घुटने का दर्द : पाँच कविताएँ
चाँदनी रात में
घुटने की चरमराहट
पहाड़ की सैर का सपना
खामोशी में गूँजता है।
हर क़दम पर
जैसे पुरानी किताब का पन्ना
फटता, बिखरता, फिर भी पढ़ा जाता है।
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सुबह की धूप में – घुटने बोलते हैं
रेत पर चलते पाँव – काँटों से डरते हैं।
हर दर्द एक कविता
हर कविता एक साँस
जो रुक-रुक कर चलती है।
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पुरानी कुर्सी की तरह
घुटना चरमराता है
लकड़ी की स्मृति में
गाँव का आँगन बाकी है।
दर्द की लकीरें
जैसे नदी की धार – चुपके से काटती हैं।
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रात के सन्नाटे में
घुटने की टीस
जैसे टूटी चूड़ियों की खनक।
हर क़दम एक कहानी
हर कहानी अधूरी -फिर भी चलना है।
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हवा में उड़ता पत्ता
घुटने का दर्द ऐसा
न रुके, न थमे
बस बहता जाए।
पैरों में बंधी जंजीर
फिर भी मन उड़ान भरता है।
●●● जयप्रकाश मानस