March 6, 2026

101 वर्ष के रामदरश मिश्र

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चंद्रेश्वर
आज की तारीख़ में रामदरश मिश्र हिन्दी- भोजपुरी के सबसे उम्रदराज़ जीवित साहित्यकार हैं। वे आज शुक्रवार,15 अगस्त 2025 को अपने जीवन के 102 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। यह हिन्दी-भोजपुरी दोनों ही साहित्य समाजों और संसारों के लिए एक विरल परिघटना है। रामदरश मिश्र हर विधा के सर्जक हैं। वे कवि- गीतकार, ग़ज़ल गो, कहानीकार, उपन्यासकार, निबंधकार, आलोचक, संस्मरण-लेखक और आत्मकथाकार भी हैं। एक तरह से कहा जाये तो वे गद्य-पद्य दोनों ही शैलियों में समान रूप से अभ्यासी हैं- “गद्य -पद्य में समाभ्यस्त”। वे एक दीर्घावधि से साहित्य की साधना में लगे हुए हैं। वे कभी किसी विशेष वाद, विचारधारा या लेखक संगठन से नहीं जुड़े। वे किसी गिरोह से भी नहीं जुड़े। वे स्वतंत्र होकर लिखते-पढ़ते रहे हैं। उनका लिखा-रचा हुआ साहित्य अबतक विपुल मात्रा में प्रकाशित हुआ है। उनको हिन्दी संसार में काफी मान-सम्मान प्राप्त है। वे पुरस्कृत भी होते रहे हैं। इस विवरण में या इसके विस्तार में जाना यहाँ पर मेरा अभीष्ट नहीं है। उनका गद्य-पद्य का साहित्य लेखन बहुत ही सरल-सहज रहा है। वह एक तरह से अनलंकृत रहा है। उनके लेखन में किसी तरह का टेढ़ापन नहीं दिखता है। वे अपने समय, अपने परिवेश और अपने आसपास के जीवन एवं समाज से जुड़कर लिखते रहे हैं। उनके साहित्य में सत-असत, बुरे-अच्छे के बीच के संघर्ष को लेकर एक सहज, उदार मानवीय दृष्टि को आसानी से परिलक्षित किया जा सकता है। यह दृष्टि उनके समस्त लेखन में सहज ही अनुस्यूत है। वह कहीं से आरोपित नहीं है। अगर मुझे उनके समस्त लेखन में यह देखना ही होगा कि वे मूलतः एक कवि हैं अथवा एक गद्यकार तो मैं यही कहूँगा कि उनका गद्यकार उनके कवित्व पर भारी पड़ता है। यानी उनके यहाँ कविता उन्नीस है तो गद्य बीस। वैसे यह मेरा निजी आकलन है और इसे न मानने के लिए कोई भी स्वतंत्र है। यह दीगर बात है कि उनको ‘साहित्यअकादमी’ पुरस्कार कविता पर ही मिला है। गद्य में भी वे पहले एक अच्छे संस्मरण लेखक और आत्मकथाकार हैं। उनकी कहानियों और उपन्यासों पर भी इनका असर देखा जा सकता है। वे कविता की अपेक्षा गद्य में और गद्य में भी संस्मरण और आत्मकथा में विस्तार से अपने को या अपने समय और समाज को व्यक्त कर पाते हैं। इसके बाद उनके एक-दो उपन्यास हैं। उनके यहाँ गद्य में अभिव्यक्ति की सहजता ज़्यादा दिखती है । उनकी आलोचनात्मक कृतियों में कहानी और उपन्यास पर लिखी उनकी पुस्तकें परिचयात्मक और विद्यार्थियों के लिए भले उपयोगी हों ,उनमें आलोचना की गहरी अंतर्दृष्टि का अभाव-सा है। इसलिए जब भी कहानी आलोचना या उपन्यास आलोचना पर बात होती है वे मुख्य आलोचकों की क़तार से बाहर हो जाते हैं। उनके उपन्यासों में ‘पानी का प्राचीर’ और ‘जल टूटता हुआ’ की चर्चा होती रही है। जो भी हो, मैं यह स्वीकार करता हूँ कि हिन्दी सााहित्य या हिन्दी आलोचना में ज़रूरत से ज़्यादा खेमेबाज़ी और गिरोहबाज़ी होती रही है। इनमें वामधाराएं प्रभावी रही है। रामदरश मिश्र इन वामधाराओं के संगठनों,मंचों या खेमों से हमेशा बाहर रहे हैं। उनका लेखन इनके दबाव से मुक्त ही रहा है। इस वज़ह से वाम आलोचकों ने उनको उतना महत्व नहीं दिया जितने के वे हक़दार रहे हैं। मेरा मानना है कि रामदरश मिश्र ने सतत लिखकर या रचकर अपनी पहचान स्वयं अर्जित की है। आज की तारीख़ में उनकी शख़्सियत, उनकी रचनाएँ किसी आलोचक की आलोचना की मुँहताज़ नहीं हैं। वे हिन्दी की दुनिया में अपने लेखन और अपने पाठकों के दम पर टिके हुए हैं। उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार न भी मिलता तो उनकी ख्याति कहीं से तनिक भी कम नहीं होती। वे अपने लेखन के उस मुकाम पर हैं जहाँ वे अपना सर्वश्रेष्ठ साहित्य को दे चुके हैं। अब आलोचना या गिरोहबंदी भी उनका कुछ बना या बिगाड़ नहीं पायेगी। उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है,उनका सतत लिखते रहना। वे हर विधा में लिखते रहे हैं। उनकी गद्य कृतियों में ‘समय सहचर’,’जल टूटता हुआ’ या ‘पानी का प्राचीर’ आदि की स्मृतियाँ पाठकों के ज़ेहन में बनी रहेंगी। रामदरश मिश्र के साहित्य में पाठक निर्णायक भूमिका में हैं न कि आलोचक। उनके लेखकीय व्यक्तित्व का सबसे ज़्यादा अनुकरणीय पहलू है, उनकी सादगी-सरलता और निरंतर अपने लेखन के प्रति अविचल-अडिग आस्था और ‘एकला चलो रे’ की दृढ़ता एवं विश्वास भी। अब उम्र की इस दहलीज़ पर उनको पद्मश्री तो क्या पद्मभूषण अवॉर्ड मिलना चाहिए था। उनको बहुत बधाई और शुभकामनाएं । अंत में उनकी एक बहुउद्धृत रचना यहां प्रस्तुत है –

“बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।

जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।

न हँस कर न रोकर किसी में उडे़ला,
पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे।

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया,
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे।

ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।

मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।”
*
चंद्रेश्वर – लखनऊ
शुक्रवार,15 अगस्त 2025

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