March 6, 2026

अनगढ़ को गढ़ने वाले सत्यदेव दुबे : अमरीश पूरी

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मैं प्रायः दुबे साहब से कहता, “मेरे मस्तिष्क में कहीं रुकावट है क्योंकि आप जो भी बताते हैं, मैं उसे समझ जाता हूँ परन्तु उसे क्रियान्वित नहीं कर पाता।” उन्होंने मुझे दिलासा देते “चिन्ता मत करो। जिस दिन तक यह बाधा समाप्त नहीं हो जाती, निरन्तर प्रयास करते रहो और जब वह दिन आयेगा, तुम सब समझ जाओगे। अभी तुम्हारा मस्तिष्क तैयार नहीं है, इसमें समय लगेगा।” वे मुझे तुरन्त एक ही बार में सब बातें बता देते क्योंकि वे इस कला में दक्ष थे। आज भी यद्यपि मुझे रंगमंच के लिए समय नहीं मिलता परन्तु मैं निरन्तर इस ओर लौटने का प्रयास करता रहता हूँ क्योंकि यह मंच उस प्रशिक्षण क्षेत्र के समान है जहाँ मैं अपने औजारों को धार दे सकता हूँ। रंगमंच, और अधिक सीखने तथा और अच्छा अभिनय करने की मेरी कार्यशाला है। रंगमंच पर ही अभिनय के समस्त व्यावहारिक पक्षों का अभ्यास किया और उन्हें बेहतर बनाया जा सकता है। जब आप कोई नाटक करते हैं तो इसकी अवधि भले ही दो घण्टे की हो परन्तु इसके लिए तैयारी आप चार सप्ताह तक करते हैं। प्रारम्भ में आप पंक्तियों का केवल उच्चारण करते हैं और जब यह सब भीतर समा जाता है तो आप समझते हैं कि उसमें क्या कहा गया है और तब आप अपने भावों को जाग्रत करते हैं और यह करना सर्वाधिक कठिन है। रंगमंच में आप वस्तुओं के लिए केवल ऑर्डर करके निश्चिन्त होकर नहीं बैठ सकते, आपको स्वय दुकानों पर जाकर काम करवाना पड़ता है। वहाँ व्यक्ति को ढेरों काम करने पड़ते हैं और यह भूल जाना होता है कि आप किसी पद पर हैं।

दुबे साहब जिन नाटकों का चयन करते थे, वे विषयों की गहराई की दृष्टि से बहुत ही आकर्षक होते थे और वे उन्हें बहुत ही असाधारण ढंग से मंचित करते। नाटक यदि तीन घण्टे तक भी चलता तो दर्शकों में से कोई टस से मस न होता । विषय का चयन कर लेने के बाद वे मंच सज्जा की चिन्ता नहीं करते थे। वे नाटक की मूल शक्ति को उजागर करने पर और उसके मंचन को भी उतना ही शक्तिशाली बनाने में अपने योगदान पर ध्यान केन्द्रित करते।

अनेकशः वे लिखे हुए नाटक से कहीं आगे निकल जाते । उनमें उस समय असाधारण जोश और ऊर्जा थी, उनका बहुत ही रचनात्मक समय था वह। वे ये सुनिश्चित करते कि नाटक उत्तम ढंग से प्रस्तुत किया जाए।

दुबे साहब के रंगमंच सम्बन्धी कुछ प्रयोग उनके कुछ आलोचकों को चाहे कितने भअस्वीकार्य क्यों न हों, वे उन्हें अपनी प्रस्तुतियों की शक्ति के बल पर मौन रहने को विवश कर देते थे। दुबे साहब साहसी निर्देशक थे और उनमें नाटक के परम्परागत रूपों अथवा स्वीकृत तकनीक के प्रति तनिक भी सम्मान न था। इस प्रकार लीक से हटकर की जाने वाली उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शकों में चुम्बकीय आकर्षण उत्पन्न कर जाती है।

दुबे साहब इस बात का बहुत ध्यान रखते थे कि वे किसी बेरोज़गार कलाकार को नहीं लेते थे, वे अपने कलाकारों को साफ-साफ बता देते कि वे थियेटर से कुछ अपेक्षा न रखें। हमें ‘थियेटर यूनिट’ के लिए राज्य से अनुदान मिल रही थी परन्तु इसके लिए हमें अनेक फार्म भरने पड़ते, अनेक औपचारिकताएँ पूरी करनी पड़तीं और एक-एक हिसाब-किताब रखना पड़ता। विडम्बना यह थी कि सारा धन कागज़ी कार्यवाही पर ही खर्च हो जाता और हमें कोई आय न होती । सो दुबे साहब ने समझदारी का निर्णय लिया कि हम यह अनुदान नहीं लेंगे और सब अपने ही स्तर पर करेंगे। अब जबकि हमें बिना भुगतान के रिहर्सल के लिए स्थान मिल गया था, कलाकार को भी कोई भुगतान नहीं किया जा रहा था तो प्रोडक्शन पर जो भी धन खर्च होता, वह हम टिकटों पर रखे जाने वाले शो से जुटा लेते। यदि हमें नुकसान होता तो कोई दयालु आत्म आगे बढ़कर हमें उस संकट से उबार लेती। प्रारम्भ में मैं कुछ योगदान नहीं दे पाता था पर जब मेरी आय बढ़ी तो मैं भी योगदान देने लगा, आज भी जब भी दुबे साहब कहते हैं, आर्थिक सहायता कर देता हूँ। हमें अभिनेताओं के रूप में व्यावसायिक ढंग से प्रशिक्षण दिया गया था परन्तु हमने पूर्णतः अव्यावसायिक थियेटर में काम किया और हमें एक पाई भी न मिलती थी। यह प्रक्रिया सदा जारी रही और हिन्दी थियेटर का इस प्रकार से गुज़ारा भर चल था। इसके विपरीत मराठी और गुजराती रंगमंच व्यावसायिक रंगमंच थे और उनके कलाकार व तकनीशियनों को भुगतान किया जाता था। उन्हें मराठी और गुजराती भाषी नाटक प्रेमी दर्शक वर्ग से बहुत आर्थिक सहायता मिलती थी। इस प्रकार अनेक कलाकार थियेटर से अप आजीविका पा रहे थे।

इस समय हिन्दी थियेटर बम्बई में यद्यपि बहुत लोकप्रिय नहीं था परन्तु ‘थियेटर यूनिट’ की उच्च स्तर की शक्तिशाली प्रस्तुतियों से बहुत पहचान पा गया। हमें हिन्दी थियेटर के लिए शीघ्र ही एक दर्शक वर्ग तैयार करने में वास्तव में बहुत सफलता मिली। दुबे साहब की आश्चर्यजनक प्रतिभा ही केवल उनकी सर्वोत्तम विशेषता नहीं है अपितु उनमें दूसरों में भी इस प्रतिभा का संचार कर आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त करने की अनुपम योग्यता भी है। वे चिंगारी को सुलगाना जानते हैं और उन्होंने अपने विचारों से अनेक लेखकों को बेहतर लेखक, निर्देशकों को बेहतर निर्देशक और अनेक कलाकारों को बेहतर कलाकार बनाया है। उनके लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि दूसरे की ग्रहण क्षमता कितनी है। मुझे लगता है कि यदि दुबे साहब ने मुझे न देखा और धमकाया होता तो मैं अपनी उत्तम प्रस्तुतियाँ दिये बिना ही जीवन व्यतीत कर इस संसार से चला गया होता।

अप्रशिक्षित प्रतिभा जंगल के उन सुन्दर और शानदार फूलों के समान होती है जो किसी के द्वारा बिना देखे, सूंघे और प्रशंसा के सूख जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं। हमारे चारों ओर कितनी प्रतिभा बिखरी है और हम उसके अस्तित्व को जानते तक नहीं। दुबे साहब शायद एकमात्र ऐसे अध्यापक हैं जिन्होंने सर्वाधिक युवाओं को प्रशिक्षण दिया है, पूरी तरह से अनगढ़, नई प्रतिभाओं को लिया, थियेटर गतिविधियों पर अनगिनत कक्षाओं, कार्यशालाओं, शिविरों और सम्मेलनों का आयोजन किया।

(अमरीश पूरी की आत्मकथा जीवन का रंगमंच से।)

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