हृदय विकल उठता ज़ब…
हृदय विकल उठता ज़ब
अल्हड़ मेघों की नाद से
सहज नयन भर आते हैं
तब प्रियवर की याद से
सुनो सखी प्रिय के बिना
वर्षा ऋतु भी न भाती है
कितने सावन बीत चले
तनिक न आस जगाती है
बरस रहीं हैं नीर की बूंदे
बादलों की चोट से
कह दो इनको जाकर बरसे
कहीं दूर गिरी की ओट से
भेजे कोई संदेश प्रिय को
सावन के झूले खाली हैं
जहाँ सुहानी थी रिमझिम
अब यह तन को जलाती हैं
अनन्त हैं बूंदे,आकाश अनन्त
अनन्त सागर गहराई है
अनन्त प्रेम और अनन्त प्रतिक्षा
विरह अनन्त अब छाई हैं
#माया_देवांगन