अंजलि
अपना शहर सभी को प्यारा होता है। शहर रायपुर भी भौगोलिक एवं आत्मिक दोनों ही रूप से बहुत सुंदर एवं संस्कारित शहर है। नगर में ऐसी अनेक साकार एवं रूहानी चीजें हैं जो उसे सुंदर बनाती हैं और आपस में जोड़कर रखती हैं। जुड़ाव के इसी भाव एवं पक्ष को हम जमीन से जुड़े लगभग एक ऐसे अनाम चरित्र के माध्यम से पेश कर रहे हैं जिसने देश एवं विशिष्ट कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया था।
वे ब्राह्मणपारा में रहते थे। नाम तो उनका रामसहाय तिवारी था पर पूरा मुहल्ला उन्हें कामरेड के नाम से जानता था। तदनुसार हम भी उन्हें कामरेड बबा संबोधन से ही पुकारते थे। वे पूर्व महापौर प्रमोद दुबे के घर की पिछली गली में रहते थे। उनकी शिक्षा दीक्षा का तो पता नही़ पर यह तय है कि शिक्षा और बौद्धिक चेतना से संपन्न व्यक्ति ही कम्युनिस्ट बनता है। मैं बचपन में कभी कभार बुआ के साथ उनके घर जाती तो उन्हें तख्त पर कागज पत्तर समेटते और लिखते पढ़ते देखती थी।उन्होंने अपनी संपूर्ण जिंदगी कम्युनिस्ट पार्टी के नाम कर दी थी। वे सच्चे कम्युनिस्ट थे। उस काल में जब समाज में जातीय बंधन कठोर थे तब भी वे किसी सफाई कर्मचारी के साथ भोजन से गुरेज़ न करते थे। उनका दल के लिए समर्पण इतना था कि गृह्स्थी में भी नहीं उलझे। विवाह तो किया ही नहीं अपनी नियमित आय का भी कोई जरिया नहीं रखा। पार्टी कार्यालय से जो मिलता शायद उसी में गुजर करते थे। अपनी अकेली मां के इकलौते बेटे थे। घर में गुरबत का साम्राज्य था इसलिए मां किसी घरेलू व्यवसाय से किसी तरह घर चलाती थीं।
रायपुर में तब प्रमुख रूप से दो कम्युनिस्ट नेता थे। सुधीर मुखर्जी और रामसहाय तिवारी। दोनों फक्कड़ , दोनों अविवाहित, दोनों के आय का कोई नियमित साधन नहीं। (वह तो भला हो मतदाताओं का जिन्होंने सुधीर जी को पार्षद और विधारक चुन लिया तो आर्थिक रूप से उन्हें थोड़ी राहत मिली होगी) उनकी माएं कलपती रहतीं बेटा मैं बूढ़ी हो रही हूं। कब तक साथ दूंगी इसलिए शादी कर ले पर उस समय देखा गया था कि जिसे भी मार्क्सवाद का चस्का लग जाए वह घर परिवार से बेजार हो जाता था। इनमें सुधीर तो नगरीय राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते जबकि कामरेड बाबा जहां मजदूर आंदोलन हो या सामाजिक समस्या या कोई महत्वपूर्ण आयोजन सभी जगह उपस्थित रहते थे। चित्र में जो चश्मा लगाए हुए हैं वही रामसहाय तिवारी हैं जो सन ५६ में आजाद चौक में गांधी मूर्ति उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल थे।बीच में खड़ी वही हरिजन बच्ची है जिसके हाथों कमलनारायण शर्माजी ने गांधी के सिद्धांतों के अनुरूप मूर्ति का उद्घाटन करवा दिया था।
तब का समय और था समर्पित कार्यकर्ता अपने लिए बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के जमीनी कार्य करते थे। तो कामरेड बबा भी एक जगह टिकते न थे। दल के कार्य से घूमते रहते थे। अब उस मुद्दे पर आते हैं जिसके लिए हम कामरेड बबा को याद कर रहे हैं। सन सही सही याद नहीं पर यह सातवें दशक के उत्तरार्ध की बात है जब छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार रायगढ़ में दंगा भड़क उठा था। कामरेड बाबा तब वहीं थे। रायगढ़ के जूट मिल में कर्मचारियों की वेतन संबंधी अशांति ने दंगे का रूप ले लिया था। सुनते थे कि कामरेड बाबा मजदूरों के हित में प्रदर्शन में उनके साथ शामिल थे। इसलिए ब्राह्मण पारा में उनको लेकर सुधी लोग चिंतित रहते थे। दंगे के कारण रायगढ़ में कर्फ्यू लग गया था और इस वजह से शहर एक प्रकार से अलग थलग हो गया था। कर्फ्यू के साए में सांस लेते शहर की कुछ खबरें छनकर रायपुर आती तो कुछ वहां से बचकर आए व्यक्ति वहां की दशा बताते।
आजादी के प्रारंभ काल से संदेशों के आदान प्रदान हेतु कमल और रोटी लेकर शुरू हुआ व्यक्तिगत संपर्क का सिलसिला सातवें दशक तक चला। इस संपर्क में कमल आजादी का और रोटी भूख का प्रतीक थी। तात्पर्य यह कि आजादी हमें हासिल करनी है और आमजन की रोटी की व्यवस्था करनी है। आजादी के बाद कमल तो हासिल हो गया पर रोटी की लड़ाई अभी भी बाकी है। बाद में रोटी और कमल दोनों व्यक्ति गत संपर्क से बाहर हो गईं।
बहरहाल मेरे पिता वकालत में इस कदर व्यस्त रहते कि लोगों को उनसे मिलने का समय न मिलता तो प्राय: रात नौ बजे जब उनके भोजन का समय होता तभी निकटस्थ लोग उन तक पहुंच कर अपनी बात रखते या संदेशों का आदान प्रदान करते। उसी दौरान जब रायगढ़ कर्फ्यू के साए में था , वहां से किसी तरह छुपकर एवं बचते बचाते कामरेड बबा एक दिन रात में हमारे घर पहुंचे। कामरेड बबा रिश्ते में पिताजी के मामा होते थे पर हम उम्र थे तो उन्हें कामरेड बुलाते थे। चूंकि भोजन का समय था पिता ने कहा आओ कामरेड भोजन कर लो। टेबल पर बैठे बैठे ही बात हो रही थी और मैं वहीं भोजन परोस रही थी। पिता ने पूछा तुम किस तरह रायपुर आ गए। तब बबा ने वहां से अपने निकलने की कहानी के बाद जो जानकारी दी वह नगर के सामाजिक सौहार्द्र को बयान करती है जिसे सुनकर हर नगरवासी का हृदय गौरव से परिपूर्ण हो उठेगा।
उन्होंने बताया कि मजदूरों का आंदोलन किस तरह सांप्रदायिक हो उठा कि रायगढ़ से एक व्यक्ति संदेश लेकर भिलाई पहुंचा और देर रात रायपुर के एक नामचीन एवं प्रतिष्ठित मुस्लिम व्यवसायी के घर पहुंचा और किसी विशिष्ट योजना की जानकारी दी। योजना सुनकर उनका दिमाग हिल उठा पर वे इस विषय पर चुप रहे । बस इतना कहा आइए भोजन करते हैं। भोजन के बाद उन्होंने जो उस आगंतुक को नसीहत की वह इतिहास के पन्नों में लिखने लायक है। उन्होंने भोजन के उपरांत उन्हें पान देते हुए कहा ” मैं यहां बरसों से व्यवसाय कर रहा हूं, मेरा व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा है, मुझे कोई समस्या नहीं है , सभी मेरे अपने हैं और यहां सामाजिक रूप से सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता। इसलिए कृपया आप यहां से तशरीफ ले जाएं “। मुझे उनका नाम याद नहीं आ रहा है पर उन दिनों कीकाभाईजी की रायपुर में बहुत बड़ी और विश्वसनीय दुकान थी। हो सकता है उसी फर्म के मालिक रहे हों। रायपुर के सामाजिक माहौल पर उनकी अभिव्यक्ति सुन हमारे घर में तब उपस्थित सभी जन गदगद् हो गए। यह सिर्फ वाक्य नहीं रायपुर की सुंदरता का बयान था जिसका संरक्षण पीढ़ियों से चला आ रहा है। इसे लेकर हर रायपुरवासी गौरवान्वित है। धन्यवाद कामरेड बाबा का जिन्होंने इतने अच्छे वाकये की जानकारी साझा की। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। डॉ सविता पाठक