March 6, 2026

पुस्तक समीक्षा- जीने के लिए ज़मीन

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जीने के लिए ज़मीन
( कविता संग्रह) आत्मा रंजन

आज मेरे हाथ में , अंतिका प्रकाशन से आया, काव्य संग्रह, ‘जीने के लिए ज़मीन’ है । कवि हैं, शिमला से, मेरे अनुज सम, आत्मा रंजन! यह उनका दूसरा काव्य संग्रह है, यद्यपि वे एक लम्बे अर्से से, पाठकों को एक उच्च स्तर की कविताएँ, कहानियाँ एवं आलेख दे रहे हैं, जो कि देश भर के प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में छपते रहे हैं । प्रस्तुत संकलन, 112 पृष्ठों में कुल 90 कविताएँ संकलित किए है।

किताब शुरू करते ही लगता है कि जैसे, जीवन की कविताएँ हाथ लगी हैं। जीवन जैसे, तरल सा कुछ हो कर, हमारे चहुँओर है, और हम हैं, उसी में डूबते तरते, उसके भीतर से ही उसको देखते हुए। सरल सी प्रतीत होती ये कविताएँ उकसाती हैं, वह सब देख पाने को, जो अति साधारण परन्तु अति आवश्यक, हमारे आसपास है, या घटित हो रहा है।

संकलन की पहली ही कविता, सकारात्मकता से भरी है, और नन्हे बीज के बीच, वट वृक्ष की संभावनाओं को देख पाने की बात करती है। सबसे पहली, यह छोटी सी कविता, अगली 89 कविताओं की वृहद सम्भावनाओं की ओर इंगित कर देती है।

इन सभी में, जीवन के प्रति आश्वस्त करती कविताएँ हैं , और व्यवस्था पर प्रश्न करती कविताएँ हैं; मिट्टी से जुड़ी कविताएँ हैं और कवि की संवेदनशील दृष्टि से जीवन को तकती कविताएँ हैं। कर्मठ हाथों, बोझा उठाते लोगों और उनके प्रति सभ्रांत लोगों का व्यवहार, कूड़ा उठाने वाले को मनुष्य न समझ कर दृश्य भर मान लेने की पीड़ा हो, या बच्चों के खिलौनों में हथियारों के शुमार होने का ख़ौफ़! यहाँ खूबसूरत सपने हैं- बच्चे के बस्ते में, एक चिड़िया, एक तितली और एक म्याऊँ रख पाने के; और खुशी है- खरीद पानें की उसके लिए एक अदद गेंद।

कैसे कवि देख पाते हैं,एक खिड़की के केवल हो पाने का अर्थवान होना, उस तरह से कि जितना किसी घर में, औरत का केवल होना, अर्थवान हो।

कितनी ही कविताएँ हैं यहाँ, जो यहाँ वहाँ घटते, रोजमर्रा के दृश्यों में से संवेदनाएँ उकेर कर उन्हें बाहर लाती हैं।जैसे- ‘कोशिश’ कविता में एक बूढ़ा है, और एक वकील। कवि उन दोनों को ऐसे देख पाते हैं-
“…
वकील क़ानून समझा रहा है
और बूढ़ा दुख
…”
किसी साधारण सी दिखती घटना में वे कुछ खास, कुछ गम्भीर को देख पा रहे हैं।
सहृदय कवि, सबकी जरूरत के बारे में सोच पाते हैं। वे चाहते हैं कि,
“…
मिले सबको
उगने के लिए
थोड़ी सी मिट्टी बूँद भर नमी

मिलें सबको पंख

खुला एक आसमान
उससे भी ज्यादा जरूरी
कि मिले सबको
जीने के लिये ज़मीन!”

वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, परिस्थितियों पर कवि के सरोकार, कविताओं में छलक जाते हैं। वे कहते हैं-
“ इतनी ग़ैरज़रूरी तो नहीं
मान ली गई हैं जितनी
असहमति असन्तुष्टी जिज्ञासा

कितनी जरूरी हैं,
कुछ असहमतियाँ
आर उनका बचा रहना।”

स्मार्ट लोगों की बात करती एक कविता है, और एक और है, उन स्मार्ट लोगों की भाषा की बात करती।
“ऐसी करिश्माई भाषा है उनके पास
जो पूरी विश्वसनीयता के साथ
क्रूरता की व्याख्या कर सकती है
…”
अपने हित और दूसरों के अनहित में नैरेटिव गढ़ना इसी स्मार्ट भाषा का हिस्सा हैं। इन्ही सरोकारों में युद्ध भी एक सरोकार है।, जो बहुतेरों का जीवन नष्ट करता है, और कुछ के लिए एक मनोरंजन भर होता है।
“फट पड़ेगी ज़हरीली नफ़रत

भड़क उठेंगी फेसबुक भीतें

सच बहुत खतरनाक है ये
युद्ध का मनोरंजन हो जाना।”
एक और कविता में वे कहते हैं-
“बहुत जरूरी ही है हमारा
पक्षधर और निष्पक्ष होना एकसाथ
कि पक्षधर होना कहाँ होता है पक्षपाती होना
…”
‘डर’ और ‘लिंचिंग’ जैसी कविताएँ भी इसी सरोकार का हिस्सा हैं।

अब एक समूह उन कविताओं का भी आता है, जो कवि के मिट्टी से जुड़े होने की परिचायक हैं। बीते समय में या दूर दराज़ के इलाक़ों में, अब भी प्रयोग हो रही अलग-अलग वस्तुओं के बारे मे वे अलग-अलग कविताओं में विस्तार से बात करते हैं, इस तरह कि इन सब वस्तुओं की सामाजिक, भावनात्मक प्रासंगिकता समझ आने लगती है। झूम्ब, हूल, कुटुवा आदि यह सब कविताएँ इसी श्रेणी में आती हैं। ‘घास नहीं छीली’ यह कविता भी ग्रामीण परिवेश की बारीकियों को समझाती कविता है, जबकि बाहरी समाज घास को ले कर भोथरी समझ से टिप्पणी कर रहा हो। हम पहाड़ से जुड़े लोगों को, इसी पहाड़ीपने से प्रेम रहता है, भले ही दैनिक जीवन में हम उस जीवन शैली से कुछ दूर आ गए हों।
‘गाँव से लौट कर’ एक भावुक करने वाली कविता है, जिसमे कवि गाँव से निकलने पर, सूखे पत्तों को झटक आता है, पर साथ ले आता है- ‘ढीठ घास के तिनके,
कुछ मकरंद कण हल्की भीनी गंध के साथ,
जीरे की शक्ल वाले कुछ फूल घास के
( जो घास में चला हो , इन फूलों को झटपट ही पहचान जाए)
एक काँटा- एक कुंबर’
फिर वे कहते हैं-
“उससे भी अधिक चुभता कसकता
साथ चला आया और भी बहुत कुछ
गाँव से शहर लौटते हुए।”
एक और कविता में वे पहाड़ी घरों से सड़कों- राजमार्गों तक कदमताल करतीं आवाज़ों की बात करते हैं। दूसरी जगह वे बात करते हैं, मिट्टी के खुरदरेपन की, जबकि, “चिकनेपन की तमाम चमक, कोंपल की पहली पत्ती को सौंप देने के बारे में कहने लगते हैं।
कभी बात होती है, स्त्री के प्रति पुरुष मानसिकता की, और कहीं, “सुरों के सुरीलेपन से बेतरह खिलवाड़ करते भजनों” की तुलना, “कचरा बुहारती उस औरत के सुरीले लोकगीत “ से करने लगते हैं। वे शब्दों की बात करते हैं, भाषा की बात करते हैं, संकीर्ण मानसिकता की बात करते हैं। और फिर वे बात करते हैं ‘न पढ़ी जा पा रही’ किताबों के, ‘पढ़े जा पाने’ के सपनों की।
एक बहुत प्यारी कविता को मैंने अन्त के लिए छोड़ दिया था। संकलन की चौथी कविता है- “थपकी”! प्रेम और स्नेह की शक्ति की बात करती यह कविता, प्रेम और स्नेह की असीम संभावनाओं को समझती- समझाती, हौले हौले बहती रहती है, आश्वस्त करती है। इस सुन्दर कविता का अंश-
“…
इसी थपकी के पास है
करिश्माई ये ताक़त
जो कितनी भी गहरी रुलाई को
बदल देती है
सुकून भरी नींद में

बर्बरता को ही ताक़त समझ लेने के अभ्यस्त
समझ भी कहाँ पाएँगे हम
मासूम और कातर दिखती हुई के भीतर
ताक़त की संभावनाएँ।”

आशा है, आप इन कविताओं को पढ़ेंगे और मेरी तरह पसंद भी करेंगे। पेपर बैक संस्करण की क़ीमत है, 195 रुपए! पुस्तक आमाज़ोन पर उपलब्ध है।
आत्मा रंजन जी को और अंतिका प्रकाशन को मेरी असीम शुभकामनाएँ!

ईशिता आर० गिरीश

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