March 6, 2026

काश मैं किसी कंपनी का निदेशक (कार्मिक) होता!

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डॉ. शैलेश शुक्ला
आशियाना, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

PoetShaielsh@gmail.com, 8759411563

कहते हैं कि इंसान की असली काबिलियत तब नजर आती है जब वह किसी कंपनी में काम करता है, लेकिन मेरी तो दिली तमन्ना है कि मैं उस कंपनी में काम न करूँ, बल्कि वहाँ का निदेशक (कार्मिक) यानी Director (कार्मिक) बन जाऊँ। क्योंकि कर्मचारी बनकर आप पसीना बहाते हैं और निदेशक बनकर आप बोनस खाते हैं। काश! मैं भी किसी बड़ी सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में निदेशक (कार्मिक) होता—तो मैं भी मानव संसाधन नहीं, “मनभावन साधन” विकसित करता!

कार्मिक निदेशक का पहला गुण है—”निगाह की नेमत और नीयत की चतुराई”। किसे प्रमोशन देना है, किसे ट्रांसफर करना है और किसे ट्रैप में फँसाना है—ये सब उसके Excel Sheet में नहीं, बल्कि उसके नैन-नक्श और नखरे मापन विभाग में तय होता है। हाजिरी बायोमेट्रिक सिस्टम से नहीं, ‘भावनात्मक फिंगरप्रिंट’ से लगती है। हँसमुख कर्मचारी तुरंत “लीव रिक्वेस्ट अप्रूव” हो जाता है और जो ईमानदारी से काम करे, वह “गंभीर प्रवृत्ति का खतरा” मान लिया जाता है। अगर मैं निदेशक होता, तो इंटरव्यू में डिग्री नहीं, डायलॉग पूछता। “आपने क्या पढ़ा?” नहीं पूछता, बल्कि “आप हमें क्या पढ़ा सकते हैं?” पूछता। और जो मुस्कराकर कह देता कि “सर, जो कहें, वही पढ़ लेंगे”—बस, उसे तत्काल नौकरी दे देता। मेरी नज़रों में वही “वेल ट्रेन्ड कैंडिडेट” होता।

महिला कर्मचारियों की तैनाती तो मेरी कार्यक्षमता का असली इम्तहान होती। चेहरे की मासूमियत, चाल की मृदुता और हँसी की मधुरता—ये तीनों अगर 10 में से 9 नंबर ला लें, तो शेष योग्यता अनावश्यक मानी जाती। फिर वह डेस्क पर काम करे या केबिन में केयर—कार्मिक नीति तो यही कहती : “संवेदनशील कर्मचारियों से ही संस्थान संवेदनशील बनता है।”

और छुट्टियाँ! ओह! क्या मजाल कि कोई छुट्टी बिना उपहार के स्वीकृत हो। मैं हर अर्ज़ी को स्कैन करता—pdf में नहीं, पर्सनल डिटेल फोल्डर में। जो कर्मचारी “पारिवारिक कारण” की छुट्टी माँगे और साथ में ‘मिठाई का डिब्बा’ न दे, उसकी छुट्टी तो ‘पेंडिंग’ में डलती। और जो फेस्टिव सीज़न में फॉलोअप करके ‘त्योहार के तोहफे’ पहुंचा दे, उसकी छुट्टी तो “अप्रूव्ड विद एप्रिसिएशन लेटर” होती।

नियमों की किताब मेरे लिए रिमाइंडर नोट्स होती। न अनुपालन ज़रूरी, न उल्लंघन—बस, “उपयोग” का सवाल होता। एक नियम से एक को बचाया, दूसरे नियम से दूसरे को फँसाया—यही होती असली कार्मिकM (Human Resource Manipulation)। और अगर कोई कर्मचारी RTI डाल दे, तो उसकी फ़ाइल खो जाना और यदि वह ज़्यादा सवाल करे, तो अचानक उसकी “कार्यदक्षता की समीक्षा” आरंभ हो जाना—ये सब “अनौपचारिक व्यवहारिक प्रोटोकॉल” के तहत किया जाता।

निदेशक (कार्मिक) बनते ही मेरा घर ‘कैरियर काउंसलिंग सेंटर’ बन जाता—भांजे, भतीजे, समधी, साले सब “योग्यता के साथ” उम्मीदवार बन जाते। फिर चयन समिति में मेरा चेहरा देखकर उम्मीदवारों की आत्मविश्वास की Battery चार्ज हो जाती। काश, मेरे भी पाँच-सात रिश्तेदार होते जिन्हें मैं नौकरी दिलाकर “रिश्तों में रोजगार” का मेल बैठाता।

हर त्यौहार पर मेरा कक्ष उपहार वितरण केंद्र बन जाता। कोई काजू-किशमिश लाता, कोई घड़ी, कोई स्मार्टफोन और कुछ ‘मनोबल बढ़ाने वाले स्नेहिल लिफाफे’। और मैं सबको मुस्करा कर कहता : “ये सब आपके स्नेह का प्रतीक है, मैं मूल्य नहीं भावना देखता हूँ।” और जब मुख्यालय से निदेशक मंडल आता, तो मेरे आतिथ्य में इतना अपनापन होता कि वे लौटते समय कहते—“हर विभाग में आप जैसे कार्मिक हों, तो तनाव शून्य हो जाए।” और आज जब मैं अपनी डेस्क पर बैठकर केवल कार्यमालाओं की समीक्षा करता हूँ और छुट्टियों की मंज़ूरी के लिए कार्मिक के ऑफिस चक्कर काटता हूँ, तो एक ही बात मन में आती है— काश… मैं किसी कंपनी का निदेशक (कार्मिक) होता! तो मैं भी नौकरी नहीं, नसीब बाँटता… और सैलरी से ज़्यादा सत्ता भोगता!

अब ज़रा सोचिए, किसी बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में निदेशक (कार्मिक) होना केवल एक पद नहीं होता, एक पॉवर पैकेज होता है। यहाँ सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग नहीं होती, बल्कि भविष्य की ज़िंदगियाँ निर्धारित होती हैं। एक हस्ताक्षर से कोई कर्मचारी “अंडर परफॉर्मर” से “सुपर एचिवर” बन सकता है और किसी का प्रमोशन फाइल के नीचे दबाकर सालों-साल उसका आत्मबल निचोड़कर रखा जा सकता है। सच कहूं तो निदेशक (कार्मिक) होना मतलब—मानव संसाधन का ‘अदृश्य भगवान’ होना।

और ग्रेच्युटी, पेंशन और सेवा विस्तार के मामले में तो निदेशक का प्रभाव ऐसा होता है कि खुद कर्मचारी यूनियनें भी नरमी से कहती हैं—“सर, मामला आपके हाथ में है, हम उम्मीद करते हैं आप उचित निर्णय लेंगे।” और इस “उचित” शब्द की परिभाषा उतनी ही लचीली होती है, जितनी निदेशक की टाई। अगर मैं निदेशक होता, तो सेवा विस्तार के मामले में हर कर्मचारी से पहले “सेवा भाव” माँगता। और जिसने समय पर “संवेदनशील उपहार” दे दिया, उसका सेवा विस्तार बिना विवाद स्वीकृत कर देता। शेष को मैं कार्मिक के सिस्टम में ‘Pending under observation’ डाल देता और फिर वह बेचारा महीनों तक “नमस्कार सर” करता घूमता।

समारोहों की रौनक और निदेशक की ठसक भी देखिए! कर्मचारी दिवस, महिला दिवस, स्थापना दिवस, रिटायरमेंट पार्टी—हर जगह कार्मिक विभाग की उपस्थिति अनिवार्य होती है और निदेशक का चेहरा मुख्य अतिथि की सूची में। फिर चाहे उसे भाषण आता हो

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