बूढ़ी होती स्त्री…
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसके सिर पर कभी यह घर टिका था,
आज उसी घर की दीवारों से सिर टिकाकर
सपनों की राख झाड़ती है
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसकी थाली में भोजन तो है
पर वो हर निवाले में रिश्तों की नमी ढूँढ़ती है।
उसके सामने खाना रखा है,
पर कोई आँखें नहीं जो ये देखें —
वो खा रही है या आँसुओं को निगल रही है
बूढ़ी होती स्त्री…
जो कभी नज़रें झुकाकर न चली,
आज ज़मीन पर निगाहें गड़ाए
घर में अपने ही कदमों की आवाज़ दबा रही है,
कि कहीं किसी को खलल न पड़े।
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसके आँगन की तुलसी में हर सुबह जल चढ़ता था,
अब वही तुलसी सूखी खड़ी है,
और उसके मन की नमी
धीरे-धीरे छूट रही है।
वो खिड़की के परे
सड़क पर भागती दुनिया को देखती है —
जहाँ उसके लिए कोई जगह नहीं बची।
सड़क पर अब वो नहीं जाती,
क्योंकि “अम्मा, क्या करोगी वहाँ जाकर?”
एक वाक्य उसके पाँवों में बेड़ी बन गया है।
बूढ़ी होती स्त्री…
जो जीवनभर कपड़े सिलती रही,
आज उसकी उंगलियाँ काँपती हैं
और अपनी सलवटें छुपाती हैं।
उसका चश्मा अब केवल धागे पिरोने के लिए नहीं,
उस धुँधलके को सहने के लिए है
जो रिश्तों की आँखों में उतर आया है।
वो अपने कंधों पर यादों की गठरी उठाए बैठी है,
पर अब कोई उस गठरी को हल्का करने नहीं आता।
क्योंकि अब वो “अम्मा” है,
“बड़ी माँ” है,
उसका नाम तो कब का खो गया…
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसकी गोद कभी शरण थी,
अब वही गोद खाली पड़ी है,
उसमें अब केवल थकान बैठती है।
वो अब भी चाहती है —
कोई उसका सिर सहलाए,
कोई उसकी हथेली थामे
जैसे कभी वो थामा करती थी।
उसकी आवाज़ अब भी वही है —
मुलायम, धीमी, सहेजती हुई।
पर अब वो किसी के कानों तक नहीं पहुँचती।
घर में आवाज़ें बहुत हैं,
पर उसके हिस्से की कोई आवाज़ नहीं।
बूढ़ी होती स्त्री…
जो बच्चों को हौसला देती रही,
आज खुद दीवार का सहारा ढूँढ़ती है।
वो कमरे की घड़ी की टिक-टिक सुनती है —
जैसे हर पल कोई उससे कह रहा हो —
“अब तेरी ज़रूरत नहीं रही।”
वो अब भी त्योहार पर चुपचाप नए कपड़े निकालती है,
शायद कोई पूछ ले —
“अम्मा, तैयार हो रही हो?”
पर उसकी नज़रें हर बार अलमारी में ही ठहर जाती हैं।
वो अपने कंधों पर
यादों की गठरी उठाए बैठी है —
बचपन, जवानी, माँ होना, दादी होना…
सब कुछ था उसमें,
बस अब कोई नहीं है उसमें झाँकने वाला।
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसका चेहरा अब आईने में कम,
यादों में ज़्यादा दिखता है।
वो अब भी चाहती है —
कोई उसे देखे वैसा जैसा वो थी,
ना कि जैसा वो दिखती है।
और वो सहेज रही है
अपनी आखिरी बची गरिमा को —
किसी पुराने संदूक में बंद
अपने कसीदे, अपनी चिट्ठियाँ,
अपने वो ख़त जो कभी किसी ने लौटाए नहीं।
बूढ़ी होती स्त्री…
हर शाम खिड़की से बाहर देखती है —
जैसे दूर से आती धूप से
दो मीठे बोल मांग रही हो।
बूढ़ी होती स्त्री…
जिसकी थकन को हम देखना नहीं चाहते,
क्योंकि उससे हमें अपने भविष्य की तस्वीर दिखती है।
बूढ़ी होती स्त्री…
अब भी पूरी है —
पर हम उसे अधूरी मान लेते हैं,
क्योंकि वो माँग नहीं करती,
वो शोर नहीं मचाती,
वो बस इंतज़ार करती रहती है —
किसी हाथ के बढ़ने का।
रचना : पंकज प्रसून, लखनऊ
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