स्त्री लौटती है
जब स्त्री मंदिर पहुँचती है,
मूरत उसके स्पर्श से सजीव हो उठती है।
वह कर सकती है तप,
क्षण -दो क्षण, घड़ी -दो- घड़ी,
पहर -दर -पहर,
यहाँ तक कि वर्ष -दर -वर्ष
परन्तु चिहुक उठती है –
मूरत से कहती है :
“स्त्री को बुद्ध मत बनने देना,
संसार ठहर जाएगा “।
मूरत मुस्काती है, समझती है उसकी भक्ति में
छुपा कर्तव्य, उसके समर्पण में बंधी निष्ठा।
@ स्त्री लौटती है
सत्ता के इछित पर्व मनाने,
कर्तव्य की अग्नि जलाने.
जीवन की लौ सँभालने।
अनिता गुप्ता