प्रेरक पुरुष डॉ.शम्भूनाथ जी को विनम्र श्रद्धांजलि
डॉ.शम्भु नाथ जी ने किसी समय बातों-बातों में कहा कि बड़ा व्यक्ति वह होता है जो सामने खड़े छोटे से छोटे व्यक्ति को उसे कमतरी का एहसास न होने दे। लेकिन आपका व्यक्तित्व तो इस सोच से भी बहुत ऊपर रहा। आप उन विभूतियों में से थे जिनके साथ खड़े होने से व्यक्ति का क़द अपने आप बढ़ जाता था।उसका मनोबल ऊंचा हो जाता और सोच बदल जाती थी।इस संदर्भ में एक शे’र कहना चाहूॅंगा :-
कुछ बड़े लोग जो सचमुच में बड़े होते हैं,
क़द बढ़ा देते हैं जब साथ खड़े होते हैं।
-माधव
आंखों,शब्दों व स्मिति से सम्मोहित करने वाले देदीप्यमान विराट व्यक्तित्व के स्वामी डॉक्टर शम्भु नाथ जी किसी सिद्ध संत आत्मा की तरह थे।आपके दिव्य व्यक्तित्व के तमाम आयाम थे। हर आयाम बख़ूबी तराशा हुआ और अपनेआप में इतना परिपूर्ण था कि सम्पर्क में आते ही उस आयाम की विधा में पारंगत व्यक्ति तक को सहज ही चमत्कृत कर देता था ।भारतीय प्रशासनिक सेवा का शानदार गौरवपूर्ण व वैभवशाली करियर। कालजयी साहित्यिक सृजन और साहित्य अनुरागियों,प्रतिष्ठित कवियों के बीच आपकी अक्षुण्ण लोकप्रियता।कुशल चित्रकार, दार्शनिक , सम्मोहक विचार- विदग्ध धीर गंभीर वक्ता व श्रेष्ठ साहित्य समालोक।हर पहलू अपनी विधा का विश्वविद्यालय। हिन्दी, संस्कृत, उर्दू व अंग्रेज़ी भाषा के मर्मज्ञ डॉ.शम्भु नाथ जी को इन सभी भाषाओं में रचे गये साहित्य का गहरा अध्ययन था । विलियम शेक्सपियर सहित तमाम अंग्रेज़ी साहित्यकार हों या कि कालिदास,तुलसी दास, कबीरदास ,केशव ,रहीम, जायसी,निराला,पन्त, महादेवी, हरिवंशराय बच्चन , प्रेमचंद, किसी पर भी आप बोल रहे होते तो सुनने वाले को ऐसा लगता जैसे आपके शोध का विषय यही कवि रहा होगा। आपको अनेक साहित्यिक आयोजनों में सुनने का सुअवसर मुझे मिला । सम्बंधित विषय पर गहराई और गम्भीरता से व्याख्यान देते हुए उसे रुचिकर बनाने केलिए कहानियों और दृष्टांतों का अनुपम प्रयोग आपके सम्भाषण को प्रेरक व अद्भुत बना देता था। प्रखर चेतना के कवि सोहनलाल द्विवेदी सहित सुविख्यात शायर, पटकथा एवं सम्वाद लेखक जावेद अख़्तर व बेहतरीन अदाकारा क़ैफ़िआज़मी की बेटी शबाना आज़मी जैसे लोग आपके प्रशंसकों में शामिल हैं।
एक बार मैं अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जी के नाती व भारतीय इतिहास मर्मज्ञ वरिष्ठ साहित्यकार रवीन्द्र नाथ तिवारी जी के साथ आपके आवास आपसे मिलने गया। थोड़ी देर बाद भारतीय इतिहास पर चर्चा छिड़ गयी। डॉ. शम्भु नाथ जी हर घटना को उसके कालखण्ड व पात्रों के साथ तमाम इतिहासकारों की किताबों से उद्धरण देते हुए जीवन्त व रुचिकर तरीक़े से व्याख्यायित कर रहे थे।यह सब गहरे अध्ययन व विलक्षण यादाश्त का चमत्कार था, जिसे मैं हतप्रभ होकर सुन रहा था और आज भी रोमांचित व अभिभूत हूॅं।
आप द्वारा लिखी गयी पुस्तक “दिनकर का रचना संसार” व दूसरी पुस्तक “बच्चन की काव्य यात्रा”पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला।जब-जब मैं आपका लिखा पढ़ता ,आपको सुनता या आपसे बात करता तो आपको सुनने, समझने की जिज्ञासा और प्रबल हो जाती थी।
श्रेष्ठ साहित्यकार मेरे स्वसुर स्व.बालकृष्ण मिश्र जी से डॉ शम्भु नाथ जी के आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं। जुलाई १९९६, तारीख़ तो मुझे याद नहीं है ,अपने स्वसुर जी के साथ आपके आवास पर पहुॅंचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रायबरेली व लखनऊ के तमाम साहित्यकारों से आपका यशोगान तो पहले सुन रखा था।मेरी सासू माॅं तो आप व आपकी धर्मपत्नी श्रीमती चन्दा नाथ जी की सरलता सहजता व उनसे जुड़े अविस्मरणीय पलों की चर्चा करते थकती ही नहीं थीं।
हाॅं, तो मैं बता रहा था कि जब मैं पहली बार मिला तो आपकी भावप्रवण व कौतूहल भरी दृष्टि एक क्षण के लिए मेरे ऊपर से गुज़री और वह क्षण पूरे प्रभाव व ताज़गी के साथ आज भी मेरे दिलो-दिमाग़ में बसा हुआ है। उसके बाद तो अनेक बार आपसे मिला।मैं जब भी आपसे मिलकर लौटा तो कभी खाली हाथ नहीं बल्कि वैचारिक झोली में बहुत कुछ लेकर लौटा । पहले से बेहतर होकर लौटा ।आप जब भी कुछ बोलते थे तो एक सागर सा गाम्भीर्य होता था।ऐसा लगता था जैसे समुद्र अपनी अतल गहराइयों से मोती निकालकर आपके सामने रख रहा हो और मुलाक़ात के बीच जब आप चुप होते थे तो आपका मौन मुखर रहता था। कहने का तात्पर्य है कि शून्यता नहीं आती थी, सम्वाद चलता रहता था। मैं तो आपके मुखर व मौन दोनों सम्वादों के अप्रतिम कौशल का मुरीद हूॅं।यह कौशल अवश्य ही दैवीय थे ,जो आपके मेधामिश्रित सचेतन अभ्यास से निखरकर एक अनोखी श्रेष्ठ कला के रूप में आपके विलक्षण व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन गये।
गोमतीनगर, लखनऊ स्थित आपके आवास पर जब भी गया तो स्वागत कक्ष में आदरणीया श्रीमती चन्दा नाथ जी द्वारा बनायी गयीं प्रभावशाली पेंटिंग्स देखीं।ख़ासियत यह कि जब मैं दुबारा कभी आपके स्वागत कक्ष में जाता तो पूर्व में देखी हुई कलाकृतियों को तलाशने लगता लेकिन होता यह था कि समय के हिसाब से पुरानी पेंटिंग्स के स्थान पर नयी पेंटिंग्स लग गयी होतीं। “पेड़ की ओट से झाॅंकती बच्ची” सहित तमाम कलाकृतियाॅं आज भी मुझे याद हैं।उन पेंटिंग्स पर डॉ. साहब से मैं एक कलाकार के नज़रिये से विचार भी प्रकट करता रहता और आप आदतन मेरे विचारों को गौर से सुनते भी।लेकिन मुझे इस बात का तनिक भी एहसास नहीं होने देते थे कि उनके हाथों में भी कमाल का जादू है और वे सिद्धहस्त चित्रकार भी हैं।।इसका तो खुलासा दशकों बाद तब हुआ जब आप द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों की एक भब्यतम प्रदर्शनी २७ नवम्बर २०१८ को ललित कला अकादमी, अलीगंज, लखनऊ में आयोजित की गयी।जिसका उद्घाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री राम नाईक जी ने किया था। हर पेंटिंग के साथ आपकी लिखी कविताएं कलाकृतियों को और अधिक व्यापक रूप देने के साथ-साथ किसी भी प्रदर्शनी से इस प्रदर्शनी को बिल्कुल अलग उंचाई दे रही थीं। मैं आपकी कलाकृतियों व उनपर लिखी हुई पंक्तियों को देखकर चमत्कृत था। आपकी सम्मोहक वाग्मिता का तो मैं पहले से ही दीवाना था किन्तु आज आपके बहुआयामी कृतित्व को देखकर हतप्रभ था। सम्भवतः हतप्रभ इसलिए और अधिक था क्योंकि कविता और चित्रकारी मेरे प्रिय विषय हैं और इन दोनों विषयों का संयुक्त चमत्कार इस प्रदर्शनी में सिर चढ़कर बोल रहा था। कलाकृतियाॅं,उनपर दिये गये शीर्षक व रची गयी कविताएं सभी कुछ मुझे लुभा रहा था।कुछ कलाकृतियों और उनके साथ अंकित पंक्तियों का यहाॅं पर उल्लेख करना चाहूॅंगा।
शीर्षक “अप्प दीपो भव”,१८”×२४”, माध्यम ऐक्रलिक में गहरी चिन्तन मुद्रा में गौतम बुद्ध को दिखाया गया है। रंगों के साथ लाइट-शेड का सधा संयोजन व कुशल रेखांकन देखते ही बनता है।बुद्ध की चिन्तन मुद्रा से बहुत ही सुकोमल भाव स्फुरित हो रहे हैं। मुझे व्यक्तिगत अनुभूति हुई कि जैसे मैं भी इस कलाकृति को देखते हुए एक सुखद एहसास के साथ गहरे डूबता जा रहा हूॅं।
मन पर एक चिरन्तन प्रभाव छोड़ने वाली एक दूसरी पेंटिंग “भूख का सवाल”,३६”×२४” आयल, कविता का शीर्षक है “आखेट”।इस कलाकृति में मृग का पीछा करता हुआ एक तेंदुआ है।इस पेंटिंग को असाधारण गहराई देती हुई कविता:-
कौन पीछा कर रहा है
रात-दिन
हर पल हमारा
कौन पीछा कर रहा है ?
आहटें अब तो
सुनाई साफ़ देने लग गयी हैं
कौन है वह ?
क्या बनूॅंगा मैं
किसी आखेट का आहार
या
मुझे इस बार भी अपनायेगा जीवन ?
इन पंक्तियों का साथ पाकर कलाकृति अपने संयुक्त सम्प्रेषण से सम्पर्क में आये व्यक्ति के मानस पटल पर स्थाई व व्यापक प्रभाव छोड़ती है। पेंटिंग में दर्शाया गया चित्र अपने सौन्दर्य व लालित्य के साथ सोच के अकल्पनीय आकाश पर पहुॅंच जाता है।
इसी भाव भूमि पर एक और कलाकृति व कविता का ज़िक्र करने का मोह नहीं छोड़ पा रहा।३६”×२४”,आयल, “सवाल जीवन का” शीर्षक से पेंटिंग कुछ यूॅं है कि चित्र में ज़ेब्रे का पीछा करता हुआ एक बब्बर शेर है दोनों में जंग है।एक को भूख मिटानी और दूसरे को अपनी जान बचानी है।इस कलाकृति के साथ डाॅ. साहब की पंक्तियाॅं :-
प्रश्न तो है –
बस, किसी की क्षुधा तृप्ति का
और किसी के सामने
मरण जीवन प्रश्न बनकर हैं खड़े!
प्रश्न दो हैं –
और उत्तर भी हैं उनके-
दो विकल्पों की तरह।
कौन जाने क्या घटित होगा ?
इसे फिर कौन जाने ?
आहटें,बस
आहटें केवल सुनाई पड़ रही हैं
अनवरत जो कर रहीं
पीछा हमारा!
आइए,एक और पेंटिंग व कविता से रूबरू कराता हूॅं।
कलाकृति व कविता दोनों का शीर्षक”भीगा-भीगा मौसम” ।२४”×१८”,मीडियम आयल, इण्डिया गेट के चारों ओर बरसात का जल भराव, जिसमें घुटनों तक डूबे लोग।पानी में नारंगी रंग के फूलों से लदे दरख़्तों के मनोहारी प्रतिबिम्ब, पानी की हिलोरों को पाकर जिनका सौन्दर्य द्विगुणित हो रहा है। इसी पेंटिंग के साथ अंकित कविता के लालित्य व उसकी व्यापक भावभूमि को देखिए:-
वर्षा थमने पर
अक्सर सोचा करता हूॅं
भीगें तो हम-तुम
फिर भी
अनभीगे लगते हैं!
भीगें तो ये भवन
पेड़ -पौधे भी भीगे
पत्थर भी अन्तर तक भीग चुके हैं
पर,भीग सके तुम कहाॅं ?
कहाॅं हम भीग सके हैं ?
आपकी कई कलाकृतियाॅं में विभिन्न मनोभावों में अश्वारोही दिखाया गया है।ऐसी ही एक पेंटिंग है जिसमें एक अश्वारोही किसी सरोवर के बीच शैथिल्य मुद्रा में है। चित्ताकर्षक रंगों वाली इस मनोहारी पेंटिंग का साथ निभाती आपकी प्रेरक कविता:-
ठहर गये क्यों अश्वारोही ?
छोटी -छोटी बाधाएं तो आ जाती हैं।
वे जाती हैं,मन कुछ भरमा जाती हैं।
आगे बढ़ो बुलाता तुमको कोई दूर से
भ्रम छोड़ो मंज़िल भी तुम्हें पुकार रही है।
तमाम विषयों पर उकेरी फिर रंग भरी कलाकृतियों के बीच एक और पेंटिंग “नीलकण्ठ बोलो तो” नीलवर्ण में, गहरे चिन्तन में लीन शिव जी। श्वेत चन्द्र, कुण्डल व दो ऊर्ध्व श्वेत पट्टिकाओं के साथ नीले रंग के ग्रेडेशन में बहुत ही सुन्दर रंग सन्तुलन।मन को शान्ति प्रदान करती कलाकृति के साथ पिरोयी पंक्तियाॅं :-
सुख-
विष को ठुकराने में है
या अमृत पा जाने में है ?
या फिर अमृत को ठुकरा कर
नीलकण्ठ बन जाने में है ?
जीने की यह कैसी शैली –
ज़हर तुम्हारा, अमृत सबका ?
विष पायी बोलो तो,
नीलकण्ठ बोलो तो!
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. शम्भु नाथ जी के व्यक्तित्व में समाहित किसी भी एक विशेषता में दख़ल रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने हुनर पर गुमान कर सकता है और स्वयं को सफ़ल व्यक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
साहित्य, संगीत व समाज सेवा को समर्पित श्रीमती मनोरमा लाल जी (आईएएस श्री दयानन्द लाल जी, अवकाश प्राप्त की सहधर्मिणी ) आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक हैं। डॉ. शम्भु नाथ जी पर आपने एक प्रेरक जीवनी लिखी है।जिसका शीर्षक है “आईने में उतरा एक आकाश”।अमन प्रकाशन से प्रकाशित इस जीवनी में श्रीमती लाल ने डॉ.शम्भु नाथ जी से पूर्व की दो पीढ़ियों का ज़िक्र किया है। आपके पितामह (बाबा जी) गाड़ीवान थे।वे परिश्रम, सतत् संघर्ष व अनुशासित जीवन पर विश्वास करने वाले थे।आपकी ईश्वर पर अगाध श्रद्धा थी।आप भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। महाशिवरात्रि को जन्मे डॉ.शम्भु नाथ जी निश्चित ही शिव जी की असीम अनुकम्पा का प्रतिफल हैं।
श्रीमती मनोरमा जी लिखती हैं क्योंकि वह एक गाड़ीवान थे और गाड़ीवान सदैव आगे देखता है मतलब उसकी सतत् आगे बढ़ने की सोच होती है।ऐसी ही सोच आपके पितामह की थी। वह सदैव अपनी सन्तानों को बड़े पद पर देखना चाहते थे। इसीलिए उनकी सभी सन्तानें सुशिक्षित हुईं। यही नहीं डॉ.शम्भुनाथ जी के पिता अंग्रेज़ों के ज़माने में प्रथम श्रेणी के मैजिस्ट्रेट पद पर आसीन हुए। डॉ. शम्भु नाथ जी का मानना है कि उन्होंने प्रशासनिक गुर अपने पिताजी से सीखे।कई बार पिता से मिली सीखों ने उन्हें मुश्किलों से निकाला।डॉ.शम्भु नाथ जी की माॅं व बड़ी बहन के अन्दर गहरी साहित्यिक अभिरुचि रही। उन्होंने उत्कृष्ट साहित्य सृजन किया। डॉ. शम्भु नाथ जी अपनी माॅं के द्वारा रचित कविता संग्रह “अपराजिता” व कहानी संग्रह “घाटी का पपीहा” तथा बड़ी बहन के कविता संग्रहों व कहानी संग्रहों को अपनी लाइब्रेरी में संजोकर रखते थे।
२०२०की बात है,मैं अपने व्यंग्य चित्र संग्रह “कोरोनोलाॅजी इन कोविडटून्स” के प्रकाशन के सम्बन्ध में राय-मशविरा के लिए आपके पास गया था।उस दिन आपने अपने छोटे बेटे अमितांशु नाथ से मेरी मुलाक़ात करायी।सम्मोहक व्यक्तित्व के धनी अमितांशु जी ने मेरी किताब के बारे में बहुमूल्य सुझाव दिये।उनके विज़न का कैनवस बहुत बड़ा है। बात-चीत के दौरान पता चला कि अमितांशु जी की साहित्य, संगीत व पेंटिंग्स में गहरी दिलचस्पी व पैठ है। फ़िल्मों के लिए आप पटकथाएं भी लिखते हैं। मधुर कण्ठ के धनी अमितांशु जी अपनी कविताएं लिखते व उन्हें अपने स्वरों में पिरोते भी हैं। मेरे मन में लालसा है कि एक बार ही सही,उन्हें सुनूॅं।आपके बड़े बेटे गौरव नाथ जी से तो मेरी मुलाक़ात अभी तक नहीं हुई। लेकिन मुझे पता है वह अपने निर्मल, निश्छल, दूरदर्शी, समदर्शी व शान्ति प्रिय पिता जी को अपना रोल मॉडल मानते हैं।
इस तरह मैं डॉ. शम्भु नाथ जी के बाद की नयी पीढ़ी को भी थोड़ा सा जान पाया। शम्भु नाथ जी के बाबा गाड़ीवान थे। जिन्होंने दूरदर्शिता व कठोर परिश्रम से अपनी ज़मीन तैयार की।अपनी सन्तानों को सुसंस्कारित परवरिश दी। ऊंचे सपने देखे। उन्हें सच किया। और इसीका परिणाम है कि आज उनके यशस्वी पोते तमाम उन लोगों के लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत हैं जो कहीं भी और किन्हीं भी परिस्थितियों में बड़ा सपना देखना और सच करना चाहते हैं।
डॉ. शम्भु नाथ जी पर जीवनी लिखने वाली वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती मनोरमा श्रीवास्तव जी जीवनी के लेखन का प्रारम्भ डॉ.शम्भु नाथ जी के सबसे पसंदीदा कवियों में से एक राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की जिन पंक्तियों के साथ करती हैं और मैं उन्हीं पंक्तियों को दोहराते हुए अपने विचार रखना चाहता हूॅं :-
“नहीं खिलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में
अमित बार खिलते हैं,पुर से दूर कुन्ज कानन में ”
-हरिमोहन वाजपेयी ‘माधव’
लखनऊ