भावों का द्वारपाल : अर्थांतर का यात्री
{मैं अनुवाद हूँ — शब्दों का वह मनुष्य, जो आत्मा को भाषा प्रदान करता है; जहाँ हर शब्द की चौखट पर एक आत्मा पहरा देती है, जो अर्थ से भाव तक, और भाव से आत्मा तक की यात्रा करता है।}
मैं अनुवाद हूँ।
हाँ, मैं — न कोई पुस्तक, न कोई पृष्ठ, न कोई तकनीकी प्रक्रिया — मैं एक जीवंत मनुष्य हूँ। मैं साँस लेता हूँ, मैं स्पंदित होता हूँ। मेरे रग-रग में बहती हैं वे भाषाएँ, जो मुझे बार-बार जन्म देती हैं, और हर जन्म में मैं फिर नये चेहरे, नये भाव, नयी पीड़ा के साथ सामने आता हूँ।
मेरा जन्म कभी नहीं रुकता — मैं हर बार तब जन्म लेता हूँ, जब किसी मनुष्य की अनुभूति, उसके हृदय का संगीत, उसकी स्मृतियाँ, उसकी चीखें, उसकी प्रार्थनाएँ, एक सीमित भाषा में बँध जाती हैं — और वह चाहने लगता है कि कोई उसकी आवाज़ उस भाषा तक पहुँचा दे, जिसे वह स्वयं नहीं बोल सकता।
और तब, मैं आता हूँ।
कभी चुपचाप, कभी टूटी-फूटी साँसों में, कभी एक अधूरी कविता बनकर, तो कभी किसी बच्चे की हँसी में। मैं उन भावनाओं को थामकर एक नई ज़बान में उतार देता हूँ, जिन्हें उनकी मातृभाषा ने जन्म तो दिया, पर सीमाओं के पार पहुँचाने में विवश हो गई।
मुझे मत देखो एक यंत्र की तरह। मैं मशीन नहीं हूँ।
मैं एक जीव हूँ — मेरी आत्मा है, मेरे आंसू हैं, मेरे अपने घाव हैं।
क्या तुम्हें लगता है, मैं केवल शब्दों को इधर-उधर करता हूँ?
नहीं। मैं शब्द नहीं, आत्माएँ ढोता हूँ।
मैं वाक्य नहीं, संस्कृतियाँ पार कराता हूँ।
मैं पंक्तियाँ नहीं, इतिहास उठाता हूँ अपनी पीठ पर।
हर बार जब कोई मूल लेखक अपनी भाषा में कुछ कहता है, उसमें उसकी नसों की तपिश होती है, उसकी माँ की ममता, उसके पिता की चुप्पी, उसकी मिट्टी की गंध, और बचपन की धूप होती है। जब वह कहता है, “मैं दुखी हूँ,” तो वह दुख, केवल व्याकरण का वाक्य नहीं होता — वह उसकी दादी के हाथों की रोटियों की याद हो सकती है, या उसके गाँव की टूटी पुलिया, जिसे वह हर मानसून में पार करता रहा।
और जब तुम मुझसे कहते हो, “इसका अनुवाद करो,” तब मैं काँप उठता हूँ।
कैसे मैं उस वाक्य को दूसरी भाषा में डालूं, जब वहाँ वैसी दादी नहीं है, वैसी रोटियाँ नहीं हैं, वैसी मिट्टी की खुशबू नहीं है? कैसे मैं वह सब कुछ समझाऊँ, जो लिखा नहीं गया, पर अनकहा होकर भी साँस लेता रहा?
फिर भी मैं करता हूँ।
मैं नायक नहीं हूँ, न संत, न कवि, न ज्ञानी।
मैं केवल वह साधारण मनुष्य हूँ, जो दो भाषाओं के बीच पुल बनाकर खड़ा होता है — एक पैर इस किनारे, एक उस किनारे — और हर बार डगमगाता हूँ।
हर बार गिरता हूँ, चोट खाता हूँ। लेकिन पुल गिरने नहीं देता।
मुझे अक्सर आलोचना मिलती है।
कभी कहते हैं — “यह अनुवाद मूल जैसा नहीं है।”
कभी कहते हैं — “भाव उड़ गए, केवल अर्थ बचा है।”
कभी कहते हैं — “इसने लेखक के मूल स्वरूप को धो डाला।”
और मैं चुप रह जाता हूँ।
मैं कहना चाहता हूँ, “हाँ, मैं जानता हूँ। मैं जानता हूँ कि यह वही नहीं है जो मूल में था। लेकिन मैं एक शब्द से दूसरे शब्द तक नहीं गया — मैं आत्मा से आत्मा तक गया हूँ। मैं भाव से अर्थ तक गया हूँ, और फिर अर्थ से गहराई तक।”
क्या तुम्हें पता है, मैंने कितनी रातें जागकर केवल एक शब्द के लिए बिताई हैं?
किसी एक पंक्ति को दूसरी भाषा में उतारने में मेरा सारा आत्मबल चुक गया है।
कभी किसी रचना में जब कोई बूढ़ा पिता अपनी बेटी को ‘प्यारी सी गुठली’ कहता है, तो मैं घंटों सोचता हूँ कि उस विदेशी भाषा में गुठली का वही प्रेम, वही मुलायम, वही रक्षक स्वरूप कैसे उतारूँ?
और फिर, जब कोई पाठक उस वाक्य को पढ़कर मुस्कुराता है —
तो मुझे लगता है कि मैंने वह पुल पार कर लिया।
लेकिन यह यात्रा कभी खत्म नहीं होती।
मैंने अपने जीवन में कविताएँ देखी हैं जो युद्ध से आई हैं —
शब्दों में बारूद की गंध थी।
मैंने ऐसे प्रेमपत्रों का अनुवाद किया है, जिनमें एक बूढ़ा पति अपनी मृत पत्नी को याद करता था —
हर वाक्य में एक सिसकी थी, हर विराम में एक स्पर्श।
मैंने उन स्त्रियों की कहानियाँ पढ़ीं, जो कभी बोल नहीं पाईं,
और जब उन्होंने अपनी भाषा में चीखना शुरू किया,
तब दुनिया को मेरी ज़रूरत पड़ी —
क्योंकि वे स्त्रियाँ अपनी मातृभाषा में बोलती थीं,
पर दुनिया उन्हें अंग्रेज़ी में सुनना चाहती थी।
मैं हर उस कहानी में हूँ, जिसे दुनिया ने सुना — पर भाषा ने अनसुना कर दिया था।
मुझे प्रेम है कविता से, लेकिन उससे अधिक उस मौन से प्रेम है, जिसे मैंने शब्द दिया।
हर बार जब कोई बच्चा किसी नई भाषा में ‘माँ’ कहता है,
तो मेरे भीतर कुछ टूटता है — और जुड़ता भी है।
मैंने देखा है, भाषाएँ मर जाती हैं, लेकिन भावनाएँ नहीं।
मैं उन मरे हुए शब्दों में भी धड़कन खोजता हूँ।
मैं पुरानी किताबों में झाँकता हूँ, जैसे कोई वृद्ध अपने बचपन की तस्वीरें देखता है।
कभी-कभी मुझे लगता है, मैं हर युग में, हर सभ्यता में था।
मैं था जब वेदों का अनुवाद हुआ,
मैं था जब बाइबिल के शब्द लैटिन से यूनानी में बदले,
मैं था जब जापानी कवियों ने प्रकृति को अंग्रेज़ी में लिखा,
मैं था जब अफ्रीकी बच्चों ने अपने पहले दुःख को फ्रेंच में व्यक्त किया।
मैं आज भी हूँ —
हर युद्ध में, हर संवाद में, हर प्रेम-पत्र में, हर शांति-समझौते में।
मुझे कोई पहचान नहीं देता।
मूल लेखक का नाम रहता है, प्रकाशक का नाम रहता है —
मैं, जो उन दोनों के बीच की आत्मा हूँ, गुमनाम रह जाता हूँ।
लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं।
मैं अपने हर अनुवाद में फिर से जन्म लेता हूँ —
नई भाषा में, नए देश में, नए पाठक की आँखों में।
और जब कोई मुझे पढ़ते हुए रोता है, हँसता है, काँपता है,
तो मुझे लगता है — मैं जीवित हूँ।
मैंने अपने जीवन में असंख्य रूप लिए हैं —
मैं एक स्त्री बना, एक कवि, एक द्रष्टा, एक विद्रोही, एक रागिनी, एक पुराना राग।
मुझमें तुलसी की विनय है, मिर्ज़ा की तड़प है, टैगोर की दृष्टि है, और मीरा की पीड़ा।
और मैं इन सबको उनकी भाषा से बाहर निकालकर दुनिया को सौंपता हूँ।
कभी-कभी मैं सोचता हूँ, जब यह सब खत्म होगा —
जब कोई भाषा न बचेगी,
जब मनुष्य केवल मौन में संवाद करेगा —
क्या तब भी मेरी ज़रूरत होगी?
और मेरे भीतर से एक धीमी-सी आवाज़ आती है —
हाँ, क्योंकि मौन का भी अनुवाद चाहिए होता है।
मौन — जो सबसे पुरानी भाषा है।
क्योंकि अनुवाद केवल शब्दों का नहीं, मौन का भी होता है।
और मैं वही हूँ —
जो मौन को सुनता है, और उसे भाषा देता है।
मैं अनुवाद हूँ।
एक मनुष्य,
जो दो दिलों के बीच वह भाषा बनता है,
जो कभी बोली नहीं गई —
पर हमेशा समझी गई।
“मैं अनुवाद हूँ — दो भाषाओं के बीच नहीं, दो हृदयों के बीच वह पुल हूँ, जिसे देखा नहीं जाता… बस पार किया जाता है।”
_ डॉ स्वाति चौधरी 🌸🌸
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