आजादी के पहले सिने-जगत में …
आजादी के पहले सिने-जगत में पदार्पण कर जिन कुछ कलाकारों ने शोहरत पाई उनमें अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर, कुंदनलाल सहगल, देविका रानी, शोभना समर्थ, सुलोचना, मोतीलाल जाने पहचाने नाम हैं। उन्हीं के आसपास मध्य भारत के एक और शख्स ने भी माया नगरी बंबई जाकर अपने हुनर का डंका बजाया और वे थे किशोर साहू जिन्हें आजादी के बाद की पीढ़ी के लोग, गाईड , फिल्म में मिस रोजी बनी वहिदा रहमान के पति बने रुखे सूखे अधेड़ मानवशास्त्री मार्को के चरित्र में काम करने वाले कलाकार के रूप में जानते हैं या दिल अपना और प्रीत पराई जैसी सफल फिल्म के दिग्दर्शक के रूप में जानते हैं। कमाल कि बात यह थी कि अपनी सभी फिल्मों के दिग्दर्शक, लेखक, नायक भी प्रायः वे खुद होते थे। अपनी अंतिम सांस तक उम्र के हिसाब से अनेकों चरित्र भूमिकाएं करने में सफल रहे अशोक कुमार जनमानस में सर्वाधिक जाने पहचाने चेहरे हुए लेकिन छत्तीसगढ़ में जन्मे और पले-बढ़े किशोर साहू ने फिल्म निर्माण के सभी पक्षों पर सफलतापूर्वक काम करते हुए अपने हुनर का लोहा मनवाया ये बहुत कम लोग जान पाये। उनकी लिखी जीवनी एक ऐसा दस्तावेज है जिसे पढ़कर सफलता के शीर्ष पर पहुंचे कलाप्रेमी शख्स की बनावट और बुनावट में अनुभूति से भीगी जमीन की धूल-मिट्टी, हवा-पानी, रिश्ते, संवेदना, संघर्ष, मित्र -शत्रु ,चर-अचर के महत्व को महसूस किया जा सकता है।
, लाइफ इस एक सीरीज आफ सेपरेशन,
नागपुर से बम्बई की तरफ कूच करते समय रिश्तेदारों से बिछुड़ते देख उदास हो आये युवा स्वप्नजीवी किशोर साहू को ढांढस बंधाते एक मित्र ने ये बात कही थी और यही किशोर के जीवन संघर्ष का सूत्र-वाक्य बन गया और इस किताब, मेरी आत्मकथा, का मौलिक भाव बना। उम्र के अंतिम पड़ाव में अनेकों मित्रों, शुभचिंतकों, प्रियजनों को खोते हुए विचलित हो गये किशोर साहू ने उस सूत्र-वाक्य के सहारे ही अपने को दृढ़-प्रतिज्ञ बनाये रखा। चूंकि किशोर साहू खुद एक मंझे हुए लेखक थे, उन्होंने कई कहानियां लिखी जो उस समय की मशहूर पत्रिकाओं में छपी और बाद में संग्रह के रूप में भी आई । इसके अलावा उन्होंने फिल्म उद्योग के अनुभवों पर, पर्दे के पीछे, और , धुएं की लकीर, नामक चर्चित उपन्यास भी लिखा। पकी उम्र में जीवनी लिखते समय अपनी ही जुदा शैली में इस रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है कि चार सौ पेज के किताब को कई दिनों तक पढ़ते हुए भी पाठक को पूरी तरह बांध कर चलती है। उनकी अपनी दार्शनिक सी भाषा है जैसे –, कौन जानता है मरकर भी स्वर्ग मिले या ना मिले, स्वर्ग के मजे जीते जी यहीं क्यों न ले लिए जाएं। इसी प्रश्न को लेकर बेचैन मानव प्रकृति से दूर होता जा रहा है, या , आग की तरह मित्रता भी तभी तक जीवित रहती है जब तक उसे सतत हवा दी जाए , या , संघर्ष का दूसरा नाम अगर जीवन है तो जीवन का दूसरा नाम परिवर्तन है।,
वे पुनर्जन्म और भाग्य या अदृश्य शक्तियों में विश्वास करते थे लेकिन भाग्य के भरोसे रहना और भाग्य के भरोसे रहने वालों से उन्हें सख्त नफरत रहती थी। कई बार घोर निराशा और निपट अर्थहीन होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और कर्म के बल पर सफलता प्राप्त की । सफलता के मुकाम पर पहुंचने के बावजूद उन्होंने कभी जुआं या रेस में पैसा नहीं लगाया। फिर भी वे कहते हैं कि फिल्म व्यवसाय एक जुआं ही है जिसमें अंत तक अनिश्चितता की नाव पर सवार रहते हुए हिचकोले खाते हुए सफर करना होता है इसलिए निराशावादी लोग इस क्षेत्र में प्रवेश न करें तो बेहतर है। मायानगरी की चकाचौंध में परस्त्रीगमन या मद्यपान को कमजोरी की तरह नहीं अपनाया और परिवार नामक ईकाई को अक्षुण्ण बनाए रखा ।
अद्भुत रिश्ते और रिश्तों की गर्माहट, अलगाव की झुलसन , अलग-अलग जलवायु के निराले वातावरण और वहां बनते चले गए संबंधों की बानगी पढ़ते ही बनती है। रायगढ़ रियासत के दीवान रहे ममतालु दादा जी के सानिध्य में, मामा नानी के दुलार से लेकर कवि हृदय प्रशासक पिताजी, जिन्हें वे , जी, कहकर बुलाते थे, उस पुराने समय में भी पूरी तरह से बच्चों को उनकी मर्जी से खुलकर परवाज़ सौंपने में मदद करते दिखे जो मौलिक अधिकारों की रक्षा में बेहतरीन उदाहरण है। दुर्ग में जन्मे और रायगढ़, राजनांदगांव, भंडारा , तुमसर , गोंदिया जैसे कस्बों में बाल्यकाल गुजारते हुए सामूहिक परिवार के सानिध्य में उनके भीतर कला-बीज अंकुरित होकर विकसित, पुष्पित, पल्लवित होता रहा। बाद में वे चित्रकार भी हुए , लेखक भी और एक उम्दा शिकारी भी। भंडारा के पास एक गांव में रहते हुए एक ऐसी घटना का जिक्र इस किताब में हुआ है जिसे हर बार पढ़ते हुए असीम करुणा से दिल भर जाता है -, एक बार गांव के एक लालची नाई के झांसे में आकर बालक किशोर साहू ने अपने तहसीलदार पिता से मुलायम सुंदर पंखों की खातिर उस क्षेत्र में पाये जाने वाले घनचिड़िया की मांग कर दी क्योंकि वह जानता था कि पिता कुशल शिकारी थे । बच्चे की घोर जिद पर एक दिन पिता ने अपने शिकारी बन्दूक से घर के आंगन के पेड़ में जोड़ी में बैठे एक घनचिड़िया को मार गिराया जिसे लेकर बालक उस नाई के पास गया जिसने उसके पंख से सुंदर टोपी बनाने का लालच दिया था। दरअसल वह नाई उस चिड़िया का कोमल स्वादिष्ट मांस खाना चाहता था इसलिए बहाना बनाकर उसे खाली हाथ लौटा दिया। उस दिन से ही मारे गए पक्षी का जीवित साथी प्रतिदिन सायकिल से पिता के घर से सुबह तहसीली जाने की दो मील दूरी तक शोर करते हुए पीछा करता था और शाम को वापस आते समय भी उसी तरह शोर करते हुए घर तक पीछा करता था। उसे अपने प्रिय की असह्य विछोह ने विद्रोही बना दिया था। घर वालों के निंद्रा में जाने तक भी वह पक्षी उसी पेड़ पर बैठ कर दिन-रात क्रंदन करता छटपटाता था । अंततः विरह वेदना की व्याकुलता से दो दिन बाद वह अकेला जीवित पक्षी अपनी जान दे देता है। इसकी जानकारी मिलते ही पिता अत्यंत क्रोधित हुए और बन्दूक लेकर उस लालची नाई को जान से मारने को उद्धत हो गए जिन्हें घर वालों द्वारा भरसक रोका गया। लेकिन उस घटना ने बालक किशोर को एकदम से संवेदनशील बना दिया और ताउम्र उसकी आंखों में करुणा की तरलता बनी रही ।
बम्बई में भविष्य की रुपरेखा बनाने के लिए किशोर ने नागपुर में अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा पूरी करते हुए अभिनय की दुनिया में कदम रखा और थियेटर में खुद को आजमाया। शोहराब मोदी जैसे सिद्ध-हस्त कलाकार से मार्गदर्शन मिला और फिर अपने को पूरी तरह फिल्म उद्योग में झोंक दिया क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास था अपने हुनर और कला-कौशल पर। निष्ठुर, जज्बाती , कारोबारी मायानगरी ने सचमुच में उसे कई बार रंक से राजा बनाया लेकिन राजा से रंक बनाने में भी देर नहीं की । संघर्ष के दिनों में प्रेम विष भी पिलाया और जलाया। फिर भी अतीत की सहेजकर रखी हुई जिद्दी भावनाओं और जिजीविषाओं ने स्वप्न को सही करने की ताकत दी। इस दौरान कदम कदम पर घरवालों का अद्भुत सहारा भी कम नहीं था । यहां तक कि प्रथम पत्नी से संबंध विच्छेद के बाद हजार किलोमीटर दूर शांति निकेतन में अध्ययनरत नैनीताल की युवती प्रीति पांडे से प्रेम व्यवहार करते हुए भी उसी तल्लीनता से साथ दिया, जबकि वे अलग-अलग जाति और व्यवसाय से थे ।
शुरुआती दिनों में बम्बई के मशहूर फिल्मकार हिमांशु राय और उनकी अभिनेत्री पत्नी देविका रानी का सहारा तो मिला लेकिन जल्दी ही वो भ्रम टूट गया। बाद में और भी कई बार टूटा, अलबत्ता मध्य भारत के ही खंडवा से गए युवक अभिनेता अशोक कुमार की मित्रता उन्हें लंबे समय तक मिली । जीवट युवा किशोर को असफलता से लोहा लेते हुए अपनी खुद की फिल्म कंपनी बनाते हुए भी न जाने कितने पापड़ बेलने पड़े लेकिन इन सबमें परवरिश की बुनावट ने ही संघर्ष करने की असीम ताकत दी। इसीलिए आज भी बुजुर्ग लोग सुकुमार बच्चों को अपने दम पर भरपूर संघर्ष करने की सलाह देने से नहीं हिचकते कि मिट्टी का घड़ा जितना तपेगा उतने लंबे समय तक अपने भीतर जल को धारेगा । युवा किशोर ने अंततः अपनी प्रेयसी को पत्नी के रूप में पाने में सफलता पाई। किशोर साहू सफल दिग्दर्शक, लेखक और आकर्षक अभिनेता के रूप में देश-विदेश में ख्यात हुए इसलिए उनके साथ उस समय की अनेक रूपवान सिद्ध हस्त अभिनेत्रियां उनकी नायिका बनने को उत्सुक रहती थी। उन्होंने बीना राय, मीना कुमारी, शोभना समर्थ, दिलीप कुमार, मनोज कुमार, कामिनी कौशल, सुनील दत्त, राजकुमार जैसे कितने ही कलाकारों को अपनी फिल्म में काम देकर अच्छी शुरुआत दिलाई और कितने ही फाइनेंसरों को अमीर बना दिया। बड़े बड़े राजनेता भी उनके तर्क और तहजीब के कायल थे इसलिए समय समय पर उनका सहयोग और सहचरी प्राप्त होता रहा।
लगभग चार सौ पेज की यह किताब तीसरी बार पढ़ते हुए भी किसी पंक्ति को बिना पढ़े छलांग जाने की अनुमति नहीं देती। हंस के संपादक -कथाकार राजेन्द्र यादव उनकी लेखनी से परिचित और प्रभावित थे इसलिए जीवनी के प्रकाशन के लिए कुछ सुझाव भी साझा हुए लेकिन बात नहीं बनी और पांडुलिपि वैसी ही पड़ी रही। उनके गुजर जाने के पैंतीस साल बाद राज्य सरकार की पहल से, मेरी आत्मकथा, शीर्षक से 2017 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आ पाई । इस किताब में कुछ प्रियजनों के बारे में लिखे उनके रेखाचित्र अद्भुत पठनीय हैं जैसे रायगढ़ के महाराजा, राजनांदगांव के राजकुमार महंत दिग्विजय दास, अभिनेत्री रमोला, सरदार वल्लभ भाई पटेल, राममनोहर लोहिया, सदाबहार देवानंद, कमाल अमरोही, के आसिफ, कामिनी कौशल, देविका रानी या फिर दादा मुनि अशोक कुमार। सभी पर लिखते हुए उन्होंने ये जाहिर भी किया है कि सहमति -असहमति के बावजूद उनके मन में बैर भाव या कटुता का भाव स्थायी कभी नहीं रहा।
तत्कालीन मुख्यमंत्री ने किशोर साहू के लिखे इस किताब, मेरी आत्मकथा, की प्रस्तावना में लिखा है कि इस प्रयास को छत्तीसगढ़ के गौरव को पुनः स्मरण करने की दिशा में एक कदम माना जाय । संयोग से ही सही अगर भूलवश सत्ता कभी कुछ अच्छे काम कर जाती है तो यह हमारी जीत ही है। ऋषि गजपाल, भिलाई