March 6, 2026

देवरबीजा का प्राचीन सीता देवी मंदिर

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छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले का देवरबीजा ग्राम प्रवासी पक्षियों के रहवास का एक मुख्य स्थल है। इन प्रवासी पक्षियों ने देवरबीजा के प्राचीन मंदिर के आसपास के पेड़ो पर ही अपना ठिकाना बना रखा है। शांत सुरम्य वातावरण में स्थित प्राचीन मन्दिर इन पक्षियों का कोलाहल से महीनो तक निरंतर गुंजायमान रहता है।
इस ऐतिहासिक मंदिर को देवरबीजा के स्थानीय लोग सीता देवी मंदिर कहते हैं। हालांकि यह सही ज्ञात नही हो पाया कि इसे सीता देवी मंदिर क्यों कहते हैं। यहां के स्थानीय लोग गर्भगृह में स्थापित राजपुरूष की प्रतिमा को सीता देवी मानते हैं और लोक में यह नाम प्रचलन में आ गया।

तालाब के किनारे स्थित यह मंदिर मूल रूप से शिव मंदिर है।मंदिर में सिर्फ़ एक वर्गाकार गर्भगृह मात्र है। गर्भगृह में राजपुरूष की एक प्रतिमा और कुछ अन्य खंडित प्रतिमाएं रखी हुई है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ़ नदी देवियां गंगा यमुना की प्रतिमाएं स्थापित है। प्रवेशद्वार के ललाट बिंब में गणेश जी का अंकन है। ऊपर सिरदल में नवग्रह एवम महिष पीठ स्थापित शिवलिंग की पूजा करते हुए पांडवों का अंकन किया गया है। ऐसा शिल्प पट्ट पास के गंडई, जांजगीर और बालोद के मंदिरों में भी मिलता है।

इसका शिखर नागर शैली में निर्मित है। शिखर पर मात्र आमलक ही शेष है। शिल्प कला की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक विरासतों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।यह प्राचीन देवालय देवी देवताओं एवम तत्कालीन लोक दृश्यों की विभिन्न प्रतिमाओं से सज्जित किया गया है। एक प्रतिमा में नृत्य करते हुए स्त्री पुरुषों को अंकित किया गया है। ।इस दृश्य में दो पुरूषों के मध्य एक स्त्री पीछे से हाथ पकड़े हुए नृत्य की मुद्रा में है। इस नृत्य दृश्य को बस्तर के आदिवासी समुदायों में प्रचलित नृत्य की प्राचीनता से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

देवी देवताओं की प्रतिमाओं में अष्टभुजी गणेश की प्रतिमा स्थापित है, जिनके हाथों में परशु, सर्प, पद्म, मोदक पात्र आदि हैं। एक प्रतिमा मुण्ड माला पहने चतुर्भुजी भैरव की है, जिनके हांथों में डमरू व कपाल स्पष्ट दिखाई दे रहा है। एक प्रतिमा में चतुर्भुजी शिव अन्धकासुर का बध करते हुए दिखाये गये है, जबकि ऊपरी आले में चतुर्भुजी नटराज का अंकन है। जिनके दो हाथों में खटवांग एवं त्रिशूल तथा शेष दो भुजाएं नृत्य मुद्रा में है। प्रतिमा के नीचे दायीं ओर नंदी का अंकन है।

इस मंदिर में एक ब्रह्म की मूर्ति भी है। चतुर्भुजी ब्रम्हा, स्रुव, पुस्तक, कमण्डल एवं एक हाथ बरद मुद्रा मेंप्रदर्शित है। कमल पुष्प धारण किये हुए स्थानक मुद्रा में सूर्य की प्रतिमा भी स्थापित है। एक दुर्लभ प्रतिमा ष्ठभुजी हरिहरहिरण्यगर्भ प्रतिमा भी स्थापित है, जिनके दायें हाथों में पद्म, शंख, त्रिशूल तथा बायें हाथों में खट्वांग, चक्र व पद्म सुशोभित है, वे किरीट मुकुट, कुंडल, हार, यज्ञोपवीत एवं मेखला धारण किये हुए हैं।

देवी मूर्तियों में चतुर्भुजी महिषासुर मर्दिनी त्रिशूल, खड्ग, खेटक लिए महिष का बध करते हुए अंकित है। दुसरी प्रतिमा चतुर्भुजी वैष्णवी पद्मासन मुद्रा में शंख, चक्र, पद्म एवं गदा लिए हुए आसीन है, जो कुंडल, हार, केयूर, मेखला आदि आभूषणों से अलंकृत है।
ललितासन में चतुर्भुजी कौमारी की भग्न प्रतिमा है, जिनके एक हाथ में कुक्कुट है तथा दूसरा हाथ घुटने पर रखा है, शेष दो हाथ खंडित है। इसके अतिरिक्त सरस्वती, गणेश, गजलक्ष्मी, ब्रम्हा एवं शिव प्रमुख हैं। बाह्य भित्ति की अन्य प्रतिमाओं में नृत्यरत अप्सरा, नृत्य पुरूष, मृदंग वादक, मिथुन-युगल, मालाधारी विद्याधर, गंधर्व, पुरूष उपासक व अंजलिमुद्रा में उपासक की प्रतिमाओं को यथोचित अंकित किया गया है। एक पुरूष प्रतिमा को दोनों हाथों में गदा लिए कई स्थानों पर उकेरा गया है।

इन प्रतिमाओं में कुछ प्रतिमाएं अधूरी है अर्थात् इन्हें पुरी तरह से ना बनाकर जैसे तैसे देवालय की भित्तियों पर स्थापित कर दिया गया है। इसका कारण क्या रहा होगा? संभव हो कोई आसन्न आक्रमण, या शासक की मृत्यु या अन्य कोई ना कोई कारण रहा होगा।
मन्दिर के समीप ही उत्तर मध्यकालीन प्रस्तर निर्मित सती-स्तम्भ भी है जिसे संरक्षित किया गया है।

यह देवालय कलचुरी शासन काल में बारहवी सदी में निर्मित माना गया है। मन्दिर के शिखर के दोनो तरफ़ नागों का अंकन है जिससे अनुमानित होता है कि कल्चुरी शासकों के अधीनस्थ इस क्षेत्र के किसी फणी नागवंशी सामंत ने इस मंदिर का निर्माण कराया हो।

ओम प्रकाश सोनी

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