दहेज और सामाजिक असमानता: डिग्रियों का फर्क
हमारे समाज में दहेज प्रथा ने वर्षों से गहरी जड़ें जमा रखी हैं। विवाह जैसे पवित्र बंधन को आर्थिक लेन-देन में बदल देने की यह प्रथा न महिलाओं के अधिकारों का हनन करती है और उनके शिक्षा और व्यक्तिगत योग्यता को भी पीछे धकेलती है।
जब किसी लड़के की शिक्षा और डिग्री की चर्चा आती है तो उसे उसकी कीमत में जोड़ा जाता है। उसके माता-पिता गर्व से कहते हैं, “देखो, हमारा बेटा इंजीनियर है, डॉक्टर है, MBA किया है” और दहेज की रकम तय करने में यह डिग्री निर्णायक भूमिका निभाती है। यही डिग्रियां उसकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बढ़ावा देती हैं।
लेकिन जब बात आती है बर्तन घिसने, घर संभालने या पारिवारिक जिम्मेदारियों निभाने की तो महिलाओं की डिग्रियों की कोई गिनती नहीं। चाहे वह लड़की डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो या प्रोफेसर, उसकी शिक्षा और मेहनत दहेज तय करने में बस एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। उसका मूल्य तब घरेलू क्षमताओं और पारंपरिक कौशल से मापा जाता है।
इस असमान व्यवहार का सबसे बड़ा नुकसान मानसिक और भावनात्मक होता है। एक पढ़ी-लिखी महिला, जिसने वर्षों मेहनत करके अपनी योग्यता हासिल की, उसे समाज “घर संभालने वाली” के रूप में देखता है। उसके सपने, उसकी महत्वाकांक्षाएं और उसकी पहचान दबा दी जाती हैं। यह व्यक्तिगत अपमान और सामाजिक रूप से महिलाओं के प्रति स्थापित असमानता की पुष्टि है।
दहेज प्रथा का यह पक्ष पूरी तरह तर्कहीन है। आज के समय में शिक्षा किसी भी परिवार की प्रगति और समाज की उन्नति का पैमाना है। यदि किसी महिला ने कठिन शिक्षा पूरी की है, तो उसका मूल्य घरेलू काम तक सीमित रखना समाज के विकास के खिलाफ है। किसी भी विवाह में आर्थिक या सामाजिक मापदंड तभी सार्थक होते हैं जब दोनों पक्षों के अधिकार और योग्यता बराबरी पर हों।
दहेज प्रथा और महिलाओं की शिक्षा के बीच यह असंतुलन समाज की बड़ी विडंबना है। यह समय की मांग है कि हम इस मानसिकता को बदलें। महिलाओं की डिग्रियां उनके सम्मान, उनके आत्मविश्वास और उनके समाज में योगदान का प्रतीक हों, न कि दहेज तय करने की औपचारिकता। जब शिक्षा और योग्यता का मूल्य बराबरी पर समझा जाएगा, तभी हमारा समाज सच में प्रगतिशील और न्यायपूर्ण बन पाएगा।
अंकिता पटेल