March 6, 2026
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जब स्त्री मंदिर पहुँचती है,
मूरत उसके स्पर्श से सजीव हो उठती है।

वह कर सकती है तप,
क्षण -दो क्षण, घड़ी -दो- घड़ी,
पहर -दर -पहर,
यहाँ तक कि वर्ष -दर -वर्ष

परन्तु चिहुक उठती है –
मूरत से कहती है :
“स्त्री को बुद्ध मत बनने देना,
संसार ठहर जाएगा “।

मूरत मुस्काती है, समझती है उसकी भक्ति में
छुपा कर्तव्य, उसके समर्पण में बंधी निष्ठा।
@ स्त्री लौटती है
सत्ता के इछित पर्व मनाने,
कर्तव्य की अग्नि जलाने.
जीवन की लौ सँभालने।

अनिता गुप्ता

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