राजपूताने में कवि ही मशहूर नहीं होते थे…
राजपूताने में कवि ही मशहूर नहीं होते थे, चोर भी प्रसिद्ध होते थे। ऐसा ही एक जनप्रिय, जनवादी, प्रगतिशील और विख्यात चोर था – जिसका नाम चरणदास था।
इस विख्यात चोर की लोककथा को बिज्जी उर्फ़ विजयदान देथा ने ‘खांतीलो चोर’ (प्रसिद्ध चोर) नाम से लिखा, जिस पर हबीब तनवीर ने ‘चरणदास चोर’ नाम से नाटक खेला, जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। बाद में इस कहानी पर श्याम बेनेगल ने बच्चों की एक फ़िल्म भी बनाई।
इस नाटक की रॉयल्टी/पैसों को लेकर जब बिज्जी और हबीब तनवीर में विवाद हुआ तब जयपुर के एक गेस्ट-हाउस में, उस अतिरिक्त-नाटक का एक गवाह मैं भी था। हबीब तनवीर ने कहा कि बिज्जी, जितना पैसा आप मांग रहे उतना तो मुझे नाटक से मिलता ही नहीं ( पूरा विवाद फिर कभी )। आखिरकार हबीब तनवीर को कहना पड़ा कि मैं आपका नाम छापना बन्द कर देता हूँ, क्योंकि यह तो एक लोककथा है।
इसके बाद हबीब तनवीर चरणदास चोर को बिज्जी की कथा पर आधारित नहीं, एक लोककथा पर आधारित नाटक कहने लगे। उन्होंने नाटक से विजयदान देथा का नाम हटा दिया।
चरणदास मामूली चोर नहीं था, वह सिर्फ़ मशहूर लोगों के यहां ही सेंध लगाता था।
और क्या अद्भुत संयोग कि दो दिन पहले बिज्जी और हबीब तनवीर का जन्मदिन था। यह प्रसङ्ग मैं तभी लिखना चाह रहा था, लेकिन बिज्जी और हबीब तनवीर के कथित विशेषज्ञों और अन्यान्य कारणों से नहीं लिख पाया।
आज पता नहीं क्यों मुझे चरणदास चोर की याद आयी।
चरणदास की एक उक्ति बहुत मशहूर है कि चोरों के यहां ही चोरी की सम्भावना अधिक होती है। चोर कहीं और सेंध लगाता है, उसी समय उसके घर में कोई दूसरा चोर अपनी चौर्यकला का प्रदर्शन कर रहा होता है।
यह पुराने ज़माने की बात है। इन दिनों न बिज्जी जैसे विलक्षण कथाकार हैं, न हबीब तनवीर जैसे अद्भुत नाटककार और न चरणदास जैसे प्रसिद्ध चोर!
#चरणदास_चोर १.
लेखक – कृष्ण कल्पित, अपने फेसबुक वॉल पर