October 22, 2026

घुटने का दर्द : पाँच कविताएँ

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चाँदनी रात में
घुटने की चरमराहट
पहाड़ की सैर का सपना
खामोशी में गूँजता है।
हर क़दम पर
जैसे पुरानी किताब का पन्ना
फटता, बिखरता, फिर भी पढ़ा जाता है।
●

सुबह की धूप में – घुटने बोलते हैं
रेत पर चलते पाँव – काँटों से डरते हैं।
हर दर्द एक कविता
हर कविता एक साँस
जो रुक-रुक कर चलती है।
●

पुरानी कुर्सी की तरह
घुटना चरमराता है
लकड़ी की स्मृति में
गाँव का आँगन बाकी है।
दर्द की लकीरें
जैसे नदी की धार – चुपके से काटती हैं।
●

रात के सन्नाटे में
घुटने की टीस
जैसे टूटी चूड़ियों की खनक।
हर क़दम एक कहानी
हर कहानी अधूरी -फिर भी चलना है।
●

हवा में उड़ता पत्ता
घुटने का दर्द ऐसा
न रुके, न थमे
बस बहता जाए।
पैरों में बंधी जंजीर
फिर भी मन उड़ान भरता है।
●●● जयप्रकाश मानस

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