प्रसिद्ध कथाकार धीरेंद्र अस्थाना ने यह टिप्पणी लिखी है
मुम्बई में सीमा कपूर द्वारा लिखित “यूं गुजरी है अब तक” इस आत्मकथा की किताब पर हुए आयोजन की अध्यक्षता उन्होंने की। इस में सीमा कपूर, विभा रानी ने भी अपनी बात रखी। सीमा कपूर प्रख्यात अभिनेता ओम पुरी की पत्नी हैं।
प्रसिद्ध कथाकार धीरेन्द्र अस्थाना –
मैंने यह किताब मिलने के बाद थोड़ी देर से पढ़ी। कारण ऊपर से दिखने में सामान्य लेकिन भीतरी स्तर पर बहुत गंभीर है । हम खुद को साहित्यकार मानने वाले लोगों को एक हास्यास्पद मुगालता है। वो यह कि सिनेमा वाले लोगों का पढ़ने लिखने से कोई गहरा नाता नहीं है इसलिए कभी कभार छपने वाली उनकी किसी किताब को इतनी गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है कि उसे पढ़ा ही जाए। दोस्तों इस मुगालते के चलते हम सिनेमा ही नहीं अन्य रचनात्मक विधाओं में काम करने वालों की भी महत्वपूर्ण कृतियों को अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं। यह उस लिखने वाले का नहीं हमारा नुकसान है कि हम उस विधा में होने वाली उपलब्धियों के रास्ते में घटी मरणांतक जीवन स्थितियों को जानने से वंचित रह जाते हैं। सीमा कपूर मेरी तीसियों साल पुरानी परिचित हैं। आज यहां इस सभागार में आप सबके सामने मैं स्वीकार करता हूं कि मैं उन्हें हमेशा सिनेमा की सेलिब्रिटी ही समझता आया। सीमा कपूर, जो अन्नू कपूर, रंजीत कपूर की बहन और ओम पुरी जैसे ताकतवर अभिनेता की पत्नी रही हैं। वो खुद क्या हैं, कहां कहां से गुजर कर यहां हैं, यह मुझे उनकी इस बनैली और बेबाक आत्मकथा यूं गुजरी है अब तलक ने बताया। अगर मैंने यह किताब नहीं पढ़ी होती तो मेरा अपना बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। यह आत्मकथा भर नहीं है यह कला साहित्य संस्कृति और थियेटर का लहुलुहान रास्तों पर चल कर आकार लेता इतिहास है। यह किताब पारसी थियेटर के फुल टाइमर योद्धा मदन लाल कपूर और सतत संघर्ष में मुब्तिला कवयित्री कमल कपूर शबनम के आखर आखर तत्कालीन सांस्कृतिक इतिहास गढ़ने का हलफनामा है। यह योद्धा सेलिब्रिटीज़ के दिल्ली मुंबई के हाहाकार करते अंधेरों में जीने मरने की गवाही है। यह सिनेमा को सिनेमा का अर्थ देने वाले रणबांकुरों की भूख प्यास आस और अपमान की अविश्वनीय कथा है। मेरा अपना जीवन और इस किताब के चरित्रों का जीवन समकालीन है इसलिए मैं वर्णित वर्षों के हिसाब से इसमें अपना समय और संघर्ष भी ढूंढता रहा।
अंत में इतना ही कि हमारे समय की अत्यंत चर्चित अनेक लेखिकाओं के सृजन पर यह अकेली किताब भारी है।इसकी भाषा, वेदना, शिल्प, कहन और कथन इसे हमारे समय के एक महत्वपूर्ण उपन्यास सरीखा दर्जा सौंपता है।
इस आत्मकथा को पढ़ना पहली प्राथमिकता होना चाहिए अगर हम संस्कृति की दुनिया के वासी हैं।
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हरि प्रसाद राय की रिपोर्ट-
“मै मरना नही चाहती हूँ।”
सीमा कपूर
‘मै मरना नहीं चाहती हूँ। मै इस खूबसूरत जिंदगी को जीना चाहती हूँ। मेरी किताब कोई उपन्यास नही है जिसमें कल्पना के बल पर बातें लिखी गई हों। यह पुस्तक मेरा जीवन है जो पूरी तरह से यायावर रहा है। ‘
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यह बात कल शाम मीरा रोड के पूनम सागर स्थित विरूंगला केन्द्र में सीमा कपूर ने अपनी आत्मकथा की परिचर्चा गोष्ठी में कही। फिल्म व सिरियल के निर्माण में बड़ा योगदान देने वाली,ओमपुरी की पत्नी रही सीमा कपूर ने पुस्तक पर बोलने की आवश्यकता नही समझी क्योंकि उनके पहले के वक्ताओं में हरि मृदुल, व विभारानी पुस्तक पर विस्तार से बात रख चुके थे। हाँ, यायावर जिंदगी और तथा जीवन को लेकर उन्होंने दिल छूने वाली कुछ बातें अवश्य बताई। ननिहाल पक्ष से धनवान लेकिन गरीबी का सामना करने वाली सीमा कपूर को पारिवारिक झंझटों व मौसम की प्रतिकूलता के कारण अपनी माँ को अपने ननिहाल टिकमगढ न ले जाने पर अफसोस आज तक है। आत्मकथा लिखने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि बढती उम्र के साथ विस्मृति आती है, इसलिए स्मृतियों को दर्ज कर देना चाहिए। एक पढ़े लिखे इंसान होकर भी नाटक कंपनी खोलने के उनके पिता के निर्णय का सबसे अधिक खामियाजा उन्हें और उनकी माँ को भुगतना पड़ा है क्योंकि ननिहाल वालों ने पिता का बहिष्कार कर दिया। यह वह दौर था जब थियेटरों में महिला का रोल पुरुष ही निभाते थे लेकिन उनके पिता ने परंपरा को तोड़ते हुए महिलाओं का रोल महिलाओं को देना शुरू किया जिसके कारण उन्हें कहा गया कि वह ‘रं’ नचवाता है। स्त्रियों के साथ हुए भेदभाव पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने बताया नाटक कंपनियों में पुरूषों को जहाँ एक तरफ कलाकार कहा जाता था वहीं महिला कलाकारों को डांसर कहा जाता था। पुरूषों की इन महिलाओं पर हेय दृष्टि पर बड़ी सादगी के साथ उन्होंने कहा कि वही पुरूष डांसरों से मिलने के लिए, उन्हें नजराना देने के लिए लालायित रहता था और नाटक कंपनियों में खाना बनाने वाले, कपड़े धोने वाले और बाजार से सब्जियों वगैरह खरीदने वालों के साथ दोस्ती कर उनसे मिलने व उनकी एक झलक पाने की लालसा व्यक्त करता था, जो उन्हें हेय दृष्टि से देखता था, ठीक वैसे ही जैसे आज हिरोइन्स की एक झलक पाने के लिए वह लालायित रहता हैं। अपना दिलोजान लुटाने वाले पुरुष समाज के इस दोगले पन पर उन्होंने दुख व्यक्त किया और उन स्त्रियों के चरित्र को उन्होंने अपनी आत्मकथा में स्थान देकर उन्हें सम्मानित करने का बड़ा काम किया है। इसी पुरुष समाज के भय के कारण जीवन से संघर्ष कर रही उनकी माँ को झूठ बोलना पड़ता था क्योंकि उनकी माँ भी बच्चों के पालन पोषण करने के लिए संघर्ष रत थी और वह नही चाहती थीं लोग उन्हें ‘र’ नचवाने वाले की पत्नी समझकर उनकी अवहेलना करे लेकिन बात लंबे समय तक नही छिपती थी और नाटकों के मंचन के लिए जब कंपनी लगती थी उनकी पोल खूल जाती थी और वह उस इलाके को छोड़कर चली जाती थी। इतना ही नही पुरुषों की बुरी नजर से बचने के लिए भी उन्हें यायावरी करनी पडी़ है। उन्होंने लंबी बात न रखकर श्रोताओं से संवाद करने की मंशा जताई और श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर भी दिया। शायद वह और बात करतीं लेकिन अध्यक्ष आदरणीय धीरेन्द्र अस्थाना ने इसे और आगे ले जाने की इजाजत नही दी। उन्होंने अपना लिखित पर्चा पढा और बताया कि आत्मकथा लिखने के लिए साहस चाहिए। उनका लिखित पर्चा उनकी फेसबुक वाल पर है।उनसे पहले हरि मृदुल ने कहा कि उनकी आत्मकथा से गुजरते हुए उन्हें छ सात बार रोना पड़ा है। विभा रानी ने उनकी पुस्तक और जीवन पर सबसे लंबी बात रखी तो प्रेम जनमेजय जी ने स्वीकार करते हुए कि उन्होंने आत्मकथा नही पढी है, चार्ली चापलिन व अन्य ख्याति प्राप्त आत्मकथाओं का उदाहरण देते हुए आत्मकथा लिखने और उसके मानवीय महत्व पर अपनी बात रखी। आभार का भार वहन करते हुए ह्दयेश मयंक ने इमानदारी से स्वीकार किया कि उनके पास आत्मकथा लिखने का साहस नही है। साहित्य कारो की कथनी और करनी पर अफसोस जाहिर करते हुए उन्होंने सभी के प्रति आदर और आभार का इजहार किया और कहा कि वह इस पुस्तक को खरीद कर पढेगे। मेरा तो बस इतना ही कहना है कि आप जीवन में खुशियाँ मिलने पर यह न भूले कि आपने एक दिन रोया था। आत्मकथा का यही सार है। यह आत्मकथा आपको नाटक कंपनियों में महिलाओं की स्थिति को समझाने के साथ जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण देने में सहायक होगी लेकिन इसे पढें तब तो। पूरे कार्यक्रम का संयोजन स्वर संगम फाउंडेशन व जनवादी लेखक संघ ने राजकमल के सहयोग से किया।आयोजन के बाद जब कुछ श्रोताओं ने पुस्तक खरीदनी चाही तो पता चला कि सभी पुस्तकें बिक गई हैं। कार्यक्रम का संचालन व आयोजन के आयोजित होने में महत्वपूर्ण भूमिका रमन मिश्र ने निभाई।