ज्योति कलश (कृति चर्चा)
विनोद साव
भिलाई-३ के लेखक साथी छगनलाल सोनी ने उपन्यास ‘ज्योति कलश’ पढ़ने को दिया. इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। यह महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन पर केंद्रित उपन्यास है जिसे प्रसिद्ध कथाकार संजीव ने लिखा है। संजीव जी से हंस कार्यालय दिल्ली में एक बार मुलाकात हुई थी तब उनसे लंबी बातचीत हुई थी। उन्होंने छत्रपति शाहूजी पर और पूरबी के अनन्य गायक महेंद्र मिश्रा पर भी केंद्रित उपन्यास लिखे हैं। उनके अच्छे लेखन के साथ यह कृति इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि एक दलित वर्ग के विलक्षण व्यक्तित्व पर केंद्रित कर यह उपन्यास लिखा गया है। यह कृति ज्योतिबा और उनकी जीवन संगिनी सावित्रीबाई फुले के असाधारण जीवन संघर्ष और प्रेरणास्पाद कार्यों का वृतांत है। कुछ दिनों पहले ज्योतिबा फुले पर एक फिल्म बनी है उसे भी देखा है। पुणे में शनिवार वाडा के पास फुले दंपति के घर को भी मैने देखा है जहां उनका खुदवाया हुआ वह कुआं है जिसमें अछूतों के पीने और पानी भरने के लिए अपने दरवाजे उन्होंने खोल दिए थे।
19वीं सदी के तीसरे दशक में जन्मे ज्योतिबा, गांधी और विवेकानंद जैसे महामानव से 30 वर्ष पहले आ गए थे और अपने अद्भुत विलक्षण कार्यों से देश समाज में अपनी पैठ बना गए थे। ज्योतिबा के और उनकी पत्नी सावित्री बाई के कार्यों को देखकर बहुत अचंभा होता है कि इन्होंने अपने स्वाध्याय से अपने आप को मानसिक बौद्धिक दृष्टि से कितना ऊर्जा संपन्न कर लिया था और अपनी ऊर्जा को वंचित मनुष्य के प्रति संवेदना में किस तरह से रूपांतरित कर लिया। उन्होंने अपने को हिंदी अंग्रेजी मराठी भाषाओं में पारंगत कर लिया था और जमीनी कार्यकर्ता होने के अतिरिक्त लेखक, कवि और नाटककार होकर भी समाज को प्रेरणा दे सके थे। अपनी रचनाओं के माध्यम से जनमानस को आंदोलित कर सके थे।
फुले दंपति के कार्यों और उनकी योजनाओं को सफल बनाने में अंग्रेज मिशनरी और उस समय के अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारियों का उन्हें पूरा सहयोग मिला था। ज्योतिबा ने पुणे में स्कॉटिश ईसाई मिशनरी स्कूल से अंग्रेजी माध्यम से हाई स्कूल किया था। अंग्रेजों ने उन्हें शिक्षा आयोग से जोड़ा उनके व्याख्यान करवाए। बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ ने जैसे अंबेडकर को आगे बढ़ने में सहायता पहुंचाई थी उन्हीं महाराजा के पूर्वज ने फुले दंपति को अपनी कार्ययोजनाओं के संचालन के लिए आर्थिक सहायता दी।
अंबेडकर जी से पहले उन्हीं की तरह पढ़े लिखे और अद्भुत मेधा संपन्न व्यक्ति हो गए थे ज्योति बा। पति पत्नी दोनों ने मिलकर शूद्रों को शिक्षा देने की शपथ ली। ब्राह्मणों के विरोध के बाद भी कुछ ब्राह्मण साथियों ने सहयोग किया। ब्राह्मण मित्र विष्णु शास्त्री चिपलुणकर के वाडा में बालिका विद्यालय प्रारंभ किया, रात्रि पाठशाला शुरू की, विधवाओं के पुनर्विवाह में सहायता, बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की शुरुआत की थी।
सावित्री बाई ने नॉर्मल स्कूल से शिक्षक का प्रशिक्षण लिया फिर अपनी मुसलमान सहेली फातिमा शेख के साथ मिलकर पहली कन्या पाठशाला खोली, महिला सेवा मंडल द्वारा पहला तिलगुड़ समारोह करवाया। महाराष्ट्र में अकाल के दौरान 52 आहार केंद्र खोले। अपने पति ज्योतिबा की मृत्यु पर उन्हें मुखाग्नि देने वाली पहली महिला बनी। नि:संतान थी तो एक विधवा ब्राह्मण स्त्री के बेटे को गोद लिया. फिर उसका पहला अंतरजातीय विवाह करवाया। अंत में शहर में फैले प्लेग में मरीजों की सेवा करते करते सावित्री बाई फुले ने अपने प्राण तजे थे।
इन सबसे रूबरू होना वास्तव में उस आधार से वाकिफ होना है जिस पर वर्तमान भारत खड़ा है एक सच्चे समाज सुधारक, एक वास्तविक नायक और एक अनन्य स्वप्न द्रष्टा की यह जीवन कथा है।