स्वार्थ, अहंकार, मोह पलते हैं,
अंतर्मन के हर कोने में तब,
रावण के नव रूप खिलते हैं।

लंका की आग में धधकते आँगन,
बादल घनेरे, छाए कलुषित घन,
विष की बूँदें गिरतीं जलधर से,
कहाँ रामनाम दीप्त हो तन घर में।

हर आत्मा की आंतरिक लड़ाई,
यही है मौलिक युद्ध का मैदान,
जब तक स्वार्थ का पाप न कटे,
रावण लौटेगा हरने युग की आन।

राम ने मार दिया था रावण को,
फिर रावण क्यों नहीं मरता है?
हर युग में राम न आ पाते हैं,
पर रावण संग-संग चलता है।

राम नहीं जन्मते हर युग में,
राम को अंतः में जगाना है,
भीतर के रावण को हराकर,
हर मानव को राम बनाना है।

सत्य व धैर्य की पतवार लिए,
राम अब हृदय सिंधु में आयेंगे,
अहं और द्वेष को जलावर्त में,
हम मानव मिलकर डुबायेंगे।

(© डॉ निवेदिता बांदिल all rights reserved)

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