गीतकार और प्रख्यात ग़ज़लगो मुकीम भारती की 90वीं जयंती पर विशेष
– डुमन लाल ध्रुव
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में अनेक कवि और गीतकार हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को नई दृष्टि प्रदान की। इन महान रचनाकारों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है मुकीम भारती का। वे केवल एक कवि या ग़ज़लगो ही नहीं थे वो एक ऐसे साहित्यकार थे जिनकी लेखनी में समाज की पीड़ा, मनुष्य की संवेदना, व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य और भविष्य के प्रति आशा का प्रकाश एक साथ दिखाई देता है।
आज उनकी 90वीं जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरण करना केवल एक साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को सम्मान देना है। मुकीम भारती का जन्म 26 मार्च 1936 को वर्तमान बालोद जिला के कंवर ग्राम में हुआ। उन्होंने अपने जीवनकाल में कविता, गीत और ग़ज़ल के माध्यम से समाज की अनेक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी। वे छत्तीसगढ़ के ऐसे पहले गीतकार थे जिन्हें दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला में काव्य पाठ करने का गौरव प्राप्त हुआ।
उनकी रचनाएं केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं हैं वे समाज के यथार्थ को सामने लाने वाली सशक्त आवाज भी है। मुकीम भारती की साहित्यिक पहचान केवल ग़ज़लों और कविताओं से ही नहीं बनी उनके लिखे हुए कई गीत लंबे समय तक विद्यालयों में गाये जाते रहे। उनका अत्यंत प्रसिद्ध स्वरबद्ध शालेय गीत था –
“दे दे मेरे अधरों को ज्ञान स्वर
यही मांगता हूं मैं तुझसे वर।”
यह गीत ज्ञान, संस्कार और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा देने वाला गीत था। उस समय जब छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था तब प्रदेश के अनेक विद्यालयों में यह गीत शालेय प्रार्थना गीत के रुप में गाया जाता था। विद्यालयों की सुबह जब प्रार्थना से शुरु होती थी तब विद्यार्थियों के सामूहिक स्वर में यह गीत वातावरण को पवित्र और प्रेरणादायी बना देता था। इस गीत का मूल भाव यह था कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं चरित्र निर्माण का मार्ग है। मुकीम भारती ने शिक्षा को जीवन मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया।
मुकीम भारती का जन्म 26 मार्च 1936 को बालोद जिले के कंवर ग्राम में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े इस बालक ने बचपन से ही जीवन की कठिनाइयों और समाज की विषमताओं को देखा। गांव की मिट्टी, प्रकृति की सरलता और आम जनजीवन की समस्याएं उनके मन में गहराई से अंकित हो गई। यही अनुभव आगे चलकर उनकी कविताओं और ग़ज़लों में दिखाई देते हैं। उनका बचपन साधारण था लेकिन उनकी संवेदनशीलता असाधारण थी। वे छोटी-छोटी घटनाओं में भी जीवन का बड़ा सत्य देख लेते थे।
मुकीम भारती का जीवन शिक्षा और साहित्य दोनों के प्रति समर्पित था। उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने के बाद अध्यापन को अपना पेशा बनाया। वे डॉ. शोभाराम देवांगन शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय धमतरी में शिक्षक बने और बाद में वहीं प्रभारी प्राचार्य के पद तक पहुंचे। शिक्षक के रुप में वे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। वे केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहते थे विद्यार्थियों में साहित्य, संवेदना और सामाजिक जागरुकता भी विकसित करते थे।
छत्तीसगढ़ के साहित्यिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना यह है कि मुकीम भारती वह पहले गीतकार थे जिन्होंने दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला से काव्य पाठ किया। लाल किले का मंच देश के प्रतिष्ठित कवियों और शायरों का मंच माना जाता रहा है। वहां काव्य पाठ करना किसी भी कवि के लिए अत्यंत गौरव की बात होती है। मुकीम भारती ने इस मंच से अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
मुकीम भारती की कविताओं में निराशा के बीच आशा की किरण दिखाई देती है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं –
“मेरे सारे पंछी हैं पिंजरे में तुम्हारे बंदी
लेकिन आकाश में उड़ती एक आबाबील बची है।”
यहां कवि यह संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, उम्मीद की एक किरण हमेशा बची रहती है। इसी कविता में वे कहते हैं –
“सूरज की कर दी हत्या चंदा को तुमने मारा
पीड़ा से तड़प तड़पकर दम तोड़ रहा हर तारा
हर ज्योतिस्थल पर माना अधिकार कर लिया तुमने
धरती पर हुआ नहीं है फिर भी अनाथ उजियारा
तुम अंधकार से अपने कह दो न बने चक्रवर्ती
मेरी कुटिया में अभी इक रोशन कंदील बची है।”
इन पंक्तियों में कवि अन्याय और अंधकार के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर उठाता है।
मुकीम भारती की कविताओं में प्रेम का स्वर अत्यंत गहरा और आत्मिक है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं –
“मेरी प्यास उमर भर यदि रह गई कुंआरी
तो तेरे ही पनघट की बदनामी होगी।”
और –
“तू मुझमें है, देख सकूं मैं
अब ऐसा कोई दर्पण दे
प्यासे हैं ये अंतरनयना
अंतरनयनों को दर्शन दे।”
यह प्रेम केवल सांसारिक नहीं आध्यात्मिक अनुभूति का प्रतीक है। समाज की विडंबनाओं पर व्यंग्य
मुकीम भारती की ग़ज़लों में सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य दिखाई देता है।
“द्वार पर सोया है दरबान मेरे देश में
नाव पर बैठा है तूफान मेरे देश में।”
यह पंक्ति व्यवस्था की लापरवाही और समाज की विडंबना को दर्शाती है।
“पतझर से पूछे अक्सर मंजिल मधुमास की
चलता है बनकर लाठी अंधे विश्वास की
ढोता है अब तक अर्थी मुर्दे विश्वास की
घर-घर में जलता है श्मशान मेरे देश में।”
मुकीम जी , ने समाज के अंधविश्वास और जड़ता पर तीखा प्रहार किया गया है।
मुकीम भारती की कविताओं में मानवता सर्वाेपरि है। वे धर्म और जाति की सीमाओं से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य के रुप में देखने की बात करते हैं –
“पंडित हूं न मुल्ला हूं न पादरी न ज्ञानी
इंसान हूं क्या समझूं भाषाएं आसमानी।”
उनके मानवीय दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। उनकी ग़ज़लों में समाज की कठोर सच्चाइयां दिखाई देती हैं –
“मैंने उठा लिया है उनमें से एक पत्थर
फेंके गये हैं मुझ पर जो कांच के घरों से।”
और –
“जारी है बहस धूप के मसले पे धुआंधार
बैठे हैं ठंडी छांव में बरगद के तले लोग।”
ये पंक्तियां समाज की पाखंडपूर्ण मानसिकता को उजागर करती हैं। मुकीम भारती की कविताओं में नारी के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है –
“तेरी पवित्रता की खाएं कसम
सब देवता इतना जान ले तू
तू केश नहा के निचोड़ तो
उस जल से फरिश्ते करें वजू।”
यह कविता नारी के पवित्र और सृजनात्मक स्वरूप को उजागर करती है।
मुकीम भारती की रचनाओं की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार भी है –
सामाजिक चेतना
मानवीय संवेदना
तीखा व्यंग्य
सरल और प्रभावशाली भाषा
आशा और संघर्ष का संदेश
इन विशेषताओं के कारण उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके समय में थीं। 21 अक्टूबर 1992 को मुकीम भारती का जीवन एक दुखद दुर्घटना में समाप्त हो गया। उस समय वे डॉ. शोभाराम देवांगन शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय धमतरी में प्रभारी प्राचार्य के रुप में पदस्थ थे। विद्यालय से घर लौटते समय स्कूटर दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उनकी असामयिक मृत्यु से छत्तीसगढ़ का साहित्य जगत स्तब्ध रह गया।
– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन – 493773
मोबाइल – 9424210208